देशभर में डिजिटल भुगतान (Digital Payments) का दायरा तेजी से बढ़ रहा है, और छोटे से लेकर बड़े लेन-देन के लिए यूपीआई (UPI) आम जनता की पहली पसंद बन चुका है। चाय की टपरी से लेकर बड़े शॉपिंग मॉल तक, हर जगह क्यूआर कोड के जरिए भुगतान स्वीकार किया जा रहा है। हालांकि, इस डिजिटल क्रांति के बीच एक ऐसा सेक्टर है जिसके लिए यूपीआई ट्रांजैक्शन अब मुनाफे के बजाय सिरदर्द बनता जा रहा है। हम बात कर रहे हैं देश के पेट्रोल पंपों की। हाल ही में, ऑल इंडिया पेट्रोलियम डीलर्स एसोसिएशन (AIPDA) ने इस गंभीर मुद्दे को लेकर सीधे देश की वित्त मंत्री को एक पत्र लिखा है, जिसमें पेट्रोल पंपों को यूपीआई भुगतान पर लगने वाले एमडीआर (Merchant Discount Rate) चार्ज से पूरी तरह छूट दिए जाने की पुरजोर मांग की गई है।
पेट्रोलियम डीलर्स एसोसिएशन की वित्त मंत्री से गुहार
ऑल इंडिया पेट्रोलियम डीलर्स एसोसिएशन द्वारा भेजे गए इस आधिकारिक पत्र ने एक बार फिर ईंधन खुदरा विक्रेताओं (Fuel Retailers) की वित्तीय समस्याओं को राष्ट्रीय पटल पर ला खड़ा किया है। एसोसिएशन का कहना है कि पेट्रोल और डीजल जैसे पेट्रोलियम उत्पादों पर डीलर्स का मुनाफा पहले से ही तय और काफी सीमित होता है। ऐसे में जब ग्राहक डिजिटल माध्यम यानी यूपीआई से भुगतान करते हैं, तो बैंक और पेमेंट गेटवे प्रदाता मर्चेंट डिस्काउंट रेट या अन्य शुल्क के रूप में एक बड़ा हिस्सा काट लेते हैं। डीलर्स का तर्क है कि बहुत कम मार्جिन वाले इस व्यवसाय में इस तरह के ट्रांजैक्शन चार्जेस का बोझ उठाना उनके लिए नामुमकिन होता जा रहा है, जिससे उनका बिजनेस मॉडल संकट में आ गया है।
पत्र में इस बात पर विशेष जोर दिया गया है कि सरकार खुद देश में डिजिटल इकोनॉमी को बढ़ावा दे रही है और नागरिकों को कैशलेस लेनदेन करने के लिए प्रोत्साहित कर रही है। पेट्रोल पंपों ने भी सरकार के इस विजन का पूरा समर्थन किया है और अपने यहां डिजिटल पेमेंट के अधिकतम विकल्प उपलब्ध कराए हैं। लेकिन इसके एवज में डीलर्स को जो आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है, उस पर नीति निर्माताओं को गंभीरता से विचार करना चाहिए। डीलर्स का यह भी कहना है कि यदि समय रहते इस समस्या का समाधान नहीं निकाला गया, तो आने वाले समय में पेट्रोल पंप संचालकों के लिए डिजिटल पेमेंट स्वीकार करना आर्थिक रूप से कठिन हो जाएगा।
क्या है एमडीआर (MDR) चार्ज और क्यों है यह विवाद की जड़?
आम नागरिक जब किसी मर्चेंट को डिजिटल भुगतान करते हैं, तो उस ट्रांजैक्शन को प्रोसेस करने के लिए बैंक या फिनटेक कंपनियां एक तय शुल्क वसूलती हैं, जिसे एमडीआर कहा जाता है। क्रेडिट और डेबिट कार्ड के मामलों में यह चार्ज काफी समय से लागू है। हालांकि, सरकार ने यूपीआई को लोकप्रिय बनाने के लिए शुरुआत में इस पर एमडीआर को शून्य कर दिया था, लेकिन हालिया समय में अलग-अलग माध्यमों और मर्चेंट कैटेगरीज के तहत विभिन्न वित्तीय शुल्क और नियमों के फेर में पेट्रोल पंपों के मुनाफे पर इसका बुरा असर पड़ रहा है।
- सीमित मार्जिन: पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों में डीलर्स का कमिशन प्रति लीटर के हिसाब से तय होता है, जो वैश्विक कीमतों और टैक्स स्ट्रक्चर के अधीन होता है।
- высокий वॉल्यूम (High Volume Transactions): पेट्रोल पंपों पर रोजाना हजारों की संख्या में छोटे और बड़े ट्रांजैक्शन होते हैं, जिससे कुल शुल्क का आंकड़ा काफी बड़ा हो जाता है।
- कैशलेस बनाम प्रॉफिट: डिजिटल भुगतान की सुविधा देना आज की जरूरत है, लेकिन यह डीलर्स के लिए घाटे का सौदा साबित हो रहा है।
ईंधन खुदरा विक्रेताओं की अन्य प्रमुख समस्याएं
सिर्फ यूपीआई चार्ज ही नहीं, बल्कि ऑल इंडिया पेट्रोलियम डीलर्स एसोसिएशन समय-समय पर ईंधन डीलर्स से जुड़ी अन्य कई समस्याओं को भी उठाता रहा है। इसमें मुख्य रूप से इंधन के इवेपोरेशन लॉस (वाष्पीकरण से होने वाला नुकसान), डीलर कमीशन में लंबे समय से संशोधन न होना और ट्रांसपोर्टेशन कॉस्ट शामिल हैं। लेकिन मौजूदा दौर में यूपीआई ट्रांजैक्शन का मुद्दा सबसे ज्यादा तूल पकड़ रहा है क्योंकि पेट्रोल पंपों पर अब कैश का लेन-देन घटकर बहुत कम रह गया है और 80% से ज्यादा भुगतान अब डिजिटल माध्यमों से ही हो रहे हैं।
आगे क्या हो सकता है?
वित्त मंत्री को लिखे गए इस पत्र के बाद अब यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार या वित्त मंत्रालय इस पर क्या रुख अपनाता है। जानकारों का मानना है कि यदि सरकार डिजिटल पेमेंट के मूवमेंट को बनाए रखना चाहती है, तो उसे व्यापारियों, विशेषकर पेट्रोल पंप जैसे जरूरी सर्विस सेक्टर्स को राहत देनी ही होगी। अगर इस पर कोई सकारात्मक फैसला आता है, तो न सिर्फ देश के हजारों पेट्रोल पंप संचालकों को बड़ी राहत मिलेगी, बल्कि आम जनता के लिए भी बिना किसी रुकावट के डिजिटल ईंधन खरीद का रास्ता साफ रहेगा।
फिलहाल, देश भर के पेट्रोल पंप डीलर्स की निगाहें दिल्ली में बैठे नीति निर्माताओं के अगले कदम पर टिकी हैं। क्या सरकार इस बजट या उससे पहले कोई ऐसा ऐलान करेगी जिससे यूपीआई ट्रांजैक्शन पूरी तरह शुल्क मुक्त हो सकें? इसका जवाब आने वाले दिनों में ही मिल सकेगा, लेकिन इस पत्र ने देश के वित्तीय गलियारों में एक बार फिर महत्वपूर्ण बहस छेड़ दी है।