उत्तर प्रदेश की राजनीति में जैसे-जैसे आगामी विधानसभा चुनाव की आहट नजदीक आ रही है, ज़मीनी स्तर पर सियासी पारा चढ़ने लगा है। मुगलसराय विधानसभा क्षेत्र में इस बार चुनावी माहौल कुछ बदला-बदला सा नजर आ रहा है। लंबे समय से उपेक्षित बुनियादी मुद्दों को लेकर अब स्थानीय नेताओं ने सीधे जनता के बीच पैठ बनानी शुरू कर दी है।
ग्राम सभा महेवा में सजी चौपाल, जुटी भारी भीड़
इसी चुनावी हलचल के बीच जन सेवा दल के भावी प्रत्याशी मुकेश कुमार शर्मा ने अपनी पार्टी के पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं के साथ ग्राम सभा महेवा में एक व्यापक जनसंपर्क अभियान चलाया। गांव में आयोजित जनचौपाल में महिलाओं, युवाओं और बुजुर्गों की भारी मौजूदगी दर्ज की गई।
महेवा गांव के निवासियों ने बिना किसी झिझक के अपनी बुनियादी समस्याओं को मुकेश शर्मा के सामने रखा। ग्रामीणों का कहना था कि वे वर्षों से इन प्राथमिक सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं:
- टूटी सड़कें और आवागमन में हो रही भारी परेशानी
- पीने के स्वच्छ पानी की विकराल समस्या
- बिजली की अनियमित आपूर्ति और लो-वोल्टेज
- क्षेत्रीय विकास और स्थानीय युवाओं के अवसरों की उपेक्षा
'नेता नहीं, बेटा और भाई बनकर खड़ा रहूंगा'
ग्रामीणों की एक-एक बात को संजीदगी से सुनने के बाद मुकेश कुमार शर्मा ने जनसभा को संबोधित किया। उनके सीधे संवाद और आत्मीय लहजे ने लोगों का ध्यान खींचा।
'यदि आप लोगों का आशीर्वाद और सहयोग मिला, तो सत्ता में आने पर ग्राम सभा और पूरी विधानसभा की समस्याओं का स्थायी समाधान मेरी पहली प्राथमिकता होगी। मैं आपके बीच नेता बनकर नहीं, बल्कि आपका बेटा और भाई बनकर हर सुख-दुख में आपके साथ खड़ा रहूंगा।'
महिलाओं और युवाओं की भागीदारी से बढ़ी हलचल
इस जनचौपाल की सबसे खास बात रही महिलाओं की बढ़-चढ़कर भागीदारी। स्थानीय महिलाओं और युवाओं ने साफ कहा कि अब वे केवल वादों पर नहीं, बल्कि ज़मीनी जुड़ाव और नीयत को देखकर अपना फैसला लेंगे। मुकेश शर्मा के आश्वासनों और जन सेवा दल की नीतियों से प्रभावित होकर ग्रामीणों ने चुनाव में एकजुट होकर साथ देने का संकल्प लिया।
क्षेत्रीय राजनीति पर क्या पड़ेगा असर?
मुगलसराय क्षेत्र में परंपरागत राजनीतिक दलों के बीच जन सेवा दल की यह बढ़ती सक्रियता नए समीकरण गढ़ रही है। जिस तरह से जमीनी मुद्दों को उठाकर जनता से सीधा आत्मीय जुड़ाव बनाया जा रहा है, उसने अन्य बड़े सियासी खेमों की भी चिंता बढ़ा दी है। अब देखना यह होगा कि जनचौपालों का यह जनसमर्थन चुनाव परिणामों में कितना बदल पाता है।