अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के गलियारों से एक बेहद चौंकाने और बड़ी रणनीतिक हलचल भरी खबर सामने आ रही है। वैश्विक भू-राजनीतिक समीकरणों के बीच अब से ठीक कुछ ही दिनों बाद, दुनिया की दो सबसे बड़ी उभरती अर्थव्यवस्थाओं के शीर्ष नेता आमने-सामने होंगे। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग इसी सप्ताह भारत की आधिकारिक यात्रा पर नई दिल्ली आ रहे हैं। उनकी यह यात्रा महज एक कूटनीतिक दौरा नहीं है, बल्कि इसके दूरगामी परिणाम वैश्विक शांति, व्यापार और कूटनीति पर पड़ने की पूरी संभावना है।
चीन के विदेश मंत्रालय की ओर से जारी आधिकारिक बयानों के मुताबिक, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विशेष निमंत्रण पर राष्ट्रपति शी जिनपिंग आगामी 12 और 13 सितंबर को नई दिल्ली की धरती पर कदम रखेंगे। मौका होगा 18वें ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन का, जिसकी मेजबानी इस बार भारत कर रहा है। सात लंबे वर्षों के अंतराल के बाद यह पहला अवसर होगा जब शी जिनपिंग भारत के दौरे पर आ रहे हैं। इस यात्रा को लेकर न केवल भारतीय कूटनीतिक हलकों में बल्कि पूरी दुनिया की मीडिया और नीति निर्माताओं की नजरें टिकी हुई हैं।
वैश्विक उथल-पुथल के बीच कूटनीतिक हलचल
वर्तमान समय में पूरी दुनिया एक अभूतपूर्व दौर से गुजर रही है। एक तरफ जहां पश्चिम एशिया (Middle East) में लगातार तनाव और संघर्ष गहराता जा रहा है, वहीं दूसरी ओर रूस-यूक्रेन युद्ध ने वैश्विक अर्थव्यवस्था और सुरक्षा तंत्र को बुरी तरह प्रभावित किया है। इन तमाम वैश्विक अस्थिरताओं और अनिश्चितताओं के बीच भारत में आयोजित होने जा रहा यह ब्रिक्स शिखर सम्मेलन अपने आप में बेहद अहम हो जाता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस वैश्विक संकट के दौर में ग्लोबल साउथ (Global South) की आवाज को बुलंद करने और बहुपक्षीय सहयोग को नई दिशा देने के लिए यह मंच एक गेम-चेंजर साबित हो सकता है। भारत वर्तमान में ब्रिक्स का अध्यक्ष है और इस जिम्मेदारी के तहत वह दुनिया के प्रमुख विकासशील देशों के साथ मिलकर आर्थिक और रणनीतिक मुद्दों पर ठोस चर्चा को आगे बढ़ा रहा है।
सात साल का लंबा इंतजार और द्विपक्षीय संबंध
गौरतलब है कि शी जिनपिंग की यह यात्रा इसलिए भी बेहद खास है क्योंकि पिछले सात सालों में दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों में कई उतार-चढ़ाव आए हैं। सीमा विवाद और अन्य रणनीतिक असहमतियों के कारण दोनों देशों के शीर्ष नेतृत्व के बीच सीधी मुलाकातों का सिलसिला कुछ समय के लिए धीमा जरूर पड़ा था, लेकिन हालिया महीनों में स्थिति को सामान्य बनाने के लिए कूटनीतिक स्तर पर लगातार प्रयास किए जा रहे हैं।
इस बड़े दौरे की पटकथा पिछले महीने ही लिख दी गई थी, जब राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजीत डोभाल और चीन के विदेश मंत्री वांग यी के बीच बीजिंग में एक उच्चस्तरीय और व्यापक बातचीत हुई थी। उस बैठक में दोनों देशों ने सीमा पर शांति और स्थिरता बनाए रखने के साथ-साथ द्विपक्षीय संबंधों में जमी बर्फ को पिघलाने और आपसी विश्वास को बहाल करने के उपायों पर खुलकर चर्चा की थी। उसी का परिणाम है कि आज दोनों देशों के शीर्ष नेता एक बार फिर बातचीत की मेज पर आमने-सामने बैठने के लिए तैयार हैं।
ब्रिक्स शिखर सम्मेलन का पूरा खाका
नई दिल्ली में आयोजित होने वाला यह 18वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन शनिवार और रविवार को अपने चरम पर होगा। इस दौरान सदस्य देशों के बीच निम्नलिखित प्रमुख मुद्दों पर गहन मंत्रणा होने की उम्मीद है:
- वैश्विक आर्थिक स्थिरता: मंदी के दौर से जूझ रही दुनिया को उबारने के लिए आपसी व्यापार को बढ़ावा देना।
- स्थानीय मुद्राओं में व्यापार: डॉलर पर निर्भरता कम करने के लिए ब्रिक्स देशों के बीच आपसी स्थानीय मुद्राओं में लेन-देन को प्रोत्साहन।
- सुरक्षा और आतंकवाद: सीमा पार आतंकवाद और क्षेत्रीय सुरक्षा के मुद्दों पर साझा रणनीति तैयार करना।
- तकनीकी और नवाचार सहयोग: एआई, हरित ऊर्जा और अंतरिक्ष अनुसंधान जैसे क्षेत्रों में मिलकर काम करना।
विशेषज्ञों की राय: क्या बदलेंगे समीकरण?
अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकारों का कहना है कि भारत और चीन जैसे दो एशियाई दिग्गजों का एक मंच पर आना और द्विपक्षीय मुद्दों पर बात करना पूरी दुनिया के लिए एक सकारात्मक संदेश है। हालांकि, भारत अपने राष्ट्रीय हितों और सुरक्षा को सर्वोपरि रखते हुए ही किसी भी कूटनीतिक कदम को आगे बढ़ा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने वैश्विक पटल पर अपनी एक ऐसी स्वतंत्र और मजबूत छवि बनाई है, जहां वह दुनिया के हर बड़े देश के साथ बराबरी के स्तर पर संवाद करने की क्षमता रखता है।
शी जिनपिंग का यह दौरा केवल ब्रिक्स के एजेंडे तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पर्दे के पीछे भारत और चीन के शीर्ष नेतृत्व के बीच द्विपक्षीय वार्ताओं पर भी सबकी निगाहें टिकी रहेंगी। क्या यह यात्रा दोनों देशों के बीच सीमा पर पूर्ण शांति बहाली का नया मार्ग प्रशस्त करेगी? इसका जवाब आने वाले शनिवार और रविवार को नई दिल्ली में होने वाली बैठकों के नतीजों से ही मिलेगा।
फिलहाल, प्रशासनिक स्तर पर राजधानी दिल्ली में सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए जा रहे हैं और दुनिया भर की मीडिया इस ऐतिहासिक कूटनीतिक महाकुंभ को कवर करने के लिए तैयार बैठी है। हर किसी की जुबान पर बस यही सवाल है—क्या यह शिखर सम्मेलन एशिया के दो सबसे बड़े देशों के रिश्तों को एक नई और सकारात्मक दिशा दे पाएगा?