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30 सितंबर के बाद खाड़ी में बदलेगा समीकरण, इराक से एयर डिफेंस हटा रहा अमेरिका

30 सितंबर के बाद खाड़ी में बदलेगा समीकरण, इराक से एयर डिफेंस हटा रहा अमेरिका

पश्चिम एशिया के भू-राजनीतिक मानचित्र पर एक बार फिर बड़े फेरबदल की सुगबुगाहट तेज हो चुकी है। वैश्विक कूटनीति के गलियारों से लेकर रणनीतिक विश्लेषकों की बैठकों तक, इन दिनों सिर्फ एक ही सवाल पर सबसे ज्यादा माथापच्ची चल रही है—आखिर 30 सितंबर के बाद खाड़ी के इस बेहद संवेदनशील देश में क्या नया भूचाल आने वाला है? मिल रही जानकारियों के मुताबिक, दुनिया की महाशक्ति कहे जाने वाले अमेरिका ने एक बेहद नाजुक और संवेदनशील समय में इराक से अपनी 'घर वापसी' की प्रक्रिया को लगभग अंतिम रूप देना शुरू कर दिया है। इस कदम के तहत अमेरिकी सेनाएं न केवल अपने बेस खाली कर रही हैं, बल्कि अपनी सुरक्षा के सबसे अहम कवच यानी एयर डिफेंस सिस्टम को भी वहां से समेटने में जुटी हुई हैं।

ऐतिहासिक फेरबदल और 30 सितंबर की वह तारीख

किसी भी रणनीतिक क्षेत्र से अचानक सैन्य साजो-सामान और रक्षा प्रणालियों को हटाना सामान्य घटना नहीं होती। खासकर तब जब बात इराक जैसे देश की हो, जहां पिछले दो दशकों से अधिक समय से अमेरिकी और पश्चिमी ताकतों का गहरा दखल रहा है। 30 सितंबर की समयसीमा के करीब आते ही बगदाद से लेकर वाशिंगटन तक कूटनीतिक हलचलें अपने चरम पर हैं। विश्लेषकों का मानना है कि यह सिर्फ सैन्य तैनाती में कटौती भर नहीं है, बल्कि पश्चिम एशिया में अमेरिकी रणनीति के एक पूरे अध्याय के समापन और एक नए, अनिश्चित दौर की शुरुआत का संकेत है।

वर्ष 2003 के बाद से अमेरिकी सेनाओं की मौजूदगी ने इस पूरे क्षेत्र के सुरक्षा ढांचे को परिभाषित किया है। लेकिन अब, बदलते वैश्विक समीकरणों और घरेलू राजनीतिक दबावों के बीच, अमेरिका अपने कदम पीछे खींच रहा है। सवाल यह है कि क्या यह फैसला क्षेत्र में शांति लाएगा या फिर एक बड़ा सुरक्षा शून्य पैदा कर देगा, जिसे भरने के लिए क्षेत्रीय ताकतें आमने-सामने आ सकती हैं?

एयर डिफेंस सिस्टम हटाए जाने के गहरे मायने

सैन्य मामलों के जानकारों का कहना है कि किसी भी युद्ध क्षेत्र या सामरिक ठिकाने से पैट्रियट या अन्य एयर डिफेंस सिस्टम को हटाना इस बात का स्पष्ट संकेत है कि उस क्षेत्र में अब सीधी सैन्य भागीदारी को समाप्त किया जा रहा है। इराक में अमेरिकी ठिकानों पर हाल के वर्षों में कई बार मिलिशिया संगठनों द्वारा ड्रोन और रॉकेट हमले किए गए थे। ऐसे में, एयर डिफेंस सिस्टम का हटना अमेरिकी सैनिकों को सीधे तौर पर जोखिम में डालने जैसा लग सकता है, लेकिन इसका दूसरा पहलू यह है कि अमेरिका अब इस क्षेत्र की सुरक्षा का बोझ खुद उठाने के मूड में बिल्कुल नहीं है।

  • सुरक्षा का शून्य: अमेरिकी छावनियों और डिफेंस सिस्टम के हटने से वहां एक ऐसा खालीपन पैदा होगा, जिसे स्थानीय सुरक्षा बल कितनी जल्दी भर पाते हैं, यह देखने वाली बात होगी।
  • सक्रिय मिलिशिया समूह: इराकी क्षेत्र में सक्रिय विभिन्न सशस्त्र मिलिशिया गुट इस घटनाक्रम को अपनी जीत के रूप में देख रहे हैं, जिससे स्थानीय राजनीतिक स्थिरता पर असर पड़ सकता है।
  • क्षेत्रीय तनाव में वृद्धि: इस बदलाव का असर केवल इराक तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि ईरान और अन्य पड़ोसी देशों के साथ शक्ति संतुलन पर भी इसका गहरा प्रभाव पड़ेगा।

बगदाद के रणनीतिक गलियारों में बेचैनी

इराक की राजधानी बगदाद में इस फैसले के बाद से राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर भारी उथल-पुथल मची हुई है। इराकी सरकार और सुरक्षा बलों के सामने अब यह सुनिश्चित करने की चुनौती है कि अमेरिकी सैनिकों के जाने के बाद देश की संप्रभुता और आंतरिक सुरक्षा पूरी तरह सुरक्षित रहे। देश के भीतर सक्रिय विभिन्न मिलिशिया और राजनीतिक दल इस बात पर बंटे हुए हैं कि अमेरिका की विदाई को किस रूप में देखा जाए। एक तरफ जहां कुछ गुट इसे विदेशी हस्तक्षेप का अंत मान रहे हैं, वहीं दूसरी ओर उग्रवाद और आतंकवाद के पुनरुत्थान की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।

आगे क्या होगा? पश्चिम एशिया का भविष्य

जैसे-जैसे 30 सितंबर की तारीख नजदीक आ रही है, खाड़ी देशों में कूटनीतिक बैठकों का दौर तेज हो गया है। खाड़ी के अन्य देश भी इस बात से चिंतित हैं कि अमेरिका के इस तरह पीछे हटने से क्षेत्र में शक्ति का संतुलन बिगड़ सकता है। क्या इराक एक बार फिर आंतरिक संघर्ष और अस्थिरता के दौर में धकेल दिया जाएगा, या फिर वहां की सरकार अपने दम पर हालात संभालने में कामयाब होगी? इन तमाम सवालों के जवाब आने वाले दिनों में ही मिल सकेंगे, लेकिन यह तय है कि पश्चिम एशिया की राजनीति अब पहले जैसी नहीं रहने वाली है।

यह घटनाक्रम एक बार फिर साबित करता है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कोई भी रिश्ता स्थायी नहीं होता और महाशक्तियां अपने राष्ट्रीय हितों के हिसाब से कभी भी अपने कदम मोड़ सकती हैं। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि सितंबर के आखिरी दिनों में अमेरिकी सेनाओं की अंतिम टुकड़ी जब इराक की धरती छोड़ेगी, तो वहां का राजनीतिक और सुरक्षा ताना-बाना किस करवट बैठेगा।

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ममता पाठक

ममता पाठक

Chief Editor (विदेश खबरें)

ममता पाठक न्यूज़रूम की संपादकीय दिशा तय करने वाली प्रमुख स्तंभ हैं। अंतरराष्ट्रीय खबरों की गहरी समझ और वर्षों के अनुभव के साथ, वे कंटेंट की गुणवत्त...

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