नौकरशाही की मनमानी: आदेशों को ठेंगा दिखा रहे जिम्मेदार
प्रशासनिक मशीनरी जब नियमों और आदेशों को ताक पर रख दे, तो व्यवस्था का बेपटरी होना लाजमी है। मध्य प्रदेश की प्रशासनिक गलियारों में इन दिनों कुछ ऐसा ही नजारा देखने को मिल रहा है। राज्य प्रशासनिक सेवा (एसएएस) के 18 अधिकारियों ने शासन के आदेशों को खुली चुनौती देते हुए अब तक अपनी नई पदस्थापना वाली जगहों पर कार्यभार ग्रहण नहीं किया है। हैरानी की बात यह है कि इन सभी अधिकारियों को उनके पुराने स्थानों से एकतरफा रूप से रिलीव (कार्यमुक्त) भी किया जा चुका है, बावजूद इसके मोह और रुतबे की पकड़ इतनी मजबूत है कि वे अपनी नई चौखट पर कदम रखने को तैयार नहीं हैं।
यह स्थिति तब है जब राज्य का सामान्य प्रशासन विभाग (जीएडी) लगातार प्रशासनिक कसावट और सुशासन के दावे कर रहा है। लेकिन मैदानी हकीकत इन दावों की पोल खोलती नजर आ रही है। एक तरफ जहां सरकार जनता के विकास कार्यों को गति देने के लिए तबादला एक्सप्रेस चलाती है, वहीं दूसरी तरफ अमले की यह मनमानी विकास की रफ्तार पर सीधा ब्रेक लगा रही है।सामान्य प्रशासन विभाग के आदेश हवा में
सामान्य प्रशासन विभाग किसी भी राज्य सरकार का सबसे अहम और सर्वोच्च नीतिगत विभाग माना जाता है। इस विभाग से जारी होने वाले हर एक आदेश का पालन निचले स्तर तक पूरी निष्ठा के साथ किया जाना अपेक्षित होता है। लेकिन, हालिया घटनाक्रम ने यह साबित कर दिया है कि कुछ चुनिंदा अधिकारियों के लिए इन आदेशों के कोई मायने नहीं रह गए हैं।
क्यों नहीं पहुंच रहे नए जिलों में?
प्रशासनिक सूत्रों की मानें तो इन 18 अधिकारियों के पीछे न जाने कौन सी ऐसी मजबूरियां या राजनीतिक संरक्षण हैं, जो उन्हें नए जिलों में जाने से रोक रहे हैं। जानकारों का कहना है कि इसके पीछे मुख्य कारण निम्नलिखित हो सकते हैं:
- मलाईदार पोस्टिंग का मोह: पुराने जिलों या विभागों में जमे रहने के लिए हर संभव जुगत लगाना।
- राजनीतिक और प्रशासनिक रसूख: उच्च स्तर पर अपनी पहुंच का इस्तेमाल कर आदेश को बदलवाने या रद्द करवाने की कोशिश करना।
- नई जगहों की चुनौतियों से बचना: कुछ अधिकारी उन जिलों में जाने से कतराते हैं जहां काम का दबाव ज्यादा होता है या चुनावी व अन्य प्रशासनिक चुनौतियां अधिक होती हैं।
जिलों में बुरी तरह प्रभावित हो रहा कामकाज
अधिकारियों के इस रवैये का सबसे बड़ा खमियाजा आम जनता और प्रशासनिक व्यवस्था को भुगतना पड़ रहा है। एक तरफ पुराना जिला छोड़ चुके ये अधिकारी वहां अब कोई जिम्मेदारी नहीं ले रहे हैं, और दूसरी तरफ नए जिले में इन्होंने अब तक अपनी उपस्थिति दर्ज नहीं कराई है। इस दोहरी स्थिति के कारण कई जिलों में प्रशासनिक कामकाज पूरी तरह से ठप पड़ गया है।
विशेषकर राजस्व विभाग, निर्वाचन से जुड़े कार्य और जनसुनवाई जैसे महत्वपूर्ण मोर्चों पर इन पदों के खाली रहने से आम नागरिकों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। जनता अपने छोटे-छोटे कामों के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने को मजबूर है, जबकि जिम्मेदार कुर्सियां खाली पड़ी हैं या फिर प्रभार के भरोसे चल रही हशासन स्तर पर बढ़ी हलचल, हो सकती है बड़ी कार्इस पूरे घटनाक्रम के बाद अब मंत्रालय स्तर पर सुगबुगाहट तेज हो गई है। सामान्य प्रशासन विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों ने इस मामले को बेहद गंभीरता से लिया है। सूत्रों के मुताबिक, अनुशासनहीनता की श्रेणी में आने वाले इस कृत्य के बाद शासन इन अधिकारियों पर शिकंजा कसने की तैयारी कर रहा है।
यदि जल्द ही इन 18 अधिकारियों ने अपनी नई पदस्थापना वाली जगहों पर कार्यभार ग्रहण नहीं किया, तो इनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई (डिसिप्लिनरी एक्शन) तय मानी जा रही है। इसमें निलंबित किए जाने से लेकर विभागीय जांच तक बिठाए जाने के संकेत मिल रहे हैं।
सुशासन के दावों पर उठ रहे सवाल
मध्य प्रदेश सरकार प्रदेश में पारदर्शी, जवाबदेह और त्वरित प्रशासन देने के लाख दावे करती है, लेकिन इस तरह के वाकये उन दावों की हवा निकाल देते हैं। सवाल यह उठता है कि क्या एक लोक सेवक शासन के आदेशों की अवहेलना करने की छूट पा सकता है? क्या प्रशासनिक तंत्र में अब वरिष्ठ अधिकारियों के निर्देशों का कोई डर नहीं बचा है?
आने वाले दिनों में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि क्या शासन इन रसूखदार अधिकारियों पर अपनी धमक कायम कर पाता है या फिर यह मामला भी फाइलों के बीच दम तोड़ देता है। फिलहाल, जनता की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि कब ये 18 अफसर अपने मोह का त्याग कर जनता की सेवा के लिए नए कार्यभार को संभालते हैं।रवाई
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