बिहार में स्वरोजगार को बढ़ावा देने के लिए शुरू की गई महत्वाकांक्षी 'मुख्यमंत्री उद्यमी योजना' अब उन लोगों के लिए गले की हड्डी बनती जा रही है जिन्होंने सरकार से पैसे तो डकार लिए, लेकिन जमीन पर कोई उद्योग शुरू नहीं किया। ताजा मामला गोपालगंज जिले से सामने आया है, जहां जिला उद्योग विभाग ने कड़ा रुख अपनाते हुए ऐसे 315 लाभुकों की सूची तैयार की है, जिन्होंने 10 लाख रुपये की भारी-भरकम सहायता राशि लेने के बावजूद अपने कारोबार का श्रीगणेश तक नहीं किया।
लाखों रुपये मिले, ट्रेनिंग हुई, फिर भी ठप रहा काम
सरकार की मंशा साफ थी कि राज्य के युवाओं को नौकरी खोजने वाला नहीं, बल्कि नौकरी देने वाला (Job Provider) बनाया जाए। इसके लिए पिछले कुछ वर्षों के दौरान गोपालगंज जिले में कुल 1078 लाभुकों का चयन विभिन्न व्यावसायिक ट्रेडों के तहत किया गया था। चयन की प्रक्रिया पूरी होने के बाद इन सभी को बाकायदा संबंधित ट्रेड का विशेष प्रशिक्षण भी दिया गया। प्रशिक्षण का मुख्य उद्देश्य यही था कि जब ये युवा अपना उद्योग शुरू करें, तो इन्हें किसी तकनीकी समस्या का सामना न करना पड़े।
प्रशिक्षण संपन्न होने के बाद प्रत्येक चयनित लाभुक के खाते में उद्योग स्थापित करने के एवज में 10 लाख रुपये की सहायता राशि ट्रांसफर कर दी गई। शुरुआती दौर में सब कुछ ठीक-ठाक नजर आ रहा था, लेकिन जब उद्योग विभाग ने जमीनी हकीकत जानने के लिए आंकड़ों की फाइलें खंगालीं, तो चौंकाने वाले खुलासे हुए।
सिर्फ 509 यूनिट्स चालू, बाकी का अता-पता नहीं
विभाग की हालिया समीक्षा रिपोर्ट बताती है कि 1078 चयनित लाभुकों में से वर्तमान समय में धरातल पर केवल 509 उद्योग ही सुचारू रूप से संचालित हो रहे हैं। इसका सीधा अर्थ यह है कि बड़ी संख्या में या तो उद्योग कभी शुरू ही नहीं हुए या फिर शुरू होने के कुछ ही दिनों बाद बंद हो गए।
इनमें से 315 ऐसे लाभुक चिह्नित किए गए हैं, जिन्होंने बैंक खातों में पैसे आने के बाद भी कोई उद्यम स्थापित करने की जहमत तक नहीं उठाई। विभाग अब इन बंद पड़े और कागजों तक सीमित उद्यमों की बारीकी से जांच करवा रहा है, ताकि यह पता लगाया जा सके कि आखिर सरकारी धन का उपयोग किस दिशा में किया गया।
अब होगी कड़ी कानूनी कार्रवाई और सर्टिफिकेट केस
लापरवाही बरतने वाले इन 315 लाभुकों की अब मुश्किलें बढ़ने वाली हैं। उद्योग विभाग की तरफ से इन्हें पहले भी कई बार मौखिक और लिखित चेतावनियां दी जा चुकी हैं, लेकिन स्थिति में कोई सुधार देखने को नहीं मिला। अब विभाग ने दो टूक कह दिया है कि यदि निर्धारित समयावधि के भीतर पूरी राशि वापस नहीं लौटाई गई, तो संबंधितों के विरुद्ध कड़ा 'सर्टिफिकेट केस' (Certificate Case) दर्ज किया जाएगा।
कानूनी शिकंजा कसने के बाद इन डिफॉल्टरों को ब्याज के साथ-साथ जेल की हवा भी खानी पड़ सकती है। प्रशासन इस मामले में किसी भी तरह की ढिलाई बरतने के मूड में नहीं दिख रहा है।
किस्त नहीं चुकाने वाले 254 अन्य लोग भी रडार पर
सिर्फ उद्योग न लगाने वाले ही नहीं, बल्कि जिन लोगों ने उद्योग शुरू किया लेकिन समय पर लोन की किस्त (EMI) जमा नहीं कर रहे हैं, उन पर भी विभाग की पैनी नजर है। ऐसे करीब 254 लाभुकों को भी आधिकारिक नोटिस थमाया गया है। विभाग का साफ निर्देश है कि यदि समय रहते बकाया ऋण की किस्तें जमा नहीं की गईं, तो उनके खिलाफ भी नियमानुसार रिकवरी की प्रक्रिया शुरू कर दी जाएगी।
कुल 51 ट्रेडों में बांटी गई थी राशि
आपको बता दें कि मुख्यमंत्री उद्यमी योजना के तहत कुल 51 प्रकार के अलग-अलग ट्रेडों में बेरोजगार युवाओं को आर्थिक सहायता प्रदान की गई थी। इनमें मुख्य रूप से निम्नलिखित कारोबार शामिल थे:
- रेडीमेड वस्त्र निर्माण यूनिट
- आटा मिल और सत्तू मिल
- तेल मिल (मस्टर्ड ऑयल यूनिट)
- दरवाजा-खिड़की (गेट-ग्रिल) निर्माण कार्य
- विभिन्न प्रकार की पैकेजिंग और फूड प्रोसेसिंग इकाइयां
प्रशासन की दो टूक चेतावनी
जिला उद्योग विभाग के प्रबंधक अशोक कुमार ने इस पूरे मामले पर स्थिति स्पष्ट करते हुए बताया कि योजना की राशि का दुरुपयोग या उदासीनता किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं की जाएगी। उन्होंने कहा, 'योजना की राशि लेने के बाद भी उद्योग शुरू नहीं करने वाले सभी लाभुकों को लगातार नोटिस दिए जा रहे हैं। यदि तय समय सीमा के अंदर उन्होंने पैसे वापस नहीं किए, तो कानूनी प्रक्रिया के तहत सर्टिफिकेट केस दर्ज कर एक-एक पाई की वसूली की जाएगी।'
यह कार्रवाई उन तमाम जरूरतमंद युवाओं के लिए एक बड़ा सबक है जो वास्तव में रोजगार करना चाहते हैं लेकिन योजना का लाभ पाने से वंचित रह जाते हैं। प्रशासनिक सख्ती से अब यह उम्मीद जताई जा रही है कि सरकारी धन के दुरुपयोग पर लगाम लगेगी और भविष्य में ऐसी योजनाओं का क्रियान्वयन अधिक पारदर्शिता के साथ हो सकेगा।