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क्या परमाणु बम बनाएगा सऊदी अरब? अमेरिकी खुफिया रिपोर्ट से दुनिया भर में हड़कंप

क्या परमाणु बम बनाएगा सऊदी अरब? अमेरिकी खुफिया रिपोर्ट से दुनिया भर में हड़कंप

वैश्विक कूटनीति के गलियारों में इस समय एक ऐसी सुगबुगाहट तेज हो गई है, जिसने अमेरिका से लेकर मध्य पूर्व तक के हुक्मरेानों की नींद उड़ा दी है। क्या दुनिया का सबसे बड़ा तेल निर्यातक देश अब परमाणु हथियारों की कतार में खड़ा होने जा रहा है? यह सवाल हवा में इसलिए तैर रहा है क्योंकि अमेरिकी संसद यानी कांग्रेस को एक बेहद गोपनीय खुफिया रिपोर्ट सौंपी गई है। इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद वाशिंगटन से लेकर रियाद तक राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज हो गई है।

अमेरिकी खुफिया रिपोर्ट में क्या है बड़ा दावा?

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिकी खुफिया समुदाय के पास कुछ ऐसे दस्तावेज हाथ लगे हैं जो गंभीर संकेत देते हैं। इन दस्तावेजों के अनुसार, सऊदी अरब ने अपने परमाणु हथियार कार्यक्रम को विकसित करने की संभावना से पूरी तरह इनकार नहीं किया है। यानी रियाद ने इस विकल्प को अभी भी खुला रखा है।

यह चौंकाने वाला खुलासा ऐसे समय में सामने आया है जब कुछ समय पहले ही अमेरिका और सऊदी अरब के बीच एक अहम रणनीतिक समझौते को लेकर सुगबुगाहट तेज हुई थी। इस समझौते के तहत सऊदी अरब को अपने शांतिपूर्ण नागरिक परमाणु कार्यक्रम के दायरे में यूरेनियम संवर्धन (Uranium Enrichment) की क्षमता विकसित करने की अनुमति मिलने की बात कही जा रही थी। हालांकि, जैसे ही यह खबर सार्वजनिक हुई, अमेरिकी नीति निर्माताओं और सांसदों के माथे पर चिंता की लकीरें खिंच गईं।

नागरिक ऊर्जा या परमाणु हथियार की तैयारी?

सऊदी अरब आधिकारिक तौर पर लगातार यह दोहराता रहा है कि उसका परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह से शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है। रियाद का तर्क है कि बढ़ती ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने और बिजली उत्पादन के लिए परमाणु तकनीक जरूरी है। लेकिन, अमेरिकी संसद के भीतर कई सांसद इस दलील से संतुष्ट नजर नहीं आ रहे हैं।

विशेष तौर पर अमेरिकी सीनेट में डेमोक्रेटिक पार्टी के नेताओं ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। सांसदों का सीधा सवाल है कि अगर सऊदी अरब का एकमात्र मकसद शांतिपूर्ण तरीके से परमाणु ऊर्जा पैदा करना है, तो उसे अपने घरेलू स्तर पर यूरेनियम एनरिचमेंट और रीप्रोसेसिंग की भारी-भरकम क्षमता विकसित करने की आवश्यकता क्यों है?

इसके अलावा, अमेरिकी सांसदों ने इस बात पर भी गहरी आपत्ति जताई है कि रियाद अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) की बेहद कड़ी और पारदर्शी निगरानी के दायरे में आने से क्यों हिचकिचा रहा है। उनका मानना है कि यूरेनियम संवर्धन की क्षमता हासिल करना और कड़े अंतरराष्ट्रीय निरीक्षण से बचना एक खतरनाक संकेत हो सकता है।

प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान का पुराना बयान और ईरान फैक्टर

सऊदी अरब के क्रूर और दूरदर्शी नेता माने जाने वाले क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (MBS) की एक पुरानी चेतावनी को इस पूरे घटनाक्रम के संदर्भ में काफी अहम माना जा रहा है। प्रिंस सलमान ने अतीत में एक इंटरव्यू के दौरान स्पष्ट रूप से कहा था कि यदि क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वी ईरान ने परमाणु हथियार विकसित कर लिए, तो सऊदी अरब भी बिना एक पल गंवाए इस रास्ते पर चलने से पीछे नहीं हटेगा।

मध्य पूर्व में सुन्नी बहुसंख्यक सऊदी अरब और शिया बहुसंख्यक ईरान के बीच वर्चस्व की जंग पुरानी है। ईरान के परमाणु कार्यक्रमों को लेकर इजरायल और अमेरिका हमेशा से हमलावर रहे हैं। ऐसे में अगर सऊदी अरब भी परमाणु हथियारों की दौड़ में शामिल होने का मन बना लेता है, तो मध्य पूर्व का शक्ति संतुलन पूरी तरह से तहस-नहस हो सकता है।

पाकिस्तान के साथ हालिया रक्षा समझौते के क्या हैं मायने?

इस पूरे समीकरण में एक और अहम कड़ी पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच हुआ हालिया रक्षा समझौता है। दुनिया भर में पाकिस्तान एकमात्र ऐसा मुस्लिम देश माना जाता है जिसके पास आधिकारिक रूप से परमाणु हथियार मौजूद हैं।

अभी कुछ समय पहले ही सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच गहरे रणनीतिक और रक्षा समझौते हुए हैं। इन समझौतों के बाद पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा मुहम्मद आसिफ की तरफ से कुछ ऐसे बयान आए थे, जिसमें उन्होंने संकेत दिया था कि जरूरत पड़ने पर पाकिस्तान की सामरिक और परमाणु क्षमता सऊदी अरब के रक्षा हितों के लिए उपलब्ध हो सकती है। वैश्विक पटल पर जब महाशक्तियों के बीच समीकरण तेजी से बदल रहे हैं, तब सऊदी-पाकिस्तान की यह नजदीकियां पश्चिमी देशों की चिंता को और ज्यादा बढ़ा रही हैं।

वैश्विक राजनीति पर इसके क्या होंगे दूरगामी प्रभाव?

अगर सऊदी अरब सचमुच अपने परमाणु कार्यक्रम को हथियार बनाने की दिशा में आगे बढ़ाता है, तो इसके भू-राजनीतिक परिणाम बेहद घातक हो सकते हैं। इसे 'परमाणु प्रसार' (Nuclear Proliferation) की एक नई और खतरनाक लहर के रूप में देखा जाएगा। मध्य पूर्व के अन्य देश जैसे तुर्किए या मिस्र भी इस होड़ में शामिल होने की कोशिश कर सकते हैं, जिससे पूरी दुनिया की सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है।

फिलहाल, अमेरिकी विदेश विभाग और बाइडन-ट्रंप प्रशासन के बीच इस मुद्दे पर आंतरिक मंथन शुरू हो गया है। अमेरिकी सांसदों के पत्र और खुफिया रिपोर्ट ने व्हाइट हाउस पर दबाव बढ़ा दिया है कि वह रियाद के साथ होने वाले किसी भी परमाणु समझौते में बेहद कड़ी शर्तें जोड़े ताकि हथियारों के निर्माण की किसी भी गुंजाइश को शुरुआती स्तर पर ही कुचला जा सके। आने वाले दिनों में यह मुद्दा अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के केंद्र में रहने वाला है।

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ममता पाठक

ममता पाठक

Chief Editor

ममता पाठक न्यूज़रूम की संपादकीय दिशा तय करने वाली प्रमुख स्तंभ हैं। अंतरराष्ट्रीय खबरों की गहरी समझ और वर्षों के अनुभव के साथ, वे कंटेंट की गुणवत्त...

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