महाराष्ट्र के यवतमाल जिले के उमरखेड़ से एक ऐसी ही झकझोर देने वाली खबर सामने आई है। जहां अपनी ही ज़मीन पर मालिकाना हक और अलग 'सातबारा' (Satbara) पाने के लिए अन्नदाताओं को कड़कड़ाती ठंड या तीखी धूप में नहीं, बल्कि सीधे आमरण अनशन की राह चुननी पड़ी है। खरबी और बंदीटाकली गांवों के किसान इन दिनों उपविभागीय अधिकारी कार्यालय के सामने भूख हड़ताल पर बैठे हैं और उनकी यह जिद तब तक जारी रहने की बात कही जा रही है, जब तक प्रशासन उनकी सुध नहीं लेता।
आखिर क्या है पूरा विवाद और किसानों की मुख्य मांगें?
यह पूरा मामला भोगवटदार वर्ग-2 और वनजमीन के आपसी बंटवारे से जुड़ा हुआ है। पीढ़ियों से चली आ रही पारिवारिक सहमति और बंटवारे की प्रक्रिया को राजस्व अभिलेखों (Revenue Records) में दर्ज करने की मांग को लेकर ये किसान अड़े हुए हैं। किसानों का साफ कहना है कि:
- परिवार के प्रत्येक वारिस के नाम पर स्वतंत्र 'सातबारा' (उतार) जारी किया जाए।
- हक छोड़ने (Relinquishment) और बंटवारे की कानूनी प्रक्रिया को बिना किसी देरी के पूरा किया जाए।
- वर्षों से लंबित पड़े मामलों को राजस्व विभाग जल्द से जल्द अपने पोर्टल और दस्तावेजों में अपडेट करे।
संभाजी सरकुंडे का बड़ा हमला: 'अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर उठ रहे सवाल'
इस आंदोलन को और अधिक बल तब मिला जब अनशन स्थल पर पूर्व आदिवासी विकास परियोजना आयुक्त संभाजी सरकुंडे पहुंचे। उन्होंने किसानों के बीच जाकर उनका हौसला बढ़ाया और स्थानीय प्रशासनिक अधिकारियों पर बेहद गंभीर आरोप लगाए। सरकुंडे ने सीधे तौर पर कहा कि राजस्व अधिकारी जानबूझकर आदिवासियों के वनपट्टे उनके नाम करने में टालमटोल कर रहे हैं और कानून की धज्जियां उड़ा रहे हैं।
"यदि आदिवासियों और किसानों को उनके वैध अधिकारों से वंचित रखने का यह सिलसिला बंद नहीं हुआ, तो प्रताड़ित करने वाले अधिकारियों के खिलाफ सख्त आपराधिक मामले दर्ज किए जाएंगे," संभाजी सरकुंडे ने अपनी दो टूक चेतावनी में कहा।
उन्होंने आगे याद दिलाया कि साल 2006 में बने वनाधिकार कानून (Forest Rights Act) के तहत आदिवासियों को वनभूमि के कानूनी अधिकार देने का स्पष्ट प्रावधान है। इसके बावजूद, राजस्व विभाग के नुमाइंदे अक्सर यह कहकर पल्ला झाड़ लेते हैं कि वनपट्टे देने का अधिकार उनके पास नहीं है, जो कि सरासर गैर-जिम्मेदाराना रवैया है।
भेदभाव का आरोप: गैर-आदिवासियों को फायदा, आदिवासियों की अनदेखी
आंदोलनकारियों और समर्थकों का आरोप है कि प्रशासन दोहरी नीति अपना रहा है। स्वतंत्रता से पहले और बाद में भी कई आदिवासी और गैर-आदिवासी परिवारों को वनभूमि के पट्टे मिले थे। वन क्षेत्र में दोनों समुदायों के लोग आज भी साथ रह रहे हैं।
हालांकि, आरोप है कि गैर-आदिवासियों के मामलों में 'गुडफेथ' (Good Faith) का हवाला देकर फेरफार और नाम दर्ज कर लिए गए, जबकि आदिवासी किसानों के वैध बंटवारा पत्रों को नजरअंदाज कर दिया गया। जब इस बारे में अधिकारियों से सवाल पूछे जाते हैं, तो उनके पास कोई संतोषजनक जवाब नहीं होता। इसे साफ तौर पर आदिवासी किसानों का उत्पीड़न माना जा रहा है।
प्रशासन की चुप्पी पर बढ़ा आक्रोश
खरबी और बंदीटाकली के किसानों के इस आमरण अनशन को शुरू हुए दिन बीत चुके हैं, लेकिन इसके बावजूद प्रशासनिक स्तर पर कोई ठोस प्रतिक्रिया या सकारात्मक पहल देखने को नहीं मिली है। इस उदासीनता पर संभाजी सरकुंडे ने गहरी नाराजगी व्यक्त की है।
अनशन स्थल पर किसानों के साथ कई दिग्गज और स्थानीय नेता भी अपनी एकजुटता दिखाने पहुंचे। इस दौरान तालुका कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष दत्तराव शिंदे, पूर्व नायब तहसीलदार उत्तम पांडे, खरबी के सरपंच सदानंद पांडे के अलावा अनशन पर बैठे विलास आंबोरे, गणपत बोंबले, लक्ष्मण हराल, बालाजी राजने और संजय ढोले प्रमुख रूप से उपस्थित रहे। सभी ने एक स्वर में चेतावनी दी है कि अगर समय रहते न्याय नहीं मिला, तो आंदोलन को और भी उग्र किया जाएगा।
अब आगे क्या?
सवाल यह उठता है कि क्या सरकार और स्थानीय प्रशासन किसानों के सब्र का इम्तिहान और अधिक लेगा? वनाधिकार कानूनों का सही क्रियान्वयन न होना प्रशासनिक तंत्र की कार्यशैली पर बड़ा प्रश्नचिह्न लगाता है। अब देखना यह होगा कि इस गरमागरम माहौल के बीच जिला प्रशासन कब नींद से जागता है और इन किसानों को उनका हक यानी अलग 'सातबारा' नसीब होता है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
Q1: उमरखेड़ में किसान क्यों अनशन पर बैठे हैं?
Ans: किसान वनजमीन के आपसी बंटवारे की प्रक्रिया को राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज कराने और परिवार के प्रत्येक वारिस के नाम पर स्वतंत्र 'सातबारा' जारी करने की मांग को लेकर अनशन कर रहे हैं।
Q2: इस आंदोलन को किसका समर्थन मिल रहा है?
Ans: इस आंदोलन को पूर्व आदिवासी विकास परियोजना आयुक्त संभाजी सरकुंडे के अलावा स्थानीय सरपंच, पूर्व अधिकारियों और विभिन्न राजनीतिक-सामाजिक कार्यकर्ताओं का भरपूर समर्थन मिल रहा है।
Q3: वनाधिकार कानून 2006 क्या कहता है?
Ans: वर्ष 2006 के वनाधिकार कानून के तहत पात्र आदिवासियों और वनक्षेत्र में रहने वाले परिवारों को वनभूमि पर कानूनी अधिकार और पट्टे देने का स्पष्ट प्रावधान है।