न्याय की देवी की आंख भले ही बंद होती है, लेकिन देश की सर्वोच्च अदालत की नजरें हर उस मनमानी पर टिकी होती हैं जो आम नागरिक के मौलिक अधिकारों पर प्रहार करती है। उत्तर प्रदेश के ग्रेटर नोएडा से एक ऐसा ही मामला सामने आया है, जहां कानून के रखवालों की एक मनमानी कार्रवाई ने शासन और न्यायपालिका दोनों को झकझोर कर रख दिया। गौतमबुद्ध विश्वविद्यालय के एक युवा छात्र को जंतर-मंतर पर चल रहे एक प्रदर्शन में शामिल होना इतना भारी पड़ा कि स्थानीय प्रशासन ने उस पर पांच लाख रुपये के निजी मुचलके का नोटिस थमा दिया। लेकिन जब यह मामला देश के सबसे बड़े मंदिर यानी सुप्रीम कोर्ट की चौखट पर पहुंचा, तो गाज सीधे उस अधिकारी पर गिरी जिसने यह फरमान जारी किया था।
सुप्रीम कोर्ट की सख्ती के बाद गिरी निलंबन की गाज
सुप्रीम कोर्ट की कड़ी नाराजगी और तीखी फटकार के बाद उत्तर प्रदेश शासन ने तत्काल प्रभाव से एक्शन लेते हुए एसीपी एवं कार्यपालक मजिस्ट्रेट-तृतीय डॉ. रवि शंकर मिश्रा को निलंबित कर दिया है। अदालत के सख्त रुख को भांपते हुए शासन ने बिना किसी देरी के यह कदम उठाया। इतना ही नहीं, पुलिस महानिदेशक (DGP) राजीव कृष्ण ने इस पूरे प्रकरण की गहराई से जांच के आदेश भी दे दिए हैं ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि भविष्य में इस तरह की मनमानी और दमनकारी कार्रवाई दोबारा न दोहराई जाए। राज्य शासन की ओर से सुप्रीम कोर्ट को इस निलंबन की आधिकारिक जानकारी भी सौंप दी गई है।
क्या था पूरा मामला? जानिए पूरी पृष्ठभूमि
यह पूरा विवाद तब शुरू हुआ जब ग्रेटर नोएडा स्थित प्रतिष्ठित गौतमबुद्ध विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले छात्र अक्षत त्रिपाठी ने राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर पर आयोजित एक प्रदर्शन में हिस्सा लिया था। लोकतांत्रिक देश में अपनी बात रखने और शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने का अधिकार हर नागरिक को संविधान देता है। लेकिन स्थानीय प्रशासनिक मशीनरी ने इस संवैधानिक अधिकार को नजरअंदाज करते हुए छात्र के खिलाफ एक अजीबोगरीब और भारी-भरकम कार्रवाई शुरू कर दी।
एसीपी डॉ. रवि शंकर मिश्रा की ओर से छात्र अक्षत त्रिपाठी को पांच लाख रुपये के भारी-भरकम निजी मुचलके का नोटिस जारी किया गया। एक छात्र के लिए इतनी बड़ी राशि का मुचलका भरना न केवल मानसिक प्रताड़ना था, बल्कि यह सीधे तौर पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन के लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन भी माना गया।
न्यायपालिका ने दिखाई अपनी ताकत
जब स्थानीय स्तर पर छात्र और उसके समर्थकों को कोई राहत नहीं मिली, तो मामला देश की सर्वोच्च अदालत तक जा पहुंचा। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की सुनवाई के दौरान पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों के रवैये पर गहरी चिंता और नाराजगी व्यक्त की। अदालत का मानना था कि इस तरह के नोटिस लोकतंत्र की मूल भावना के खिलाफ हैं और इनका इस्तेमाल नागरिकों को डराने-धमकाने के लिए किया जा रहा है।
- छात्र का उत्पीड़न: गौतमबुद्ध विश्वविद्यालय के छात्र अक्षत त्रिपाठी को मिला था नोटिस।
- लोकतांत्रिक अधिकार: जंतर-मंतर पर प्रदर्शन में शामिल होने पर की गई थी कार्रवाई।
- अदालत का हस्तक्षेप: सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद जागा शासन तंत्र।
- तत्काल कार्रवाई: एसीपी डॉ. रवि शंकर मिश्रा को किया गया निलंबित।
डीजीपी ने दिए निष्पक्ष जांच के आदेश
शासन स्तर पर निलंबन की कार्रवाई के बाद अब पुलिस महकमे में भी हड़कंप मच गया है। डीजीपी राजीव कृष्ण ने मामले की निष्पक्ष जांच बैठा दी है। जांच इस बात पर केंद्रित होगी कि आखिर किस नियम के तहत एक छात्र को इतने बड़े मुचलके का नोटिस जारी किया गया था और क्या इसके पीछे किसी प्रकार का राजनीतिक या प्रशासनिक दबाव था। जांच रिपोर्ट आने के बाद इस मामले में और भी अधिकारियों पर गाज गिरने की पूरी संभावना जताई जा रही है।
आम नागरिक के अधिकारों की जीत
कानून के जानकारों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट का यह सख्त रुख उन तमाम पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों के लिए एक बड़ा सबक है जो अक्सर अपनी शक्तियों का दुरुपयोग कर आम जनता या युवाओं की आवाज़ को दबाने की कोशिश करते हैं। लोकतंत्र में असहमति का अधिकार सुरक्षित है और जब-जब इस अधिकार पर प्रशासनिक तंत्र हावी होने की कोशिश करेगा, तब-तब न्यायपालिका ढाल बनकर खड़ी होगी। फिलहाल, इस कार्रवाई के बाद से प्रशासनिक गलियारों में हड़कंप मचा हुआ है और हर कोई इस हाई-प्रोफाइल मामले के अगले घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए है।