महंगाई के मोर्चे पर आम आदमी को बड़ा झटका
उत्तर प्रदेश के संतकबीरनगर जिले में इन दिनों रसोई का बजट पूरी तरह से चरमरा गया है। हालात ऐसे हैं कि बाजार में सब्जी खरीदने पहुंचने वाले आम ग्राहक और खासकर गरीब वर्ग के लोग सिर्फ भाव पूछकर ही मायूस लौट रहे हैं। पिछले कुछ हफ्तों में सब्जियों के दाम जिस रफ़्तार से ऊपर भागे हैं, उसने हर किसी की चिंता बढ़ा दी है। आम आदमी के किचन की शान कहे जाने वाले टमाटर, प्याज और आलू के साथ-साथ हरी सब्जियों के भाव भी आसमान छू रहे हैं।
स्थानीय बाजारों का हाल यह है कि मध्यम वर्ग और दिहाड़ी मजदूर वर्ग के लिए दो वक्त की ढंग की सब्जी का इंतजाम करना भी एक बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। हालात इतने गंभीर हैं कि कई परिवारों ने अपनी जरूरत की मात्रा को आधा कर दिया है, ताकि किसी तरह महीने का बजट मैनेज किया जा सके।बाजार में सब्जियों के मौजूदा दाम और लोगों की परेशानियां
जिला मुख्यालय समेत खलीलाबाद, मेंहदावल और धनघटा के बाजारों में खुदरा सब्जी विक्रेताओं के ठिकानों पर कीमतें बेकाबू हो चुकी हैं। जो हरी सब्जियां कुछ समय पहले तक आसानी से आम आदमी की पहुंच में थीं, वे अब लग्जरी आइटम जैसी नजर आने लगी हैं।
- टमाटर और प्याज: रसोई के दो मुख्य आधार, जो हर व्यंजन में इस्तेमाल होते हैं, अब बहुत महंगे बिक रहे हैं।
- हरी सब्जियां: भिंडी, लौकी, तोरी, और बैंगन जैसी स्थानीय मांग वाली सब्जियों के दाम भी काफी बढ़ चुके हैं।
- पत्तेदार सब्जियां: पालक और मेथी जैसी चीजें भी अब उपभोक्ताओं को जेब ढीली करने पर मजबूर कर रही हैं।
बाजार में खरीदारी करने आए एक स्थानीय नागरिक रमेश कुमार ने बताया, 'पहले हम हफ्तेभर की सब्जी एक साथ थैला भरकर ले जाते थे, लेकिन अब सिर्फ जरूरतभर का पाव-आधा किलो ही खरीद पा रहे हैं। कमाई उतनी ही है, लेकिन खर्च दोगुना हो गया है।'
थोक और खुदरा कारोबारियों का क्या कहना है?
जब इस मामले पर थोक सब्जी विक्रेताओं से बात की गई, तो उन्होंने बताया कि बाहर की मंडियों से ही माल महंगे दामों पर आ रहा है। परिवहन लागत (ट्रांसपोर्टेशन कॉस्ट) बढ़ने और पीछे से ही सप्लाई चेन में रुकावट होने के कारण स्थानीय बाजारों में दाम नीचे नहीं आ पा रहे हैं।
एक बड़े थोक व्यापारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, 'मौसम में बदलाव और हालिया ट्रकों के किराए में बढ़ोतरी का सीधा असर सब्जियों की ढुलाई पर पड़ा है। जब पीछे से ही हमें माल महंगे में मिल रहा है, तो हम उसे सस्ते दामों पर कैसे बेच सकते हैं? हमारा मुनाफा तो पहले जितना ही है, बल्कि कीमतें बढ़ने से बिक्री जरूर कम हो गई है।'
किसानों की स्थिति और उत्पादन संकट
एक तरफ जहां उपभोक्ता महंगे दामों से परेशान हैं, वहीं दूसरी तरफ स्थानीय किसानों की अपनी अलग समस्याएं हैं। कृषि विशेषज्ञों और किसानों का मानना है कि इस साल मौसम के उतार-चढ़ाव और बेमौसम बारिश या अत्यधिक गर्मी के कारण फसलों को भारी नुकसान पहुंचा है। खेतों में पैदावार कम होने की वजह से कुल सप्लाई कम हुई है, जिसका फायदा बिचौलिए उठा रहे हैं और आम जनता को इसका खामियाजा भुगतना पड़ रहा है।
संतकबीरनगर के ग्रामीण इलाकों के किसानों का कहना है कि लागत मूल्य (खाद, बीज, डीजल और मजदूरी) लगातार बढ़ता जा रहा है, लेकिन उन्हें उनकी फसल का सही दाम मिलना आज भी एक अनिश्चितता का खेल बना हुआ है।
गरीबों और मध्यम वर्ग की थाली पर सीधा असर
पोषण के लिहाज से हरी सब्जियां और दालें हर इंसान के शरीर के लिए जरूरी होती हैं। लेकिन जब कीमतें इतनी बढ़ जाती हैं, तो गरीब परिवार केवल आलू और नमक या फिर सिर्फ रोटियों के सहारे दिन गुजारने को मजबूर हो जाते हैं। बच्चों के विकास और स्वास्थ्य पर भी इस कुपोषण या सीमित खानपान का बुरा असर पड़ रहा है।
महिलाओं का कहना है कि घर चलाना अब असंभव सा हो गया है। गृहणी सुनीता देवी ने कहा, 'घर का बजट संभालना जादूगरी जैसा हो गया है। दाल और सब्जी के दाम आसमान पर हैं, ऐसे में बच्चों को पौष्टिक भोजन देना हमारी पहुंच से बाहर होता जा रहा है।'
प्रशासनिक और सरकारी स्तर पर क्या हैं उम्मीदें?
आम जनता अब जिला प्रशासन और खाद्य आपूर्ति विभाग से यह उम्मीद लगाए बैठी है कि वे जमाखोरों और मुनाफाखोरों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करें ताकि कीमतों पर लगाम लगाई जा सके। इसके अलावा, सरकारी मंडियों और उचित मूल्य की तर्ज पर सस्ते सब्जी काउंटर लगाने की मांग भी जोर पकड़ने लगी है ताकि आम आदमी को इस बेतहाशा महंगाई से कुछ राहत मिल सके।
फिलहाल, संतकबीरनगर के बाजारों में महंगाई की यह मार कब कम होगी, यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा, लेकिन इतना तय है कि इस बढ़ती महंगाई ने आम आदमी की कमर तोड़कर रख दी है।