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नेपाल की बाढ़ पर 44 देशों की हुंकार, जलवायु न्याय के लिए वैश्विक मांग तेज

नेपाल की बाढ़ पर 44 देशों की हुंकार, जलवायु न्याय के लिए वैश्विक मांग तेज

दुनिया के 44 अल्पविकसित देशों ने हाल ही में नेपाल में आई भयंकर बाढ़ और प्राकृतिक आपदा को लेकर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए वैश्विक मंच पर जलवायु न्याय की पुरजोर मांग उठाई है। टिमोर-लेस्ते की राजधानी दिली में आयोजित एक उच्चस्तरीय सम्मेलन में इन देशों ने न केवल नेपाल के साथ अपनी पूरी एकजुटता दिखाई, बल्कि दुनिया के बड़े और औद्योगिक रूप से संपन्न देशों को उनके ऐतिहासिक कार्बन उत्सर्जन के प्रति जवाबदेह ठहराने की भी बात कही है।

हिमालयी क्षेत्र में मंडराता बड़ा खतरा

हाल के दिनों में नेपाल समेत पूरे हिमालयी क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन के दुष्परिणाम बेहद भयावह रूप में सामने आए हैं। तापमान में लगातार हो रही वृद्धि के कारण ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं, जिसके परिणामस्वरूप अचानक आने वाली बाढ़, हिमस्खलन और पहाड़ों के खिसकने की घटनाओं में बेतहाशा बढ़ोतरी हुई है। भोटेकोशी नदी में आई विनाशकारी बाढ़ ने बड़े पैमाने पर जनजीवन को अस्त-व्यस्त कर दिया है। हजारों लोग बेघर हो गए हैं और बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान पहुंचा है।

इसी दर्दनाक पृष्ठभूमि को ध्यान में रखते हुए, दिली सम्मेलन में शामिल 44 अल्पविकसित देशों (LDCs) ने एक स्वर में कहा कि नेपाल की यह त्रासदी केवल एक क्षेत्रीय आपदा नहीं है, बल्कि यह पूरी मानवता और ग्लोबल वार्मिंग के बढ़ते खतरों की एक गंभीर चेतावनी है।

जलवायु वित्त व्यवस्था में बड़े बदलाव की पुरजोर मांग

सम्मेलन में पारित घोषणापत्र के अनुसार, जलवायु परिवर्तन के कारण गरीब और विकासशील देश पहले से ही आर्थिक तंगी का सामना कर रहे हैं। इन देशों पर कर्ज का बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है। स्थिति यह है कि आपदाओं से उबरने के लिए उन्हें जो कर्ज लेना पड़ता है, वह उनकी अर्थव्यवस्था को और कमजोर कर देता है।

इस संकट से निपटने के लिए इन 44 देशों ने स्पष्ट रूप से मांग की है कि मौजूदा जलवायु वित्त व्यवस्था (Climate Finance Architecture) में आमूल-चूल परिवर्तन किए जाएं। अनुदान आधारित संसाधनों (Grant-based resources) तक आसान और पारदर्शी पहुंच सुनिश्चित की जानी चाहिए, ताकि आपदा प्रभावित देशों को कर्ज के जाल में न फंसना पड़े।

ऐतिहासिक उत्सर्जकों की तय हो जिम्मेदारी

जलवायु न्याय की इस नई मुहिम का सबसे अहम पहलू उन देशों को कटघरे में खड़ा करना है, जो ग्लोबल वार्मिंग और ऐतिहासिक रूप से अत्यधिक कार्बन उत्सर्जन के लिए मुख्य रूप से जिम्मेदार हैं। इन अल्पविकसित देशों ने दो टूक शब्दों में कहा कि वैश्विक स्तर पर सबसे कम कार्बन उत्सर्जन करने वाले देश आज जलवायु परिवर्तन के सबसे बुरे प्रभावों को झेल रहे हैं।

यह विडंबना ही है कि नुकसान उन देशों को उठाना पड़ रहा है जिनका पर्यावरण को प्रदूषित करने में योगदान नगण्य था। इसलिए, ऐतिहासिक उत्सर्जक देशों का नैतिक और कानूनी दायित्व बनता है कि वे इस 'हानि और नुकसान' (Loss and Damage) की भरपाई के लिए आगे आएं।

वर्ष 2035 तक वित्त सहायता बढ़ाकर 128 अरब डॉलर करने का प्रस्ताव

सम्मेलन में ठोस वित्तीय लक्ष्यों पर भी मंथन किया गया। अल्पविकसित देशों ने मांग रखी है कि वर्ष 2035 तक जलवायु संबंधी वित्तीय सहायता को बढ़ाकर सालाना कम से कम 128 अरब अमेरिकी डॉलर किया जाए। वर्तमान वित्तीय सहायता नाकाफी साबित हो रही है, और यदि समय रहते इसमें बड़ा इजाफा नहीं किया गया, तो भविष्य में इसके परिणाम पूरी दुनिया के लिए विनाशकारी हो सकते हैं।

  • तापमान वृद्धि पर लगाम: वैश्विक तापमान में हो रही वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस से नीचे रखने के लक्ष्यों को पूरी ईमानदारी से लागू किया जाए।
  • तकनीक का हस्तांतरण: विकासशील देशों को आधुनिक और पर्यावरण अनुकूल (Eco-friendly) तकनीकें कम लागत पर उपलब्ध कराई जाएं।
  • निवेश के नए अवसर: कार्बन उत्सर्जन कम करने वाले प्रयासों को गति देने के लिए ग्रीन इन्वेस्टमेंट्स को बढ़ावा दिया जाए।

वैश्विक समुदाय के सामने एक बड़ी परीक्षा

विशेषज्ञों का मानना है कि नेपाल की इस आपदा और 44 देशों की इस एकजुटता ने दुनिया के विकसित देशों के सामने एक बार फिर से अपनी प्रतिबद्धताओं को निभाने की परीक्षा खड़ी कर दी है। केवल वादों और सम्मेलनों से अब काम नहीं चलने वाला है। जब तक जमीनी स्तर पर वित्तीय और तकनीकी मदद नहीं पहुंचती, तब तक नेपाल जैसे देश इस जलवायु संकट के चक्रव्यूह से बाहर नहीं निकल पाएंगे।

आने वाले समय में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि वैश्विक मंच पर इन 44 देशों की आवाज का कितना असर होता है और क्या बड़े देश जलवायु न्याय के इस मोर्चे पर अपनी ऐतिहासिक जिम्मेदारी निभाने के लिए तैयार होते हैं या नहीं। फिलहाल, नेपाल की जनता के साथ पूरी दुनिया के कमजोर देश एकजुट होकर एक मजबूत संदेश दे चुके हैं कि जलवायु न्याय अब एक विकल्प नहीं, बल्कि जीने की अनिवार्य शर्त बन चुका है।

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ममता पाठक

ममता पाठक

Chief Editor (विदेश खबरें)

ममता पाठक न्यूज़रूम की संपादकीय दिशा तय करने वाली प्रमुख स्तंभ हैं। अंतरराष्ट्रीय खबरों की गहरी समझ और वर्षों के अनुभव के साथ, वे कंटेंट की गुणवत्त...

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