अयोध्या के प्राचीन राजमहल में जब उत्सव की जगह विरह की गहरी आहट गूंज उठी, तो पूरा वातावरण भारी हो गया। जिस राजकुमार के भव्य राजतिलक की तैयारियां महीनों से चल रही थीं, वही आज पिता के वचनों की अटूट मर्यादा को बचाने के लिए सब कुछ त्यागकर वन की पथरीली राह पर निकल पड़ा। साथ में थीं धर्मपरायण पत्नी सीता और अनुज लक्ष्मण। शनिवार, 03 अक्टूबर 2026 को हम बात कर रहे हैं परंपरा और संस्कृति के जीवंत प्रतीक रामनगर की विश्वविख्यात रामलीला की, जिसके नौवें दिन के 'वनगमन' प्रसंग ने वहां मौजूद हर एक लीलाप्रेमी की आंखें नम कर दीं।
पति जहां, वहीं मेरा संसार: सीता के तर्कों के आगे निरुत्तर हुए मर्यादा पुरुषोत्तम
लीला के इस बेहद संवेदनशील चरण में त्याग, प्रेम और समर्पण का एक ऐसा अनूठा संगम देखने को मिला, जिसने दर्शकों के दिलों को झकझोर दिया। जब श्रीराम ने माता सीता को अयोध्या में ही रहकर सास-ससुर की सेवा करने की सलाह दी, तो सीता जी ने अत्यंत दृढ़ता के साथ जो तर्क दिए, उसने इतिहास के पन्नों में अमरता पा ली। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि जब उनके स्वामी ही वन में कंद-मूल खाकर जीवन बिताएंगे, तो महलों के तमाम सुख उनके लिए किस काम के हैं।
माता सीता के इस अटूट प्रेम और तर्कों के सामने श्रीराम भी निरुत्तर हो गए और अंततः उन्हें अपने साथ ले जाने के लिए सहमत होना ही पड़ा। ठीक इसी प्रकार, अनुज लक्ष्मण ने भी बड़े भाई और भाभी की सेवा के अपने धर्म का पालन करते हुए वन जाने की अनुमति मांगी। माता सुमित्रा ने भी पुत्र को समझाते हुए आशीर्वाद दिया कि राम के बिना अयोध्या में तुम्हारा कोई प्रयोजन नहीं है। इस प्रकार त्रिगुट ने अयोध्या की चकाचौंध को छोड़कर कठिन वनवास का मार्ग चुन लिया।मुनि वेश में प्रभु राम और राजमहल में छाया अचेतन
जब तीनों भाई-बहन कोपभवन पहुंचे, तो वहां का दृश्य अत्यंत हृदयविदारक था। महारानी कैकेयी के कठोर वचनों ने राजा दशरथ को अंदर से तोड़कर रख दिया था। दशरथ की स्थिति इतनी दयनीय हो गई कि वे सुधबुध खो बैठे और अचेत हो गए। कैकेयी खुद संन्यासियों जैसे मुनि वस्त्र लेकर आईं और राम को पहनाए।
गुरु वशिष्ठ को सादर प्रणाम कर और अयोध्या की पूरी जिम्मेदारी उन्हें सौंपकर, राम, सीता और लक्ष्मण ने वन की ओर प्रस्थान किया। उनके जाते ही अयोध्या की रौनक मानों हमेशा के लिए ठहर गई। जिन गलियों में अभी कुछ समय पहले तक खुशियों के दीप सजने थे, उन्हीं मार्गों पर आज अपने प्रिय राजकुमार को विदा करने के लिए पूरा जनसैलाब उमड़ पड़ा था।
निषादराज का आतिथ्य और भूमि पर शयन का वह मार्मिक दृश्य
जैसे ही रथ वन के पथ पर आगे बढ़ा, सुमंत को राजा दशरथ का संदेश मिला। होश में आने के बाद दशरथ राम-वियोग के असहनीय दुख में टूट चुके थे। उन्होंने सुमंत को रथ लेकर तेजी से पीछे भेजा और राम को हर हाल में मनाकर वापस लाने का आदेश दिया। लेकिन, धर्म के मार्ग पर चल चुके राम अपने संकल्प से डिगने वाले नहीं थे।
वन मार्ग पर निषादराज को जब प्रभु के आगमन की सूचना मिली, तो वे फल और कंद-मूल लेकर दौड़ पड़े। उन्होंने राम से अपने गांव चलने का आग्रह किया, परंतु मर्यादा पुरुषोत्तम ने वन में ही रहने का अपना संकल्प दोहराया।
सिंघुआ वृक्ष के नीचे विश्राम: जब राम और सीता ने थकावट के बाद भूमि पर शयन किया, तो आसपास की भील महिलाओं और निषादराज की आंखें छलक आईं। वे सोचने लगे कि राजा दशरथ और माता कौशल्या के इतने कोमल बच्चे आखिर इस कठोर वन में कैसे रह पाएंगे। तब लक्ष्मण ने सबको समझाते हुए कहा कि सांसारिक मोह का त्याग कर प्रभु के चरणों में अनुराग रखना ही परम धर्म है।
रामनगर की रामलीला की वह रहस्यमयी और अनूठी परंपरा
रामनगर की रामलीला देश ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में अपनी खास शैली और परंपराओं के लिए जानी जाती है। इस रामलीला की सबसे बड़ी और अनोखी विशेषता यह है कि यहां 'दशरथ मरण' प्रसंग का मंचन कभी नहीं किया जाता।
वनगमन के ठीक अगले दिन की लीला में राम गंगा पार करके भारद्वाज आश्रम पहुंचते हैं, उसके बाद यमुना पार कर वाल्मीकि आश्रम और अंततः चित्रकूट पहुंचते हैं। चित्रकूट में निवास के बाद राम सुमंत को वापस अयोध्या भेज देते हैं और उस दिन की लीला वहीं समाप्त हो जाती है।
- ऐतिहासिक किंवदंती: प्राचीन मान्यताओं और किंवदंतियों के अनुसार, काशी के पूर्व नरेश किसी अन्य राजा की मृत्यु का दृश्य अपनी आंखों से नहीं देख सकते थे।
- परंपरा का निर्वहन: इसी पुरानी और पवित्र राजशाही मान्यता के चलते रामनगर की लीला में राजा दशरथ की मृत्यु या विलाप से जुड़े मरण प्रसंग को पूरी तरह वर्जित रखा गया है।
- रिक्त स्थान: आज भी रामलीला की आधिकारिक पटकथा और सूची में इस प्रसंग के लिए निर्धारित स्थल को पूरी तरह रिक्त छोड़ दिया जाता है।
पीढ़ियों से चली आ रही यह अनूठी परंपरा इस ऐतिहासिक रामलीला को न केवल धार्मिक दृष्टि से बल्कि सांस्कृतिक रूप से भी अत्यंत महत्वपूर्ण बनाती है। हर साल इस लीला को देखने के लिए लाखों की संख्या में श्रद्धालु वाराणसी के रामनगर पहुंचते हैं, जहां आधुनिकता से दूर, मसालों की रोशनी और पारंपरिक शैली में आज भी त्रेतायुग की जीवंत अनुभूति होती है।