भारतीय राजनीति के गलियारों में इन दिनों चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और चुनावी सुधारों से जुड़ी प्रक्रियाओं को लेकर एक नया घमासान छिड़ गया है। कांग्रेस सांसद कार्ति चिदंबरम ने मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार को उनके पद से तत्काल हटाने की मांग और चुनाव आयोग के आंतरिक फैसलों पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। यह पूरा विवाद ऐसे समय में तूल पकड़ रहा है जब हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने CEC के तत्काल निलंबन की मांग को खारिज कर दिया है, लेकिन साथ ही केंद्र सरकार और चुनाव आयोग से इस पूरे मामले पर कड़ा जवाब तलब किया है।
सुप्रीम कोर्ट का रुख और अंतरिम आदेश से इनकार
सोमवार, 5 अक्टूबर 2026 को देश की सर्वोच्च अदालत में इस हाई-प्रोफाइल मामले पर सुनवाई हुई। भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने साफ शब्दों में कहा कि केवल मीडिया रिपोर्ट्स या राजनीतिक दलों के आरोपों के आधार पर किसी संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति के खिलाफ तत्काल निलंबन या रोक का अंतरिम आदेश नहीं दिया जा सकता।
अदालत ने अपने रुख में यह भी स्पष्ट किया कि चुनाव आयोग एक बहुसदस्यीय संस्था है, जिसके हर फैसले में कानूनी प्रक्रिया और पारदर्शिता का पालन होना अनिवार्य है। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार, चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को नोटिस जारी कर लिखित जवाब मांगा है। अब इस मामले की अगली अहम सुनवाई 13 अक्टूबर 2026 को तय की गई है, जिस पर देश भर के कानूनी और राजनीतिक विशेषज्ञों की नजरें टिकी हुई हैं।
कार्ति चिदंबरम के तीखे सवाल और गंभीर आरोप
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद कांग्रेस सांसद कार्ति चिदंबरम ने चुनाव आयोग के कामकाज के तौर-तरीकों पर खुलकर सवाल उठाए। उन्होंने सार्वजनिक मंचों और मीडिया के सामने यह मुद्दा उठाया कि क्या चुनाव आयोग के फैसले संविधान की मूल भावना और स्थापित कानूनों के मुताबिक लिए जा रहे हैं?
- निर्णय प्रक्रिया पर संशय: चिदंबरम ने सवाल किया कि क्या आयोग के तमाम बड़े फैसले तीनों चुनाव आयुक्तों की आपसी सहमति (सर्वसम्मति) से हो रहे हैं या फिर बहुमत और अकेले मुख्य चुनाव आयुक्त के स्तर पर लिए जा रहे हैं?
- फैसलों की वैधता: उन्होंने आरोप लगाया कि यदि फैसले सिर्फ एक व्यक्ति के विवेक या निर्देश पर हो रहे हैं, तो उनकी कानूनी वैधता पर संदेह पैदा होना स्वाभाविक है। हालांकि, यह उनके राजनीतिक आरोप हैं और अदालत ने अभी तक इस पर कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं दिया है।
- संस्थागत स्वायत्तता: राजनीतिक दलों और सिविल सोसाइटी के बीच चुनाव आयोग की स्वायत्तता को लेकर उठ रही चिंताओं को उन्होंने सबसे बड़ा और गंभीर मुद्दा बताया।
फॉर्म-6 और नए मतदाताओं के रजिस्ट्रेशन का पेंच
इस पूरे विवाद का सबसे अहम केंद्र मतदाताओं के रजिस्ट्रेशन के लिए इस्तेमाल होने वाले 'फॉर्म-6' में किए गए कथित बदलाव हैं। कार्ति चिदंबरम ने सवाल उठाया कि नए फॉर्म में माता-पिता के साथ-साथ दादा-दादी (ग्रैंडपैरेंट्स) से जुड़ी अतिरिक्त जानकारियां क्यों मांगी जा रही हैं? उनका मानना है कि इस तरह के संशोधनों से नए मतदाताओं के लिए प्रक्रिया अनावश्यक रूप से जटिल हो जाती है।
सोमवार की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने भी इस बात पर गौर किया और स्पष्ट किया कि अदालत ने फॉर्म-6 में किए गए इन बदलावों को अपनी ओर से कोई मंजूरी नहीं दी थी। अदालत यह जांच करेगी कि आखिर इन बदलावों को करने के पीछे अधिकृत प्राधिकारी कौन था और क्या इसके लिए उचित कानूनी प्रक्रिया का पालन किया गया था या नहीं।
SIR (मतदाता सूची पुनरीक्षण) प्रक्रिया पर भी उठे सवाल
मतदाता सूचियों की शुद्धता और पुनरीक्षण के लिए चलाई जा रही SIR प्रक्रिया भी बहस के केंद्र में है। कार्ति चिदंबरम का तर्क है कि लोकतंत्र को मजबूत बनाए रखने के लिए लिस्ट की शुद्धता जरूरी है, लेकिन इस प्रक्रिया का मुख्य उद्देश्य हर पात्र नागरिक को मतदान के अधिकार से जोड़ना होना चाहिए, न कि दस्तावेजों के फेरबदल में किसी वैध वोटर का नाम सूची से बाहर हो जाए।
दूसरी ओर, चुनाव आयोग का यह कहना है कि SIR पूरी तरह से पारदर्शी है और इसका एकमात्र मकसद मतदाता सूची से फर्जी, दोहरी या अपात्र प्रविष्टियों को हटाकर सूची को त्रुटिहीन बनाना है। इस विषय पर कई याचिकाएं पहले से ही अदालतों में लंबित हैं, और सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल इस पर कोई अंतिम फैसला सुनाए बिना दोनों पक्षों से रिकॉर्ड मांगे हैं।
कर्नाटक में फॉर्म-7 को लेकर गरमाई सियासत
विवाद केवल फॉर्म-6 तक सीमित नहीं है, बल्कि 'फॉर्म-7' को लेकर भी राजनीतिक सरगर्मी तेज हो गई है। कार्ति चिदंबरम ने कर्नाटक का हवाला देते हुए दावा किया कि वहां एक ही विधानसभा क्षेत्र में हजारों की संख्या में फॉर्म-7 आपत्तियां दाखिल की गईं। फॉर्म-7 का इस्तेमाल आमतौर पर किसी मौजूदा मतदाता का नाम सूची से हटाने या नए नाम पर आपत्ति दर्ज कराने के लिए किया जाता है।
हालांकि, इस पर स्थिति स्पष्ट करते हुए कर्नाटक के मुख्य निर्वाचन अधिकारी वी. अंबुकुमार ने हाल ही में बयान दिया है कि केवल फॉर्म-7 का आवेदन मिल जाना किसी का नाम कटने का प्रमाण नहीं है। निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी (ERO) हर आवेदन की गहन जांच, सुनवाई और सत्यापन के बाद ही नियमानुसार अंतिम फैसला लेते हैं। राज्य में अब तक इन आवेदनों के आधार पर किसी भी वैध मतदाता का नाम नहीं काटा गया है।
भविष्य की दिशा और कानूनी लड़ाई
फिलहाल मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार अपने पद पर बने हुए हैं और उनके खिलाफ किसी भी तरह की तत्काल कार्रवाई या रोक से सुप्रीम कोर्ट ने इनकार कर दिया है। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने देश की चुनावी व्यवस्था, संवैधानिक संस्थाओं की कार्यशैली और पारदर्शिता पर एक बार फिर राष्ट्रीय स्तर पर बहस छेड़ दी है। 13 अक्टूबर को होने वाली अगली सुनवाई में जब केंद्र सरकार और चुनाव आयोग अपने आधिकारिक दस्तावेज और जवाब अदालत के सामने रखेंगे, तभी यह साफ हो पाएगा कि आने वाले दिनों में चुनाव आयोग के इन फैसलों पर अदालत का रुख क्या रहता है।