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350 करोड़ के बायोगैस प्रोजेक्ट पर घमासान, विपक्ष ने लगाए गंभीर आरोप

350 करोड़ के बायोगैस प्रोजेक्ट पर घमासान, विपक्ष ने लगाए गंभीर आरोप

शहर के कचरे से ऊर्जा बनाने की महत्वाकांक्षी योजना जनता के पैसों की बर्बादी का जरिया बन रही है? महाराष्ट्र के पुणे जिले से एक ऐसा ही बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। पिंपरी-चिंचवड़ महानगर पालिका (PCMC) के मोशी कचरा डिपो में प्रस्तावित करीब 350 करोड़ रुपये की लागत वाले बायोगैस प्रोजेक्ट पर सियासत गरमा गई है। इस प्रोजेक्ट को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष आमने-सामने आ गए हैं, और फिलहाल बढ़ते विरोध के चलते प्रशासन को अपना प्रस्ताव वापस लेना पड़ा है।

आइए जानते हैं कि आखिर इस पूरे प्रोजेक्ट को लेकर इतना हंगामा क्यों मचा है और विपक्ष के क्या बड़े आरोप हैं।

अंतिम समय पर लाया गया प्रस्ताव और भारी विरोध

यह पूरा विवाद तब शुरू हुआ जब स्थायी समिति की बैठक में अंतिम समय पर मोशी कचरा डिपो में बायोगैस प्लांट लगाने से जुड़ा प्रस्ताव टेबल किया गया। इस प्रस्ताव के आते ही राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद पवार गुट) और शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के पार्षदों ने इसका कड़ा विरोध किया।

विपक्षी नेताओं का साफ तौर पर कहना है कि इतने बड़े वित्तीय निहितार्थ वाले प्रस्ताव को बिना किसी व्यापक चर्चा के चुपचाप पास कराने की कोशिश की जा रही थी। भारी हंगामे और तीखे सवालों के बाद फिलहाल प्रशासन को कदम पीछे खींचने पड़े हैं।

विपक्ष के मुख्य आरोप: फिजूलखर्ची और ठेकेदार को फायदा

शिवसेना की नगरसेविका सुलभा उबाले, नगरसेवक संदीप वाघेरे और विकास साने ने महानगर पालिका प्रशासन और सत्ताधारी दल पर तीखा हमला बोला है। उनके मुताबिक, इस परियोजना के तहत जो वित्तीय आंकड़े सामने आए हैं, वे बेहद चौंकाने वाले हैं:

  • भारी-भरकम भुगतान: प्रोजेक्ट के तहत प्रतिदिन 375 टन गीले कचरे को प्रोसेस करने के लिए ठेकेदार को 3,661 रुपये प्रति टन की दर से भुगतान किया जाना प्रस्तावित था।
  • सालाना और 15 साल का खर्च: इस हिसाब से महानगर पालिका की तिजोरी से सालाना करीब 23 करोड़ रुपये और 15 वर्षों में कुल लगभग 344 करोड़ रुपये ठेकेदार को दिए जाते।
  • मुफ्त या कम लागत के विकल्प: विपक्षी नेताओं का तर्क है कि देश के अन्य शहरों में ऐसी परियोजनाएं या तो बहुत कम लागत में चल रही हैं या कंपनियां बिना किसी शुल्क के इसे संचालित करने को तैयार हैं। ऐसे में पीसीएमसी पर इतना बड़ा आर्थिक बोझ क्यों डाला जा रहा है?

पुराने हादसों से नहीं लिया गया सबक?

विपक्ष ने मोशी कचरा डिपो के इतिहास का हवाला देते हुए सुरक्षा पर भी सवाल उठाए हैं। नगरसेवकों ने याद दिलाया कि इसी डिपो में पहले एक बड़ा वेस्ट-टू-एनर्जी प्रोजेक्ट हादसा हुआ था, जिसमें नौ लोगों की जान चली गई थी। उस दौरान नियमों की घोर अनदेखी सामने आई थी और अधिकारियों पर कार्रवाई भी हुई थी। विपक्ष का सवाल है कि उसी खतरनाक जगह पर एक और भारी-भरकम प्रोजेक्ट शुरू करने की जल्दबाजी क्यों दिखाई जा रही है?

इंदौर मॉडल का दिया जा रहा है हवाला

नगरसेवक संदीप वाघेरे ने मध्य प्रदेश के इंदौर शहर का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां कचरे से ईंधन तैयार करने की शानदार परियोजनाएं चल रही हैं, जिनका उपयोग सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था को चलाने में भी हो रहा है। उन्होंने दावा किया कि कई प्रतिष्ठित कंपनियां केवल जमीन और जरूरी बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने की शर्त पर मुफ्त या बेहद कम लागत में यह काम करने को तैयार हैं। इसके बावजूद, एक ही ठेकेदार को करोड़ों रुपये का फायदा पहुंचाने वाला टेंडर देना भ्रष्टाचार की बू देता है।

प्रोजेक्ट की मुख्य विशेषताएं और उद्देश्य

दूसरी ओर, महानगर पालिका प्रशासन का इस प्रोजेक्ट को लेकर अपना तर्क था। मनपा के अनुसार इस योजना के मुख्य बिंदु निम्नलिखित थे:

  • दैनिक क्षमता: प्रतिदिन 375 टन होटल और घरेलू गीले कचरे का वैज्ञानिक प्रसंस्करण।
  • उत्पादन: कचरे से बायोगैस और बायो-सीएनजी का निर्माण।
  • ईंधन का उपयोग: उत्पादित गैस का इस्तेमाल महानगर पालिका के कचरा परिवहन वाहनों में ही किया जाना था।
  • लक्ष्य: मोशी डिपो पर कचरे का लगातार बढ़ रहा दबाव कम करना और 'शून्य कचरा' (Zero Waste) के लक्ष्य को हासिल करना।

आगे की चेतावनी: कोर्ट और सड़क पर आंदोलन

विपक्ष ने साफ कर दिया है कि यदि सत्ता पक्ष ने अपने बहुमत के जोर पर इस प्रस्ताव को दोबारा जिंदा करने की कोशिश की, तो वे चुप नहीं बैठेंगे। पार्षदों ने चेतावनी दी है कि इसके खिलाफ जोरदार आंदोलन किया जाएगा, जरूरत पड़ने पर मामला मुख्यमंत्री के संज्ञान में लाया जाएगा और अंतिम विकल्प के तौर पर अदालत का दरवाजा भी खटखटाया जाएगा।

फिलहाल यह देखना दिलचस्प होगा कि महानगर पालिका प्रशासन इस राजनीतिक विरोध के बीच कचरा प्रबंधन के इस प्रस्ताव में क्या संशोधन करता है या इसे पूरी तरह से रद्द किया जाता है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

Q1: मोशी कचरा डिपो बायोगैस प्रोजेक्ट का कुल बजट कितना था?

उत्तर: इस प्रोजेक्ट की कुल लागत लगभग 350 करोड़ रुपये आंकी गई थी, जिसमें 15 वर्षों के दौरान ठेकेदार को कचरा प्रोसेसिंग के एवज में भुगतान किया जाना था।

Q2: विपक्ष इस प्रोजेक्ट का विरोध क्यों कर रहा है?

उत्तर: विपक्ष का आरोप है कि इसमें ठेकेदार को प्रति टन के हिसाब से बहुत ज्यादा (3,661 रुपये प्रति टन) भुगतान किया जा रहा है, जबकि अन्य शहरों में ऐसी कंपनियां कम लागत या मुफ्त में भी काम करने को तैयार हैं। इसे फिजूलखर्ची बताया जा रहा है।

Q3: इस प्रोजेक्ट का मुख्य उद्देश्य क्या था?

उत्तर: इस प्रोजेक्ट का उद्देश्य मोशी डिपो के गीले कचरे से बायो-सीएनजी तैयार करना और शहर में 'शून्य कचरा' प्रबंधन की व्यवस्था को लागू करना था।

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गुंजा पांडेय

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Chief Sub Editor

गुंजा पांडेय तेज़ी से बदलती खबरों की दुनिया में अपनी पकड़ के लिए जानी जाती हैं। वे खेल और विज्ञान जैसे विषयों को न सिर्फ अपडेटेड रखती हैं, बल्कि उन...

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