पुणे जिले के ग्रामीण इलाकों में इस समय प्रशासनिक सुस्ती और चुनावी नियमों का ऐसा चक्रव्यूह बना है, जिसके बीच आम किसानों और जरूरतमंद लाभार्थियों की उम्मीदें दम तोड़ती नजर आ रही हैं। पुणे जिला परिषद की ओर से चलाई जाने वाली व्यक्तिगत लाभ की तमाम योजनाएं इस वर्ष लालफीताशाही और चुनाव आचार संहिता की भेंट चढ़ चुकी हैं। आलम यह है कि खरीफ का पूरा सीजन गुजर जाने के बाद भी किसानों और महिलाओं को वह सरकारी सहायता नहीं मिल सकी, जिसका वादा प्रशासन ने किया था। इस स्थिति ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था और प्रशासनिक कार्यप्रणाली दोनों पर ही बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।
खरीफ सीजन बीत गया, पर योजनाओं का खाता भी नहीं खुला
हर साल कृषि प्रधान क्षेत्रों में किसानों को मानसून और खरीफ सीजन की शुरुआत के साथ ही खाद, बीज, कृषि उपकरण और अन्य जरूरी कृषि सामग्री पर सरकारी अनुदान की दरकार होती है। इस साल भी पुणे जिला परिषद के कृषि, महिला कल्याण और पशुसंवर्धन विभाग की ओर से कई कल्याणकारी योजनाएं प्रस्तावित थीं। योजना के तहत किसानों को आधुनिक कृषि यंत्रों पर सब्सिडी मिलनी थी, तो वहीं ग्रामीण महिलाओं को स्वरोजगार से जोड़ने के लिए आवश्यक सामग्री व आर्थिक सहायता का प्रावधान था।
लेकिन विडंबना देखिए कि साल के सितंबर महीने का एक बड़ा हिस्सा बीत जाने के बावजूद इन योजनाओं का धरातल पर अता-पता नहीं चल सका। किसानों का कहना है कि कृषि सहायता यदि सही समय यानी फसल की बुआई के वक्त ही न मिले, तो उसका कोई औचित्य नहीं रह जाता। जब सीजन निकल जाता है, तब मिलने वाली मदद जख्म पर मरहम लगाने जैसी हो जाती है, जो किसी बड़े काम नहीं आती।
ऑनलाइन बनाम ऑफलाइन का विवाद बना जी का जंजाल
इस पूरी लेटलतीफी के पीछे केवल प्रशासनिक सुस्ती ही नहीं, बल्कि अंदरूनी खींचतान भी मुख्य वजह रही है। पुणे जिला परिषद में पिछले छह वर्षों यानी वर्ष 2020 से पारदर्शी व्यवस्था के तहत ऑनलाइन आवेदन प्रणाली लागू की गई थी। इस डिजिटल प्रणाली का मुख्य उद्देश्य आवेदनों की दोहरी प्रविष्टि को रोकना, भ्रष्टाचार पर लगाम कसना और पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता बनाए रखना था।
हालांकि, इस वर्ष कुछ राजनीतिक पदाधिकारियों और स्थानीय स्तर के नेताओं ने इस डिजिटल व्यवस्था में अंगा अड़ा दिया। ऑनलाइन के बजाय ऑफलाइन (कागजी) आवेदन स्वीकार करने की मांग को लेकर एक लंबा गतिरोध पैदा हो गया।
- डिजिटल प्रक्रिया के स्थान पर ऑफलाइन विकल्पों की मांग ने महीनों बर्बाद किए।
- पंचायत समितियों द्वारा बार-बार गुहार लगाने के बावजूद शीर्ष स्तर पर कोई ठोस निर्णय नहीं लिया गया।
- इस अंतहीन विवाद के कारण योजनाओं के क्रियान्वयन का शुरुआती और सबसे अहम वक्त यूं ही निकल गया।
चुनावी आचार संहिता ने लगाई उम्मीदों पर पूर्ण विराम
आपसी विवादों और प्रशासनिक लेटलतीफी के चलते जब तक योजनाएं रफ्तार पकड़ने की स्थिति में आतीं, तब तक राजनीतिक कैलेंडर ने अपनी चाल चल दी। पुणे संभाग में स्थानीय चुनावों की घोषणा के साथ ही आदर्श आचार संहिता लागू हो चुकी है। चुनाव आयोग के दिशा-निर्देशों के अनुसार, 23 अक्टूबर 2026 को मतदान की तारीख तय की गई है और इसके साथ ही पूरे क्षेत्र में नियमों का कड़ा पहरा बैठ गया है।
आचार संहिता लागू होने के बाद अब जिला परिषद के पास नए सिरे से किसी भी योजना की घोषणा करने या नीतिगत फैसले लेने का अधिकार नहीं बचा है। इसके अलावा:
- नए लाभार्थियों से आवेदन स्वीकार करने की प्रक्रिया पूरी तरह ठप हो गई है।
- प्राथमिक जांच-पड़ताल और दस्तावेजों के सत्यापन का काम रुक गया है।
- अनुदान स्वीकृति और फाइलों के आगे बढ़ने पर कानूनी रोक लग गई है।
अब स्थिति यह है कि चुनाव प्रक्रिया पूरी होने और नई निर्वाचित बॉडी के गठन तक इन फाइलों को खोलने की हिम्मत कोई भी अधिकारी जुटाने को तैयार नहीं है।
ग्रामीण जनता और किसानों का फूटा गुस्सा
इस व्यवस्थागत नाकामी का सबसे बड़ा खामियाजा भुगत रहा है ग्रामीण अंचल का वह आम किसान और गरीब तबका, जो सरकारी योजनाओं के भरोसे अपनी आजीविका चलाने का ताना-बाना बुनता है। शिरूर तहसील के इंगले नगर की रहने वाली किसान यमुना इंगले का कहना है, "कृषि सामग्री और अनुदान पर मिलने वाली सहायता हमें सही समय पर यानी खेती के मौसम की शुरुआत में मिलनी चाहिए थी। सितंबर बीत जाने के बाद भी जब योजनाएं शुरू नहीं हुई थीं, तब अंदेशा था कि अब आचार संहिताड़ेगी और आखिरकार वही हुआ। इससे किसानों का मनोबल टूटता है।"
ऐसी ही निराशा पुणे जिले के अन्य ग्रामीण इलाकों से भी लगातार सामने आ रही है। पशुसंवर्धन और महिला कल्याण विभाग की योजनाओं के थम जाने से उन महिलाओं के सपनों को भी झटका लगा है जो लघु उद्योगों के जरिए अपने परिवार का आर्थिक संबल बनना चाहती थीं।
प्रशासनिक जवाबदेही पर उठ रहे गंभीर सवाल
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जिला परिषद के अधिकारी और पदाधिकारी थोड़ा संवेदनशीलता दिखाते, तो इस तरह के प्रशासनिक गतिरोध से बचा जा सकता था। ऑनलाइन और ऑफलाइन के बेतुके विवाद में यदि समय बर्बाद न होता, तो खरीफ सीजन के दौरान ही जरूरतमंदों के खातों में अनुदान की राशि पहुंच चुकी होती।
फिलहाल, चुनाव खत्म होने का इंतजार करने के अलावा आम जनता के पास और कोई विकल्प नहीं बचा है। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि कैसे प्रशासनिक तंत्र की सुस्ती और राजनीतिक खींचतान मिलकर आम आदमी के हकों पर पानी फेर देती है। अब देखना यह होगा कि चुनाव के बाद जब नई प्रशासनिक व्यवस्था पटरी पर लौटेगी, तब इन अटकी हुई योजनाओं को कितनी तेजी से अमलीजामा पहनाया जाता है।