धरती के सबसे गहरे और रहस्यमयी कोने यानी महासागरों की सतह के नीचे क्या छिपा है, इस बात का अंदाजा लगाना कई बार आधुनिक विज्ञान के लिए भी किसी पहेली को सुलझाने जैसा होता है। हाल ही में अटलांटिक महासागर के भीतर एक ऐसा खुलासा हुआ है जिसने पर्यावरणविदों और वैज्ञानिकों की नींद उड़ा दी है। आज से करीब 70 साल पहले, इंसानी सभ्यता ने अपनी आधुनिकता और परमाणु ऊर्जा के शुरुआती दौर में जिस खतरनाक कचरे को समंदर के हवाले कर दिया था, वह अब 4700 मीटर की गहराई में अपनी असली हालत में नजर आ रहा है।
अटलांटिक की गहराइयों में छिपा खौफनाक सच
बीते दशकों में जब परमाणु तकनीक तेजी से विकसित हो रही थी, तब इस बात की बहुत अधिक परवाह नहीं की जाती थी कि उससे निकलने वाले जहरीले कचरे का निस्तारण कैसे किया जाए। आसान रास्ता यह निकाला गया कि भारी-भरकम लोहे के ड्रम्स में रेडियोएक्टिव कचरे को भरकर समंदर में फेंक दिया जाए। यह वह दौर था जब समुद्र को कचरा फेंकने का सबसे सुरक्षित और असीम स्थान माना जाता था।
लेकिन समय बीतता गया और महासागर की तलहटी में दफन यह खामोश खतरा धीरे-धीरे अपना असर दिखाने लगा। हालिया अभियानों में जब वैज्ञानिक सबमर्सिबल और अत्याधुनिक रोबोटिक तकनीक की मदद से समुद्र के लगभग 4700 मीटर नीचे पहुंचे, तो वहां का नजारा देखकर उनके होश उड़ गए।
कटाव और जंग की चपेट में आए ड्रम्स
समुद्र के उस अत्यधिक दबाव और नमकीन पानी के बीच दशकों तक टिके रहना किसी भी धातु के लिए आसान नहीं होता। जब कैमरों की नजर उन पुराने ड्रम्स पर पड़ी, तो उनकी हालत बेहद जर्जर और चिंताजनक पाई गई।
- ज्यादातर ड्रम्स पर भारी जंग लग चुकी है और उनकी परतें गलने लगी हैं।
- कई बैरल अत्यधिक दबाव के कारण पूरी तरह से पिचक चुके हैं या फट गए हैं।
- कचरे के रिसाव का खतरा अब पहले से कहीं अधिक गंभीर हो गया है।
समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र के लिए बड़ा खतरा
वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि यह रेडियोएक्टिव कचरा रिसकर खुले पानी में घुलता है, तो यह मरीन लाइफ यानी जलीय जीवों के लिए एक बड़ी आपदा साबित हो सकता है। गहरे समुद्र में रहने वाले जीव पहले से ही कई पर्यावरणीय बदलावों का सामना कर रहे हैं। ऐसे में परमाणु कचरे का जहर उनकी फूड चेन को बुरी तरह प्रभावित कर सकता है।
समुद्र की गहराइयों में सूरज की रोशनी नहीं पहुंचती और वहां का तापमान तथा दबाव सतह से बिल्कुल अलग होता है। ऐसे में किसी भी प्रकार का रासायनिक या रेडियोएक्टिव रिसाव वहां के सूक्ष्म जीवों और अनोखी प्रजातियों के लिए घातक साबित हो सकता है।
विशेषज्ञों की चेतावनी और आगे की राह
इस खोज के सामने आने के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक बार फिर से इस बात पर बहस छिड़ गई है कि क्या महासागरों में फेंके गए ऐसे खतरनाक पदार्थों को बाहर निकालने का कोई उपाय खोजा जाना चाहिए। हालांकि, 4700 मीटर की गहराई से इन ड्रम्स को सुरक्षित बाहर निकालना तकनीकी रूप से बेहद जटिल और खर्चीला काम है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह स्थिति हमें यह याद दिलाने के लिए काफी है कि इंसानों द्वारा प्रकृति में फेंका गया कचरा कभी गायब नहीं होता, वह बस सही वक्त का इंतजार करता है। आने वाले दिनों में वैज्ञानिक इस बात का आकलन करने में जुटे हैं कि इस कचरे से कितना तात्कालिक खतरा पैदा हो सकता है और इससे निपटने के लिए क्या रणनीतिक कदम उठाए जाने चाहिए।