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द्वितीय विश्व युद्ध का अधूरा हिसाब: कुरील आईलैंड को लेकर रूस और जापान में फिर क्यों भड़की जंग?

द्वितीय विश्व युद्ध का अधूरा हिसाब: कुरील आईलैंड को लेकर रूस और जापान में फिर क्यों भड़की जंग?

क्या द्वितीय विश्व युद्ध की आग बुझने के आठ दशक बाद भी दुनिया का एक कोना ऐसा है जहाँ शांति के बजाय तनाव की सुलगती चिंगारियां आज भी मौजूद हैं? इसका जवाब है—हाँ। सुदूर पूर्व में स्थित कुरील द्वीप समूह (Kuril Islands) एक बार फिर वैश्विक कूटनीति के केंद्र में आ गया है। इस बार विवाद की वजह बने हैं रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, जिनके एक दौरे ने टोक्यो और मॉस्को के बीच दशकों पुराने जख्मों को फिर से हरा कर दिया है।

इस ताज़ा घटनाक्रम ने न केवल दोनों देशों के बीच कूटनीतिक संवाद को ठप कर दिया है, बल्कि एशिया-प्रशांत क्षेत्र में सुरक्षा समीकरणों को भी गरमा दिया है। आइए जानते हैं कि आखिर यह छोटा सा द्वीप समूह दो परमाणु और आर्थिक रूप से ताकतवर देशों के बीच इतनी बड़ी दुश्मनी की वजह क्यों बना हुआ है।जापानी प्रधानमंत्री के कड़े तेवर और पुतिन का दौरा

विवाद तब और गहरा गया जब जापानी नेतृत्व ने रूसी राष्ट्रपति के इस रणनीतिक दौरे पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की। जापान की राजनीति में मजबूत पकड़ रखने वाली और प्रमुख नेता सनाए ताकाइची (Sanae Takaichi) ने इस यात्रा की कड़ी आलोचना करते हुए इसे जापान की संप्रभुता के खिलाफ एक कदम बताया। टोक्यो का साफ कहना है कि ये द्वीप उनके ‘उत्तरी क्षेत्र’ (Northern Territories) हैं, जिन पर रूस का कब्जा अवैध है।

दूसरी ओर, मॉस्को अपने रुख पर पूरी तरह अडिग है। पुतिन के इस दौरे को रूस ने अपने घरेलू राजनीतिक और रणनीतिक हितों के तहत पूरी तरह वैध ठहराया है। रूस का संदेश बिल्कुल स्पष्ट है—इन द्वीपों पर उनका नियंत्रण द्वितीय विश्व युद्ध के परिणामों का अटूट हिस्सा है और इस पर कोई समझौता नहीं किया जाएगा।

क्या है कुरील आईलैंड विवाद? इतिहास के पन्नों से

यह पूरा विवाद द्वितीय विश्व युद्ध के अंतिम दिनों यानी साल 1945 का है। युद्ध के अंत में सोवियत संघ (अब रूस) की लाल सेना ने इन द्वीपों पर कब्जा कर लिया था। जापान इन्हें अपने चार सबसे उत्तरी द्वीपों (इतुरुप, कुनाशीर, शिकोतन और हाबोमाई) के रूप में दावा करता है, जिन्हें वह अपना आंतरिक हिस्सा मानता है।

  • ऐतिहासिक दावा: जापान का तर्क है कि 1855 की द्विपक्षीय संधि के तहत ये द्वीप हमेशा से उसके रहे हैं और 1945 में सोवियत संघ द्वारा इन्हें अपने कब्जे में लेना जबरन किया गया अधिग्रहण था।
  • रूसी तर्क: मॉस्को का कहना है कि द्वितीय विश्व युद्ध में हार के बाद अंतरराष्ट्रीय समझौतों (विशेषकर याल्टा समझौते) के तहत ये द्वीप सोवियत संघ को सौंपे गए थे, और रूस इस पर अपने कानूनी अधिकार को कभी नहीं छोड़ेगा।

हैरानी की बात यह है कि इस क्षेत्रीय विवाद के चलते रूस और जापान आज तक आधिकारिक तौर पर द्वितीय विश्व युद्ध की शांति संधि (Peace Treaty) पर हस्ताक्षर नहीं कर पाए हैं। यानी कागजों पर दोनों देश तकनीकी रूप से अब भी युद्ध की स्थिति में हैं।

राजयिकों की तलब और बढ़ता कूटनीतिक तनाव

जैसे ही जापान की ओर से विरोध के स्वर तेज हुए, रूस ने भी कड़ा रुख अपनाने में देर नहीं लगाई। मॉस्को स्थित रूसी विदेश मंत्रालय ने तुरंत कदम उठाते हुए जापानी राजदूत को तलब किया और टोक्यो की तीखी टिप्पणियों पर आधिकारिक आपत्ति दर्ज कराई। रूस ने दो टूक शब्दों में चेतावनी दी है कि जापान के इस प्रकार के आक्रामक बयान दोनों देशों के बीच बची-कुची कूटनीतिक संभावनाओं को भी खत्म कर रहे हैं।

विश्लेषकों का मानना है कि यूक्रेन युद्ध के बाद से रूस और पश्चिमी देशों के बीच आए भू-राजनीतिक भूचाल का असर अब एशिया पर भी साफ दिखने लगा है। जापान, जो कि अमेरिका का घनिष्ठ सहयोगी है, रूस के खिलाफ पश्चिमी प्रतिबंधों में खुलकर शामिल रहा है। इसके जवाब में रूस ने भी जापान के साथ शांति वार्ताओं को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिया है।

रणनीतिक रूप से क्यों इतने अहम हैं ये द्वीप?

आपके मन में यह सवाल जरूर आ रहा होगा कि आखिर इन ठंडे और कम आबादी वाले द्वीपों के लिए दो देश महायुद्ध जैसी स्थिति के मुहाने पर क्यों खड़े रहते हैं? इसका जवाब है—भू-राजनीतिक और सैन्य महत्व

कुरील द्वीप समूह ओखोत्स्क सागर और प्रशांत महासागर के बीच एक प्राकृतिक दीवार की तरह हैं। यहाँ से रूसी पनडुब्बियों की आवाजाही प्रशांत महासागर में बेहद सुरक्षित तरीके से होती है। सैन्य रणनीतिकारों के अनुसार, यदि ये द्वीप जापान या उसके सहयोगियों के हाथ आ जाते हैं, तो रूस की नौसेना की मारक क्षमता और प्रशांत क्षेत्र में उसकी सुरक्षा को बड़ा झटका लग सकता है। इसके अलावा, इन द्वीपों के आसपास मछली संपदा और दुर्लभ खनिजों के बड़े भंडार मौजूद हैं, जो इनकी आर्थिक कीमत को और बढ़ा देते हैं।

स्थानीय निवासियों पर क्या असर पड़ रहा है?

इस बड़े कूटनीतिक ड्रामे के बीच सबसे पिस रहे हैं वहाँ के आम नागरिक। कुरील द्वीपों पर रहने वाले रूसी नागरिक इन तमाम विवादों के बावजूद अपनी आजीविका के लिए संघर्ष कर रहे हैं। दशकों पहले यहाँ से निकाले गए जापानी मूल के बुजुर्ग और उनके वंशज आज भी अपने पूर्वजों की जमीन पर जाने की आस लगाए बैठे हैं, लेकिन वीजा नियमों और राजनीतिक अड़चनों के कारण उनकी यह उम्मीद हर गुजरते साल के साथ धुंधली होती जा रही है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

Q1. कुरील आईलैंड विवाद मुख्य रूप से किन दो देशों के बीच है?

यह विवाद मुख्य रूप से रूस और जापान के बीच है। जापान इन्हें अपने 'उत्तरी क्षेत्र' मानता है, जबकि रूस इन्हें अपना अभिन्न अंग बताता है।

Q2. व्लादिमीर पुतिन के दौरे पर जापान की आपत्ति क्यों है?

जापान इन द्वीपों पर अपनी संप्रभुता का दावा करता है। टोक्यो का मानना है कि रूसी राष्ट्रपति का इन विवादित क्षेत्रों का दौरा करना उनकी संप्रभुता का उल्लंघन है।

Q3. क्या रूस और जापान के बीच द्वितीय विश्व युद्ध की कोई शांति संधि हुई है?

नहीं। कुरील द्वीप विवाद के कारण ही दोनों देशों के बीच आज तक द्वितीय विश्व युद्ध को समाप्त करने वाली कोई आधिकारिक शांति संधि नहीं साइन हो पाई है।

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रिपोर्टर: Kavya Tripathi

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