खेल के मैदान में जब कोई खिलाड़ी ऐतिहासिक सफलता हासिल करता है, तो उसके बाद का दौर जश्न, सम्मान समारोहों और बधाइयों का होता है। देश का नाम रोशन करने वाले एथलीट के स्वागत में पलक-पांवड़े बिछा दिए जाते हैं। लेकिन, हरियाणा के चरखी दादरी से ताल्लुक रखने वाले युवा और प्रतिभाशाली पहलवान सुजीत कलकल ने इस चकाचौंध से दूर रहने का फैसला किया है। उनके लिए इस वक्त माला पहनने और मंच साझा करने से कहीं ज्यादा अहम अखाड़े की माटी है, जहां उन्हें अपनी अगली और सबसे बड़ी चुनौती का सामना करना है।
सुजीत के लिए पिछला हफ्ता किसी सपने के सच होने जैसा रहा है। उन्होंने पुरुषों की 65 किलोग्राम फ्रीस्टाइल श्रेणी में जापान के ओलंपिक चैंपियन कोटारो कियोका को सेमीफाइनल में धूल चटाई। इसके बाद फाइनल मुकाबले में एक समय 2-9 से पिछड़ने के बाद गजब का कमबैक करते हुए स्वर्ण पदक अपने नाम किया। उनके इस जांबाज प्रदर्शन के लिए उन्हें एशियाई खेल 2026 के सर्वश्रेष्ठ भारतीय पुरुष एथलीट के प्रतिष्ठित 'राजा रणधीर सिंह पुरस्कार' से भी नवाजा गया।
जश्न से दूर, मैट पर नजर
महज 23 साल की उम्र में सफलता के शिखर को छूने वाले सुजीत अपनी इस ऐतिहासिक जीत के खुमार में बिल्कुल डूबा रहना नहीं चाहते। स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (SAI Media) द्वारा आयोजित एक वर्चुअल बातचीत के दौरान उन्होंने अपनी प्राथमिकताओं को बेहद स्पष्ट करते हुए कहा, "एशियाई खेलों में मेडल जीतने के बाद सम्मान समारोहों और तमाम तरह की व्यस्तता जैसी कुछ चीजें सामने आती हैं, जो ध्यान भटकाती हैं। लेकिन मैं इन सबसे बचकर जितनी जल्दी हो सके मैट पर वापस लौटना चाहता हूँ।"
सुजीत की यह सोच दर्शाती है कि वह अपनी सफलताओं से संतुष्ट होने वाले एथलीट नहीं हैं। उनकी इस बेताबी की एक बड़ी वजह भी है। आगामी 24 अक्टूबर से कजाकिस्तान की राजधानी अस्ताना में विश्व कुश्ती चैंपियनशिप (World Championships) का आगाज होने जा रहा है, और वहाँ का मुकाबला आसान नहीं होने वाला है।
दमदार फॉर्म और नया इतिहास रचने का मौका
वर्तमान में सुजीत 65 किलोग्राम भार वर्ग में एक प्रचंड लय में चल रहे हैं। वह मौजूदा अंडर-23 वर्ल्ड चैंपियन, एशियन चैंपियन और एशियाई खेल के स्वर्ण पदक विजेता हैं। पिछले साल विश्व चैंपियनशिप के कांस्य पदक मुकाबले में हारने के बाद से सुजीत ने पीछे मुड़कर नहीं देखा है। उन्होंने लगातार 19 बाउट्स जीते हैं और घरेलू स्तर पर भी वह पूरी तरह अपराजित रहे हैं।
लेकिन आने वाली वर्ल्ड चैंपियनशिप उनके लिए अब तक की सबसे बड़ी अग्निपरीक्षा साबित हो सकती है। इस टूर्नामेंट में उन्हें ईरान के धाकड़ पहलवान रहमान अमुजादखलीली से कड़ी टक्कर मिल सकती है, जिनसे सुजीत पिछले साल हार गए थे। इसके अलावा अमेरिकी सनसनी बोवेन बासेट भी मैदान में होंगे, जिन्होंने यूएस ट्रायल्स में वर्ल्ड्स के कांस्य पदक विजेता रीयल मार्शल रे वुड्स को शिकस्त दी है।
"विश्व चैंपियनशिप में मुकाबले का स्तर बेहद कठिन होने वाला है और यह मेरे लिए बिल्कुल भी आसान नहीं रहेगा। यह निश्चित रूप से एशियाई खेलों से ज्यादा प्रतिस्पर्धी है और यही बात इसे और अधिक रोमांचक बनाती है। यह मेरे लिए साल की सबसे महत्वपूर्ण प्रतियोगिता है," सुजीत ने अपनी आगामी चुनौती पर बात करते हुए कहा।
कमियों को दूर करने की जद्दोजहद
भले ही सुजीत का एशियाई खेलों का सफर लगभग त्रुटिहीन रहा हो, लेकिन तकनीकी रूप से अभी भी कुछ ऐसे पहलू हैं जिन पर उनके कोचिंग स्टाफ और खुद सुजीत का पूरा फोकस है। खासकर मुकाबलों की शुरुआत में मैट पर पोजीशन के मामले में उन्होंने कुछ आसान अंक गंवाए थे।
सुजीत के निजी कोच कुलदीप सिंह ने इस बारे में बात करते हुए बताया, "फाइनल में सुजीत के पिछड़ने की एक बड़ी वजह यह थी कि उसने जमीन (ग्राउंड) पर मुकाबले के दौरान विरोधी को अधिक फायदेमंद स्थिति दे दी थी। हमारे पास जो थोड़ा सा समय बचा है, हम उसी कमी को सुधारने पर काम कर रहे हैं।" सुजीत भी इस बात को स्वीकार करते हैं कि उन्हें अपने डिफेंस और ग्राउंड रेसलिंग पर खास ध्यान देने की जरूरत है। उन्होंने कहा, "मेरे दोनों कोचों (कुलदीप और शाको) ने मुझे ग्राउंड पर मजबूत स्थिति बनाने के लिए कहा है। मैं इस पर लगातार मेहनत कर रहा हूँ। मुझे इस समय ग्राउंड पर बेहतरीन तरीके से अटैक करने और यदि атаку करने की स्थिति छूट जाए तो खुद को बचाने (डिफेंस) पर काम करना है।"
आक्रामक खेल शैली और 'धोबी पछाड़' का जादूसुजीत के खेल में आक्रामकता लाने का श्रेय उनके राष्ट्रीय कोच बेन्टिनिडिस शाको को जाता है, जिन्होंने इससे पहले बजरंग पूनिया को भी ओलंपिक पदक तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई थी। कोच शाको हमेशा से सुजीत को आक्रामक रुख अपनाने की हिदायत देते आए हैं।
सुजीत ने एक दिलचस्प किस्सा साझा करते हुए बताया, "एशियाई खेलों से ठीक पहले मैंने रूस में एक टूर्नामेंट खेला था और उसके सभी मुकाबले जीते थे। लेकिन कोच शाको उस प्रदर्शन से पूरी तरह खुश नहीं थे। उन्होंने मुझे और ज्यादा अटैक करने को कहा क्योंकि मेरे पास कई तरह की आक्रमण तकनीक मौजूद हैं। मैंने इस पर काम किया और एशियाई खेलों के दौरान इसे मैदान पर उतार भी दिखाया, जिसके चलते मैं इतने अंक जुटाने में सफल रहा। मुझे लगता है कि मुझे वर्ल्ड चैंपियनशिप में भी इसी रणनीति को जारी रखना होगा।"
एशियाई खेलों के दौरान सुजीत के प्रदर्शन का सबसे बड़ा आकर्षण ईरानी पहलवान के खिलाफ उनका 'धोबी पछाड़' दांव था। यह पारंपरिक भारतीय कुश्ती की एक ऐसी कला है, जिसमें विरोधी की गति और ऊपरी शरीर की मजबूत पकड़ का इस्तेमाल करके उसे हवा में उठाया जाता है और कंधे या पीठ के बल मैट पर पटक दिया जाता है।
इस शानदार दांव के बारे में सुजीत ने कहा, "मैं इसके लिए कोच शाको को धन्यवाद देना चाहता हूँ। मैं अभ्यास के दौरान इस तकनीक को आजमाता था, लेकिन कभी मैच के दौरान इसे सही से अंजाम नहीं दे पा रहा था। कोच शाको ने इसमें कुछ सुधार किए और मुझे इसकी बार-बार प्रैक्टिस करने को कहा। मुझे पूरा विश्वास है कि नियमित अभ्यास की वजह से ही मैं इसे मैट पर सफलतापूर्वक लागू कर पाया।"कजाकिस्तान में इतिहास रचने की दहलीज पर
सुजीत के पास अब कजाकिस्तान के अस्ताना रवाना होने और अपनी तैयारियों को अंतिम रूप देने के लिए 15 दिन से भी कम का समय बचा है। इन पंद्रह दिनों में वह समारोहों और लाइमलाइट से दूर पूरी तरह से मैट पर पसीना बहाने को बेताब हैं। यदि उनका यह समर्पण और आक्रामक रुख कजाकिस्तान में भी रंग लाया, तो वह भारत के कुश्ती इतिहास में केवल दूसरे ऐसे पहलवान बन जाएंगे जो सीनियर वर्ल्ड चैंपियनशिप का स्वर्ण पदक अपने नाम करने का गौरव हासिल करेंगे। पूरा देश इस युवा चैंपियन की ओर भरी उम्मीदों से देख रहा है।