मध्य प्रदेश के अनूपपुर जिले से हाल ही में एक ऐसी खबर सामने आई जिसने प्रशासनिक हलकों में हड़कंप मचा दिया था। जिला मुख्यालय के एक वेयरहाउस से अचानक 24 इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन यानी ईवीएम (EVM) के गायब होने की बात सामने आई, जिसके बाद पुलिस में चोरी की धाराओं के तहत एफआईआर (FIR) भी दर्ज करा दी गई। इस घटना ने राजनीतिक गलियारों से लेकर आम जनता के बीच भी कई तरह की चर्चाओं को हवा दे दी थी। लेकिन, जब इस पूरे मामले की परतें उघड़ीं और गहराई से जांच की गई, तो जो सच सामने आया उसने सभी को हैरान कर दिया। मशीनें चोरी नहीं हुई थीं, बल्कि यह प्रशासनिक लापरवाही और रिकॉर्ड अपडेट न होने का एक बड़ा मामला निकला।
क्या था पूरा मामला और कैसे शुरू हुआ शक?
यह पूरा वाकया अनूपपुर जिला मुख्यालय स्थित पुराने तहसील कार्यालय भवन के वेयरहाउस से जुड़ा हुआ है। हाल ही में पुराने तहसील भवन के डिस्मेंटल (तोड़ने) का कार्य चल रहा था, जिसके चलते वहां स्थित वेयरहाउस भी प्रभावित हुआ। सुरक्षा और व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए 21 सितंबर को यहां रखी गई ईवीएम को शासकीय पॉलीटेक्निक कॉलेज में शिफ्ट किया गया।
मशीनों को शिफ्ट करने के बाद जब 24 से 28 सितंबर के बीच इनका भौतिक सत्यापन (Physical Verification) कराया गया, तो अधिकारियों के होश उड़ गए। गिनती के दौरान 24 मशीनें कम पाई गईं। स्थिति तब और गंभीर हो गई जब जांच के दौरान वेयरहाउस के कमरे की पिछली दीवार टूटी हुई मिली। टूटी दीवार और कम पाई गईं मशीनों को देखकर स्थानीय अधिकारियों ने इसे चोरी मान लिया और फौरन अनूपपुर कोतवाली थाने में अज्ञात चोरों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करवा दी गई।
जांच में खुला चौंकाने वाला सच: 2021 में ही भोपाल भेजी जा चुकी थीं मशीनें
जब पुलिस और प्रशासन ने मामले की तह तक जाने के लिए पुराने अभिलेखों और फाइलों को खंगालना शुरू किया, तो एक चौंकाने वाला सच सामने आया। उप जिला निर्वाचन अधिकारी एवं अपर कलेक्टर बलवीर रमन ने स्थिति स्पष्ट करते हुए बताया कि जिन 8 बैलेट यूनिट और 16 कंट्रोल यूनिट को 'गायब' मानकर चोरी की आशंका जताई जा रही थी, वे असल में पांच साल पहले ही जिले से बाहर भेजी जा चुकी थीं।
तथ्यों के मुताबिक, ये ईवीएम वर्ष 2014 से तहसील परिसर के पीछे एक अस्थाई कक्ष में सुरक्षित रखी गई थीं और तकनीकी रूप से खराब (Defective) थीं। वर्ष 2020 में राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा सभी जिलों से खराब मशीनों की जानकारी मांगी गई थी। इसके बाद, तत्कालीन उप जिला निर्वाचन अधिकारी सरोधन सिंह के आधिकारिक आदेश पर 11 अक्टूबर 2021 को इन सभी 24 खराब मशीनों को सुरक्षित तरीके से भोपाल भिजवा दिया गया था।
हैदराबाद में नष्ट हो चुकी हैं मशीनें
प्रशासनिक दस्तावेजों के अनुसार, भोपाल पहुंचने के बाद इन खराब और बेकार हो चुकी मशीनों को आगे की प्रक्रिया के तहत ईसीआइएल (ECIL) कंपनी, हैदराबाद भेजा गया था। वहां तय नियमों और प्रोटोकॉल के तहत इन सभी मशीनों को पूरी तरह से नष्ट (Disposed) भी कराया जा चुका है। यानी जिन मशीनों के चोरी होने का दावा किया जा रहा था, वे वर्षों पहले ही सिस्टम की प्रक्रिया के तहत नष्ट की जा चुकी थीं।
ऑनलाइन रिकॉर्ड अपडेट न होने से पैदा हुआ भारी भ्रम
अब सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि जब मशीनें 2021 में ही भोपाल भेजी जा चुकी थीं, तो सितंबर 2026 में अचानक चोरी का यह ड्रामा कैसे खड़ा हो गया? इसकी मुख्य वजह बड़ी प्रशासनिक चूक साबित हुई। मशीनों को भोपाल भेजने और नष्ट कराने की प्रक्रिया तो पूरी कर ली गई, लेकिन इसका ऑनलाइन रिकॉर्ड (Online Record) समय पर अपडेट नहीं किया गया।
सशर्त और व्यवस्थित डेटाबेस में यह प्रविष्टि दर्ज न होने के कारण पांच साल बाद जब नया भौतिक सत्यापन हुआ, तो वे मशीनें सूची में नहीं मिलीं। वेयरहाउस की टूटी दीवार ने इस शक को और मजबूत कर दिया, जिससे बिना पुराने दस्तावेजों की पूरी पड़ताल किए बिना ही सीधे पुलिस में शिकायत दर्ज करा दी गई।
लापरवाह अधिकारियों और कर्मचारियों पर टकटकी
इस पूरी घटना ने सरकारी दफ्तरों में फाइलों के रखरखाव और डिजिटल रिकॉर्डिंग की कार्यप्रणाली पर एक बड़ा सवालिया निशान खड़ा कर दिया है। एक छोटी सी मानवीय भूल या लापरवाही की वजह से पुलिस और प्रशासन को बिना बात के परेशानी उठानी पड़ी। अब इस पूरे प्रकरण की जद में अनूपपुर निर्वाचन शाखा के वे जिम्मेदार अधिकारी और कर्मचारी आ गए हैं, जिनकी जिम्मेदारी 2021 में ऑनलाइन रिकॉर्ड को अपडेट करने की थी।
निष्कर्ष
अनूपपुर की इस घटना ने यह साबित कर दिया है कि किसी भी बड़ी कार्रवाई या निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले जमीनी हकीकत के साथ-साथ पुराने अभिलेखों की मुकम्मल जांच करना कितना जरूरी है। गनीमत यह रही कि समय रहते सही दस्तावेज हाथ लग गए और एक झूठी चोरी की कहानी का पर्दाफाश होकर प्रशासनिक चूक का सच सामने आ गया।