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सस्ते पेट्रोल का चक्कर या रसोई का बंटाधार? जानिए क्यों अचानक आसमान छूने लगी चीनी और आटे की कीमतें

सस्ते पेट्रोल का चक्कर या रसोई का बंटाधार? जानिए क्यों अचानक आसमान छूने लगी चीनी और आटे की कीमतें

गाड़ियों की टंकी फुल कराने के लिए सरकार की ओर से उठाया गया एक बड़ा कदम क्या अब आपकी रसोई का बजट बिगाड़ रहा है? पिछले कुछ महीनों में भारत के बाजारों में जिस तरह से चीनी, गुड़, चावल और मक्के के आटे के दाम बढ़े हैं, उसने आम आदमी की नींद उड़ा दी है। पिछले तीन महीनों के भीतर ही चीनी के भाव में 40 प्रतिशत यानी करीब 19 रुपये प्रति किलोग्राम तक का उछाल आया है। वहीं, गुड़ 24%, चावल 16% और मक्के का आटा 11% तक महंगा हो चुका है।

विशेषज्ञों का मानना है कि पिछले 10 सालों में खाद्य उत्पादों में इतनी तेजी कभी नहीं देखी गई। ऐसे में सवाल यह उठता है कि आखिर अचानक ऐसा क्या हुआ कि जो देश कभी चीनी का बड़ा निर्यातक था, उसे आज आयात (Import) करने की नौबत आ गई है? आइए इस पूरी अर्थव्यवथा और इसके पीछे की असली वजह को गहराई से समझते हैं।

अचानक क्यों लगी चीनी और आटे के दामों में आग?

इस पूरे संकट के केंद्र में है भारत सरकार की महत्वाकांक्षी एथेनॉल ब्लेंडिंग पॉलिसी (Ethanol Blending Policy)। पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने के सरकारी लक्ष्य को पूरा करने के लिए गन्ने और अनाजों का डायवर्जन तेजी से बढ़ा है। मानकों के अनुसार, एथेनॉल बनाने में करीब 67 प्रतिशत हिस्सा मक्के, टूटे हुए चावल और खराब अनाज का होता है, जबकि बाकी का 33 प्रतिशत हिस्सा गन्ने और उसके उप-उत्पादों (शीरा/Molasses) से आता है।

ऑल इंडिया डिस्टिलर्स एसोसिएशन के आंकड़ों पर गौर करें तो पिछले साल देश में करीब 720 करोड़ लीटर एथेनॉल का उत्पादन हुआ। इसके लिए 1.33 करोड़ टन अनाज और 25 लाख टन चीनी बनाने योग्य गन्ने के शीरे का इस्तेमाल किया गया। जब बड़े पैमाने पर गन्ने का रस और शीरा ईंधन बनाने में इस्तेमाल होने लगा, तो बाजार में चीनी के लिए कम स्टॉक बचा।

स्टॉक में भारी गिरावट और 'पेनिक बाइंग'

इंडियन शुगर एंड बायो एनर्जी मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (ISMA) के अनुसार, साल 2026-27 के पेराई सीजन से पहले मिलों के पास ओपनिंग स्टॉक घटकर केवल 32 लाख टन ही बचने का अनुमान है, जबकि पिछले साल यह 47 लाख टन था। घरेलू खपत के लिए सुरक्षित रूप से कम से कम 50 लाख टन का ओपनिंग स्टॉक जरूरी माना जाता है।

"देश में चीनी की कोई वास्तविक कमी नहीं है। बाजार में दिख रही यह तेजी मुख्य रूप से सट्टेबाजी और 'पेनिक बाइंग' (घबराहट में की जाने वाली खरीदारी) का नतीजा है।" — दीपक बलानी, डायरेक्टर जनरल, ISMA

सस्ते पेट्रोल का आपकी रसोई पर सीधा असर

सस्ता पेट्रोल और ग्रीन एनर्जी का यह सपना अप्रत्यक्ष रूप से खाने-पीने की हर चीज को महंगा कर रहा है। चूंकि एथेनॉल के लिए मक्का और अन्य अनाज भारी मात्रा में डायवर्ट हो रहे हैं, इसलिए पशु आहार (Animal Feed) और पोल्ट्री फीड की उपलब्धता कम हो गई है। नतीजतन, पशु आहार के दाम 8 से 10 प्रतिशत तक बढ़ गए हैं।

जब पशुओं का चारा महंगा होगा, तो उसका असर दूध, मक्खन और अंडों की कीमतों पर पड़ना लाजिमी है। यही वजह है कि दूध और अंडे के दाम भी 5 से 10 प्रतिशत तक महंगे हो चुके हैं। यानी जो पैसा आप पेट्रोल पर बचाते हैं, उससे कहीं ज्यादा पैसा आपको चीनी, दूध और आटे की बढ़ी हुई कीमतों के रूप में चुकाना पड़ रहा है.

निर्यात से आयात तक का सफर

मिनिस्ट्री ऑफ कमर्शियल अफेयर्स के आंकड़े इस बात की गवाही देते हैं कि भारत की व्यापारिक स्थिति कितनी तेजी से बदली है:

  • वर्ष 2022-23: देश से 1.33 करोड़ टन चीनी-शीरा और संबंधित उत्पादों का निर्यात किया गया था।
  • वर्ष 2023-24: यह निर्यात घटकर 51.35 लाख टन पर आ गया।
  • वर्ष 2024-25: निर्यात और सिमटकर 38.43 लाख टन रह गया।
  • वर्ष 2026-27: अब निर्यात का आंकड़ा शून्य रहने की उम्मीद है, क्योंकि देश के सामने खुद आयात करने की नौबत आ चुकी है।

सरकार ने स्थिति संभालने के लिए क्या कदम उठाए?

बढ़ती कीमतों पर लगाम कसने के लिए सरकार ने कड़े कदम उठाने शुरू कर दिए हैं। गुरुवार को सरकार ने टैरिफ रेट कोटा के तहत 31 अक्टूबर तक 10 लाख टन रॉ शुगर के ड्यूटी-फ्री इम्पोर्ट (Duty-Free Import) को मंजूरी दे दी है। इसके साथ ही, जिन थोक उपभोक्ताओं की खपत हर महीने 10 टन से अधिक है, उन पर सख्त स्टॉक लिमिट लगा दी गई है। ऐसे बड़े खरीदार अब अपने पास केवल 15 दिनों की खपत के बराबर ही चीनी का स्टॉक रख सकेंगे।

हालांकि, कन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (CAIT) के राष्ट्रीय मंत्री शंखर ठक्कर का कहना है कि वे पिछले 3 साल से चेतावनी दे रहे थे कि गन्ने का अत्यधिक एथेनॉल में उपयोग गंभीर संकट पैदा करेगा। उनका मानना है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी इस समय रॉ शुगर आसानी से और कम कीमत पर उपलब्ध होना मुश्किल है, जिससे सरकार के लिए आयात की राह भी आसान नहीं होगी।

निष्कर्ष

हर देश की तरह भारत भी ग्रीन एनर्जी और कार्बन उत्सर्जन कम करने के लक्ष्यों की ओर बढ़ रहा है, जो पर्यावरण के लिए बेहद जरूरी है। लेकिन इसके साथ ही खाद्य सुरक्षा (Food Security) और महंगाई के बीच एक संतुलन बनाना नीति निर्माताओं के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गया है। जब तक एथेनॉल उत्पादन के लिए अनाजों और गन्ने के विकल्पों पर गंभीरता से विचार नहीं किया जाता, तब तक आम आदमी की थाली पर महंगाई की मार यूं ही पड़ती रहेगी।

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अनुराधा दुबे

अनुराधा दुबे

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अनुराधा दुबे एक समर्पित और अनुभवी कंटेंट राइटर हैं, जो भारत से जुड़ी राजनीतिक, सामाजिक और नीतिगत खबरों को गहराई से समझकर पाठकों तक पहुंचाती हैं। उन...

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