भारतीय पत्रकारिता जगत में जब भी निष्ठा, सत्य और निडरता की मिसाल दी जाती है, तो कुछ चुनिंदा नाम ही जेहन में आते हैं। इन चुनिंदा और पुरोधा चेहरों में एक बेहद सम्मानित नाम रामबहादुर राय का है। शुक्रवार, 25 सितंबर 2026 को राजधानी नई दिल्ली के डॉ. आंबेडकर इंटरनेशनल सेंटर में एक बेहद खास और ऐतिहासिक आयोजन का गवाह बना। अवसर था वरिष्ठ पत्रकार हेमंत शर्मा द्वारा संपादित पुस्तक 'अस्सी के राय साहब' के विमोचन का। इस गरिमामयी समारोह में देश के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने बतौर मुख्य अतिथि शिरकत की और रामबहादुर राय के व्यक्तित्व व कृतित्व पर खुलकर बात की। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि राय साहब का संपूर्ण जीवन मूल्य आधारित पत्रकारिता और अटूट समर्पण का एक ऐसा जीवंत दस्तावेज है, जिससे आज की युवा पीढ़ी को बहुत कुछ सीखने की आवश्यकता है।
हिन्दी पत्रकारिता और नवजागरण की गौरवशाली परंपरा
समारोह को संबोधित करते हुए रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने हिंदी पत्रकारिता की ऐतिहासिक और गौरवशाली यात्रा को याद किया। उन्होंने कहा कि हिंदी पत्रकारिता की शुरुआत محض कुछ पन्नों के प्रकाशन भर के लिए नहीं हुई थी, बल्कि यह देश के नवजागरण का एक सशक्त उद्घोष थी। इस भाषा और माध्यम ने केवल शब्दों को गढ़ने का काम नहीं किया, बल्कि एक आधुनिक, व्यावहारिक, सरल, सहज, समावेशी और लोकतांत्रिक समाज के निर्माण की नींव को मजबूत किया।
राजनाथ सिंह ने आगे कहा कि हिंदी पत्रकारिता ने हमेशा समाज को शिक्षा और साक्षरता के साथ-साथ मानवता, बराबरी, ईमानदारी, लोकतंत्र, और नागरिकों के अधिकारों व कर्तव्यों का बखूबी पाठ पढ़ाया है। उन्होंने पत्रकारिता की वास्तविक ताकत को रेखांकित करते हुए कहा कि जब सच्चाई की स्याही कागज पर उतरती है, तो वह समाज के भीतर निष्ठा, समर्पण और न्याय के बीज बोने का काम करती है। आज के दौर में जब मीडिया की भूमिका पर अक्सर सवाल उठते हैं, तब ऐसे दिग्गजों के जीवन पर नजर डालना और भी प्रासंगिक हो जाता है।
कबीर, तुलसी और हरिश्चंद्र के गुणों का अनूठा संगम
वर्तमान दौर की पत्रकारिता के बदलते स्वरूप पर चिंता जताते हुए रक्षा मंत्री ने कहा कि कभी-कभी मन में यह संदेह पैदा होने लगता है कि क्या आज की पत्रकारिता अपने शुरुआती आदर्शों, मूल्यों और प्रतिबद्धता से भटक रही है? लेकिन जब-जब यह संदेह मन को विचलित करने की कोशिश करता है, उनके सामने रामबहादुर राय का अडिग व्यक्तित्व एक मिसाल के रूप में खड़ा हो जाता है।
श्री सिंह ने रामबहादुर राय की पत्रकारिता की तुलना भारतीय परंपरा के महान और ऐतिहासिक व्यक्तित्वों से की। उन्होंने बेहद खूबसूरती से बयां करते हुए कहा:
"राय साहब ने पत्रकारिता की चादर को कबीर की तरह निभाया, अपनी बात कहने के कौशल को तुलसीदास की तरह बरता और सच्चाई तथा समाचार को राजा हरिश्चंद्र की तरह पूरी दृढ़ता के साथ थामे रखा। उनकी नजर हमेशा अर्जुन की तरह सिर्फ अपने लक्ष्य यानी 'खबर' पर रही। किसी भी प्रकार की चकाचौंध, सजावट या सत्ता का प्रभाव उन्हें उनके पत्रकारीय धर्म से एक इंच भी डिगा नहीं सका। उनके लिए पत्रकारिता कभी महज एक पेशा या आजीविका का साधन नहीं रही, वह इसे एक मिशन मानते थे, आज भी यह उनके लिए मिशन है और जीवनपर्यंत मिशन ही रहेगी।"
उन्होंने यह भी जोड़ा कि रामबहादुर राय के 80 वर्ष के इस लंबे और बेदाग सफर को देखकर मूल्यों के पतन को लेकर उठने वाले संदेह के सारे बादल स्वतः ही छंट जाते हैं। उनके सामने राय साहब का व्यक्तित्व एक विशाल पर्वत की तरह खड़ा दिखाई देता है, जिसके आगे हर किसी का सिर सम्मान से झुक जाता है।
धरातल के संघर्षों और सत्य के हस्ताक्षर: भूपेंद्र यादव
समारोह में विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने भी रामबहादुर राय के योगदान को सराहा। उन्होंने कहा कि राय साहब हिंदी पत्रकारिता के एक ऐसे हस्ताक्षर हैं जिन्होंने कभी एयरकंडीशन कमरों में बैठकर खबरें नहीं गढ़ीं, बल्कि हमेशा धरातल के वास्तविक संघर्षों को अपनी कलम से कागजों पर उतारा। उन्होंने पूरी ईमानदारी के साथ हमेशा सत्य का दामन थामे रखा और कभी समझौते की राजनीति या पत्रकारिता नहीं की। केंद्रीय मंत्री ने विश्वास जताया कि यह नई पुस्तक उनके जीवन के अनछुए पहलुओं से पाठकों को गहराई से रूबरू कराएगी।
इस अवसर पर वरिष्ठ पत्रकार बनवारी ने पुस्तक के संपादक हेमंत शर्मा की इस कठिन और सराहनीय पहल के लिए पीठ थपथपाई। उन्होंने एक दिलचस्प वाकया साझा करते हुए कहा कि राय साहब स्वभाव से इतने विनीत और प्रचार से दूर रहने वाले व्यक्ति हैं कि उन्हें अपनी प्रशंसा सुनना बिल्कुल पसंद नहीं है। वे खुद इस पुस्तक के प्रकाशन के पक्ष में नहीं थे, लेकिन समाज के गुणी और प्रेरणादायी लोगों का सम्मान होना ही चाहिए, यही इस आयोजन का मुख्य उद्देश्य है।
'अब मैं हेमंत शर्मा के पिंजड़े का पंछी बन गया हूं': रामबहादुर राय
कार्यक्रम के अंत में इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के अध्यक्ष और वरिष्ठ पत्रकार रामबहादुर राय ने मंच से सभी अतिथियों और वक्ताओं के प्रति अपना आभार व्यक्त किया। अपने चिर-परिचित अंदाज में उन्होंने कहा कि सरस्वती वाणी की देवी हैं और इस मंच से सत्य न बोलना उचित नहीं होगा। उन्होंने बेहद सहज भाव से स्वीकार किया कि वे इस पूरे आयोजन और पुस्तक प्रकाशन से अपनी पूरी असहमति रखते थे, लेकिन हेमंत शर्मा और केंद्रीय मंत्रियों के विशेष आग्रह के चलते उन्हें झुकना पड़ा और इस सहमति का हिस्सा बनना पड़ा।
हंसते हुए उन्होंने श्रोताओं से कहा, "अब तो स्थिति यह है कि मैं हेमंत शर्मा के पिंजड़े का पंछी बन चुका हूँ।" इसके साथ ही, एक सजग पत्रकार और चिंतक की भूमिका निभाते हुए उन्होंने मंच पर उपस्थित केंद्रीय मंत्रियों का ध्यान देश के संघीय ढांचे की ओर खींचा। उन्होंने आग्रह किया कि सत्ता के वास्तविक विकेंद्रीकरण को सुनिश्चित करने वाले भारतीय संविधान के 73वें और 74वें संशोधन अधिनियमों की गहराई से समीक्षा की जानी चाहिए ताकि स्थानीय स्वशासन को और अधिक प्रभावी बनाया जा सके।
क्या है 'अस्सी के राय साहब' पुस्तक में?
यह बहुप्रतीक्षित पुस्तक 'अस्सी के राय साहब' रामबहादुर राय के जीवन के 80 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में उनके विराट पत्रकारीय और सामाजिक सफर को बेहद करीने से रेखांकित करती है। इस महत्वपूर्ण पुस्तक का संपादन वरिष्ठ पत्रकार हेमंत शर्मा के साथ-साथ मनोज मिश्रा, संदीप जोशी और संजीव कुमार ने संयुक्त रूप से किया है।
पुस्तक के पन्नों में क्या खास है, इसकी झलक देते हुए संपादकीय टीम ने बताया कि इसमें देश भर के जाने-माने पत्रकारों, वरिष्ठ राजनेताओं, विचारकों और बुद्धिजीवियों के संस्मरण, गहरे अनुभव और राय साहब से जुड़े रोचक व प्रेरणादायी प्रसंगों को शामिल किया गया है। यह किताब केवल एक व्यक्ति की जीवनी नहीं है, बल्कि यह स्वतंत्र भारत के राजनीतिक और पत्रकारिता इतिहास के कई अनकहा अध्यायों का एक प्रामाणिक दस्तावेज है, जो आने वाली पीढ़ी के पत्रकारों को सदा मार्गदर्शन देता रहेगा।