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नेपाल बाढ़ के बाद सोशल मीडिया पर फर्जी वीडियो का नया संकट, 70 लाख व्यूज पार

नेपाल बाढ़ के बाद सोशल मीडिया पर फर्जी वीडियो का नया संकट, 70 लाख व्यूज पार

प्रकृति के तांडव ने जब किसी देश को झकझोर दिया हो, तब उस देश के सामने राहत और पुनर्वास की चुनौती सबसे बड़ी हो जाती है। लेकिन मौजूदा समय में नेपाल एक बिल्कुल ही अलग और अजीबोगरीब संकट के दौर से गुजर रहा है। भीषण बाढ़ और लैंडस्लाइड की विभीषिका झेल रहे नेपाल के लिए अब सोशल मीडिया पर तैरती भ्रामक जानकारियां एक नया जख्म बन चुकी हैं। देश पहले ही बुनियादी ढांचे के ढहने, जान-माल के भारी नुकसान और बेघर हुए लोगों के दर्द से उबरने की जद्दोजहद में है, ऐसे में डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर परोसे जा रहे फर्जी वीडियो ने प्रशासन और आम जनता की मुश्किलें कई गुना बढ़ा दी हैं।

हाल ही में सामने आए ताजा आंकड़ों और रिपोर्ट्स के मुताबिक, नेपाल की मौजूदा बाढ़ की स्थिति को लेकर इंटरनेट पर सनसनीखेज और पूरी तरह से मनगढ़ंत वीडियो धड़ल्ले से शेयर किए जा रहे हैं। एल्गोरिदम की इस अंधी दौड़ में सच्चाई कहीं पीछे छूट गई है और व्यूज बटोरने की होड़ में फर्जी खबरों का बाजार गर्म है। स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि आपदा से जुड़े एक फर्जी वीडियो को महज कुछ ही दिनों में 70 लाख से अधिक बार देखा जा चुका है। यह आंकड़ा केवल एक वीडियो का है, जबकि इस तरह की दर्जनों भ्रामक क्लिप्स रोजाना सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफॉर्म्स पर ट्रेंड कर रही हैं।

आपदा के बीच सनसनी फैलाने का खतरनाक खेल

जब कोई देश या समाज किसी बड़े प्राकृतिक संकट का सामना कर रहा होता है, तब वहां के नागरिकों को सबसे ज्यादा जरूरत सटीक सूचना, मौसम के पूर्वानुमान और राहत कार्यों की सही जानकारी की होती है। ऐसे संवेदनशील समय में जब कोई व्यक्ति या ग्रुप पुराने वीडियो, किसी अन्य देश की पुरानी आपदा की फुटेज या फिर वीएफएक्स (VFX) से तैयार किए गए एडिटेड वीडियो को वर्तमान नेपाल बाढ़ का बताकर शेयर करता है, तो यह केवल अफवाह नहीं बल्कि एक प्रकार का अपराध बन जाता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के फर्जी वीडियो न सिर्फ जनता के बीच अनावश्यक डर और पैनिक पैदा करते हैं, बल्कि सरकारी मशीनरी और राहत एजेंसियों का ध्यान भी भटकाते हैं। आपदा प्रबंधन टीमों को जब वास्तविक मदद पहुंचाने और घायलों को रेस्क्यू करने पर ध्यान देना चाहिए, तब उन्हें सोशल मीडिया पर वायरल हो रही झूठी खबरों का खंडन करने में अपनी ऊर्जा खर्च करनी पड़ रही है।

70 लाख व्यूज वाले वीडियो ने खोली पोल

सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे इन फर्जीवाड़ों में एक वीडियो ने सभी सीमाओं को पार कर दिया। इस वीडियो में नेपाल के किसी जाने-पहचाने इलाके में भारी तबाही का ऐसा खौफनाक मंजर दिखाया गया, जो हकीकत में कभी हुआ ही नहीं था। वीडियो के साथ लिखे गए कैप्शन और बैकग्राउंड में इस्तेमाल किए गए गंभीर संगीत ने इसे इतना असरदार बना दिया कि आम लोग बिना किसी छानबीन के इसे सच मान बैठे। नतीजा यह हुआ कि देखते ही देखते इस फर्जी वीडियो को 70 लाख से ज्यादा व्यूज मिल गए।

इस तरह के मामलों ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि आज के दौर में गलत सूचनाएं (Misinformation) किसी भी प्राकृतिक आपदा से कम खतरनाक नहीं हैं। यह समाज के मानसिक स्वास्थ्य पर भी बुरा असर डालती हैं, क्योंकि जो लोग अपने रिश्तेदारों और प्रियजनों की तलाश में हैं, वे ऐसे झूठे और डरावने वीडियो देखकर और अधिक मानसिक तनाव का शिकार हो जाते हैं।

प्रशासन और साइबर सेल की कड़ी नजर

इस गंभीर स्थिति को भांपते हुए नेपाल के साइबर सुरक्षा अधिकारियों और स्थानीय प्रशासन ने कमर कस ली है। फर्जी वीडियो और अफवाहें फैलाने वाले अकाउंट्स की पहचान की जा रही है। अधिकारियों ने चेतावनी दी है कि जो भी लोग सोशल मीडिया पर भ्रम की स्थिति पैदा कर रहे हैं या सनसनी फैलाने के लिए पुराने फुटेज का इस्तेमाल कर रहे हैं, उनके खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

  • भ्रामक वीडियो पर लगाम: पुलिस की साइबर विंग ऐसे तमाम लिंक्स और प्रोफाइल्स की मॉनिटरिंग कर रही है जो लगातार फेक न्यूज परोस रहे हैं।
  • आधिकारिक स्रोतों पर भरोसा: सरकार लगातार नागरिकों से अपील कर रही है कि वे किसी भी वीडियो को फॉरवर्ड करने से पहले उसकी प्रमाणिकता की जांच अवश्य करें।
  • फैक्ट-चेकिंग की अनिवार्यता: मीडिया रिपोर्ट्स और आधिकारिक बुलेटिन को ही अंतिम सत्य मानें।

डिजिटल साक्षरता की बड़ी जरूरत

यह पूरी घटना न केवल नेपाल बल्कि पूरे दक्षिण एशियाई क्षेत्र के लिए एक बड़ी सीख है। इंटरनेट और स्मार्टफोन की पहुंच बढ़ने के साथ-साथ फेक न्यूज का खतरा भी महामारी की तरह फैल रहा है। जब तक आम नागरिक खुद डिजिटल रूप से साक्षर नहीं होंगे और 'फॉरवर्ड' बटन दबाने से पहले सोचेंगे नहीं, तब तक इस तरह के संकटों से पूरी तरह निपटना मुश्किल होगा।

नेपाल इस समय एक दोहरी लड़ाई लड़ रहा है—एक तरफ वह पानी के सैलाब और उससे टूटी जिंदगियों को जोड़ने में जुटा है, तो दूसरी तरफ वह उस डिजिटल सैलाब से भी मुकाबला कर रहा है जो अफवाहों के जरिए देश की शांति और व्यवस्था को डुबोने पर आमादा है। यह वक्त सभी के लिए सतर्क रहने, संयम बरतने और केवल पुख्ता जानकारियों पर ही भरोसा करने का है।

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ममता पाठक

ममता पाठक

Chief Editor (विदेश खबरें)

ममता पाठक न्यूज़रूम की संपादकीय दिशा तय करने वाली प्रमुख स्तंभ हैं। अंतरराष्ट्रीय खबरों की गहरी समझ और वर्षों के अनुभव के साथ, वे कंटेंट की गुणवत्त...

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