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यमन में तेजी से क्यों खत्म हो रहा है पानी, क्या यह बनेगा पहला देश?

यमन में तेजी से क्यों खत्म हो रहा है पानी, क्या यह बनेगा पहला देश?

दुनिया के नक्शे पर कई ऐसे देश हैं जो संघर्ष, राजनीतिक उथल-पुथल और आर्थिक तंगी का सामना कर रहे हैं, लेकिन यमन के सामने एक ऐसा संकट आ खड़ा हुआ है जो सीधे तौर पर इंसानी वजूद से जुड़ा है। यमन इस समय दुनिया के सबसे भीषण जल संकट (Water Crisis) के दौर से गुजर रहा है। हालात इतने डरावने हैं कि पर्यावरण और भू-जल विशेषज्ञ यह चेतावनी देने लगे हैं कि यमन दुनिया का ऐसा पहला देश बन सकता है, जहां का ग्राउंडवाटर (भू-जल) पूरी तरह से सूख जाएगा।

वर्ष 2026 में खड़े होकर जब हम वैश्विक स्तर पर जलवायु परिवर्तन और संसाधनों की कमी का जायजा लेते हैं, तो यमन का यह संकट किसी बड़े खतरे की घंटी से कम नहीं है। आखिर ऐसा क्या हुआ कि इतिहास में हरी-भरी भूमि के रूप में जाना जाने वाला यह क्षेत्र आज बूंद-बूंद पानी के लिए मोहताज हो गया है? आइए इस पूरी मानवीय और प्राकृतिक आपदा के हर पहलू को गहराई से समझते हैं।

अंधाधुंध दोहन और कमजोर नीतियां: कैसे गहराया संकट

यमन में पानी की कमी रातों-रात पैदा नहीं हुई है। यह दशकों की प्रशासनिक लापरवाही, अनियंत्रित जल निकासी और खराब जल प्रबंधन का नतीजा है। जानकारों के मुताबिक, यमन में पानी का मुख्य स्रोत नदियां या बारहमासी झीलें नहीं हैं, बल्कि भूमिगत जलस्तर (Aquifers) है। लेकिन पिछले कुछ दशकों में इन जलस्रोतों का जिस बेदर्दी से दोहन किया गया है, उसने स्थिति को अपरिवर्तनीय मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है।

यमन की राजधानी सना (Sana'a) और देश के अन्य बड़े शहरों में पानी की यह किल्लत अब हर घर की कहानी बन चुकी है। पाइपलाइनों में हफ्तों पानी नहीं आता, और लोगों को प्राइवेट टैंकरों पर निर्भर रहना पड़ता है। आम नागरिकों के लिए साफ पीने का पानी खरीदना एक लग्जरी बन चुका है, जिसे हर कोई वहन नहीं कर सकता।

खेतों से ज्यादा 'कात' की खेती: पानी की बर्बादी का सबसे बड़ा कारण

यमन में पानी के तेजी से खत्म होने के पीछे एक और बहुत बड़ा कारण है - 'कात' (Khat) की खेती। कात एक प्रकार का हल्का नशीला पौधा है, जिसे यमन के लोग बड़े पैमाने पर चबाते हैं। देश की अर्थव्यवस्था और सामाजिक संस्कृति में कात की एक बड़ी भूमिका है, लेकिन कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि यह फसल यमन के पानी को दीमक की तरह चाट रही है।

आंकड़ों के अनुसार, यमन के कुल कृषि योग्य पानी का एक बहुत बड़ा हिस्सा अकेले कात की खेती में खर्च हो जाता है। अन्य खाद्यान्न फसलों की तुलना में कात को उगाने और सींचने में अत्यधिक मात्रा में पानी की आवश्यकता होती है। जहां एक तरफ देश के बच्चे और परिवार पीने के पानी की बूंद-बूंद के लिए तरस रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ उपजाऊ जमीन का एक बड़ा हिस्सा ऐसी फसल के लिए पानी खींच रहा है जो केवल नशे की जरूरत पूरी करती है।

जलवायु परिवर्तन और मॉनसूनी अनिश्चितता

प्राकृतिक कारकों की बात करें तो जलवायु परिवर्तन ने यमन की मुमुक्षु स्थिति को और गंभीर बना दिया है। पिछले कुछ वर्षों में देश में बारिश के पैटर्न में भारी बदलाव आया है। पारंपरिक रूप से होने वाली मानसूनी बारिश या तो बेहद कम हो गई है या फिर जब होती है, तो अचानक से आने वाली बाढ़ (Flash Floods) का रूप ले लेती है।

  • कम बारिश: वार्षिक वर्षा का स्तर लगातार गिर रहा है, जिससे भूमिगत जल का रीचार्ज (पुनर्भरण) होना बंद हो गया है।
  • अचानक बाढ़: जब बारिश होती है, तो सूखी और बंजर जमीन उस पानी को सोख नहीं पाती, जिससे पानी बहकर बर्बाद हो जाता है और मिट्टी का कटाव होता है।
  • बढ़ता तापमान: ग्लोबल वार्मिंग के कारण तापमान में लगातार वृद्धि हो रही है, जिससे वाष्पीकरण (Evaporation) की दर बढ़ गई है और उपलब्ध पानी तेजी से सूख रहा है।

क्या यमन सच में बनने वाला है 'बिना पानी का पहला देश'?

वैज्ञानिकों और हाइड्रोलॉजिस्ट्स की रिपोर्ट्स के मुताबिक, राजधानी सना आने वाले कुछ ही वर्षों में भू-जल से पूरी तरह महरूम होने वाली दुनिया की पहली बड़ी राजधानी बन सकती है। जब पानी का स्तर इतनी गहराई तक चला जाता है कि वहां से बोरवेल खोदना भी असंभव हो जाता है, तो उस स्थिति को 'डे जीरो' (Day Zero) कहा जाता है। यमन इस भयानक भविष्य के बेहद करीब पहुंच चुका है।

पानी की इस भारी किल्लत ने देश की स्वास्थ्य व्यवस्था को भी तबाह कर दिया है। साफ पानी न मिलने के कारण हैजा और अन्य जलजनित बीमारियां अक्सर महामारी का रूप ले लेती हैं। बच्चों और बुजुर्गों के लिए यह स्थिति जानलेवा साबित हो रही है। अस्पतालों में पानी की कमी के कारण इलाज प्रभावित हो रहा है, जो इस संकट के मानवीय पहलू को और भी अधिक दर्दनाक बनाता है.

संघर्ष और राजनीतिक अस्थिरता ने बढ़ाई मुश्किलें

यमन में पिछले एक दशक से चल रहे गृहयुद्ध और राजनीतिक संघर्ष ने इस संकट के समाधान की हर उम्मीद पर पानी फेर दिया है। युद्ध के कारण जल अवसंरचना (Water Infrastructure) बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो चुकी है। न तो नए जल शोधन संयंत्र (Water Treatment Plants) लगाए जा रहे हैं और न ही पुरानी पाइपलाइनों की मरम्मत हो पा रही है। अंतर्राष्ट्रीय मानवीय संगठनों के लिए भी युद्धग्रस्त इलाकों तक पानी और राहत सामग्री पहुंचाना एक लोहे के चने चबाने जैसा काम है।

जब तक देश में राजनीतिक स्थिरता नहीं आती और एक स्थायी शांति समझौता नहीं होता, तब तक राष्ट्रीय स्तर पर किसी भी बड़ी जल संरक्षण परियोजना को लागू करना असंभव सा लगता है।

आगे का रास्ता: क्या अभी भी कोई उम्मीद बची है?

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यमन को पूरी तरह से वीरान होने से बचाना है, तो तत्काल और कड़े कदम उठाने होंगे। इसमें सबसे पहले कात की खेती को सीमित करना और सिंचाई के आधुनिक तरीकों (जैसे ड्रिप इरिगेशन) को अपनाना शामिल है। इसके अलावा, समुद्र के खारे पानी को मीठा बनाने वाले संयंत्रों (Desalination Plants) का निर्माण करना होगा, हालांकि युद्ध की स्थिति में यह भी एक बड़ी चुनौती है।

यमन का जल संकट सिर्फ एक देश की समस्या नहीं है, बल्कि यह पूरी मानवता के लिए एक चेतावनी है कि अगर हमने पानी के अनियंत्रित दोहन और जलवायु परिवर्तन को गंभीरता से नहीं लिया, तो आने वाले समय में दुनिया के कई अन्य हिस्से भी इसी दर्दनाक रास्ते पर चल पड़ेंगे।

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ममता पाठक

ममता पाठक

Chief Editor (विदेश खबरें)

ममता पाठक न्यूज़रूम की संपादकीय दिशा तय करने वाली प्रमुख स्तंभ हैं। अंतरराष्ट्रीय खबरों की गहरी समझ और वर्षों के अनुभव के साथ, वे कंटेंट की गुणवत्त...

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