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सैनिकों को दो मोर्चों पर न लड़ना पड़े: क्यों उठ रही है राष्ट्रीय सैन्य आयोग की मांग?

सैनिकों को दो मोर्चों पर न लड़ना पड़े: क्यों उठ रही है राष्ट्रीय सैन्य आयोग की मांग?

सीमा पर माइनस डिग्री तापमान में बंदूक ताने खड़ा जवान जब पूरे देश को सुकून की नींद देता है, तब क्या हमने कभी सोचा है कि उसके अपने घर में कितना सुकून है? कड़वी हकीकत यह है कि सरहद से छुट्टियों में घर लौटा जवान अक्सर परिवार के साथ वक्त बिताने के बजाय तहसील, कचहरी और सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने को मजबूर होता है।

सरहद की जंग बनाम सिस्टम से संघर्ष

गढ़वाल राइफल्स के पूर्व सैनिक और 'पूर्व सैनिक संघर्ष समिति' (कोटद्वार) के अध्यक्ष महेंद्र पाल सिंह रावत इस पीड़ा को उजागर करते हुए कहते हैं कि एक जवान अपने जीवन के सबसे बेहतरीन 20-25 साल देश को दे देता है। लेकिन जब वह घर आता है, तो भूमि विवाद, पेंशन की उलझनें, प्रशासनिक ढिलाई और न्यायिक विलंब उसकी पूरी छुट्टियों को निगल जाते हैं।

यह केवल एक प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा सीधा मामला है। जिस सैनिक का दिमाग घर-परिवार की कानूनी और जमीनी उलझनों में फंसा रहेगा, उससे सीमा पर पूर्ण मानसिक एकाग्रता की उम्मीद करना बेमानी है। फौज का मनोबल केवल अत्याधुनिक हथियारों से नहीं, बल्कि इस यकीन से मजबूत होता है कि देश उसकी पीठ पीछे उसके परिवार का ख्याल रख रहा है।

क्या 'राष्ट्रीय सैन्य आयोग' बन सकता है स्थायी समाधान?

इसी प्रशासनिक ढर्रे को बदलने के लिए अब देश में 'राष्ट्रीय सैन्य आयोग' (National Military Commission) के गठन की मांग जोर पकड़ रही है। जिस तरह देश में महिला आयोग, बाल अधिकार संरक्षण आयोग और मानवाधिकार आयोग कार्य करते हैं, ठीक उसी तर्ज पर सैनिकों और उनके परिवारों के लिए एक स्वतंत्र एवं अधिकार-संपन्न आयोग की सख्त जरूरत महसूस की जा रही है।

आयोग बनने से कैसे मिलेगी जवानों को राहत?

  • पेंशन व सेवा लाभ: कागजी पेचीदगियों के कारण बरसों से अटकी पेंशन और एरियर का त्वरित निस्तारण।
  • भूमि एवं राजस्व विवाद: जवानों की अनुपस्थिति में उनकी संपत्तियों पर होने वाले अवैध कब्जों पर फास्ट-ट्रैक सुनवाई।
  • स्वास्थ्य और पुनर्वास: रिटायरमेंट के बाद चिकित्सा (ECHS) और रोजगार संबंधी शिकायतों का एक ही छत के नीचे समाधान।
  • प्रशासनिक प्राथमिकता: स्थानीय पुलिस और नागरिक प्रशासन को सैनिकों के मामलों में समयबद्ध जवाबदेही तय करना।

नारों से आगे बढ़कर व्यवस्था बदलने का वक्त

राष्ट्रीय पर्वों पर मंचों से भाषण देना, भाषणों में तालियां बजाना और पुष्पांजलि अर्पित करना ही सैनिक का सम्मान नहीं है। वास्तविक सम्मान तब होगा जब थाने या तहसील में पहुंचा एक सैनिक न्याय के लिए लाचार महसूस न करे।

"यदि हम चाहते हैं कि भारत की सीमाएं पूरी तरह अभेद्य रहें, तो सरहद पर तैनात जवान को अपने घर-परिवार की सुरक्षा से निश्चिंत करना होगा। सैनिक को केवल एक ही लड़ाई लड़नी चाहिए—देश के दुश्मनों के खिलाफ। उसे अपने ही देश की व्यवस्था से दूसरी लड़ाई लड़ने पर मजबूर करना कतई न्यायसंगत नहीं है।"

यह किसी एक सरकार या राजनीतिक दल का एजेंडा नहीं, बल्कि समूचे राष्ट्र की सामूहिक जिम्मेदारी है। सैनिक किसी एक विचारधारा का नहीं, बल्कि पूरे तिरंगे का होता है। इसलिए उसकी गरिमा और अधिकारों की रक्षा के लिए एक मजबूत व्यवस्था बनाना ही सच्ची राष्ट्रभक्ति होगी।

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रिपोर्टर: admin

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