उत्तर प्रदेश की सियासत में एक बार फिर से तापमान अपने चरम पर है। राज्य में होने वाले आगामी राज्यसभा चुनावों को लेकर सरगर्मी तेज थी कि, इसी बीच समाजवादी पार्टी (सपा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव के एक छोटे से सोशल मीडिया पोस्ट ने भूचाल ला दिया है। राजनीतिक गलियारों में इस बात की चर्चा जोरों पर है कि अखिलेश यादव ने एक तीर से कई निशाने साधने की कोशिश की है। उनके इस नए पैंतरे ने विरोधी दलों को भी सोचने पर मजबूर कर दिया है।
अखिलेश यादव का वह बयान, जिसने बदल दिया सियासी समीकरण
मंगलवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर अखिलेश यादव ने बेहद सधा हुआ लेकिन गहरा संदेश साझा किया। उन्होंने लिखा, 'अब हमारी निगाह तीन पर नहीं, चार सौ तीन पर है।' इस एक लाइन के बयान ने उत्तर प्रदेश के राजनीतिक पंडितों को नए सिरे से समीकरण बैठाने पर मजबूर कर दिया है। जानकारों का मानना है कि इस संदेश के गहरे निहितार्थ हैं, जो सीधे तौर पर साल 2026 की मौजूदा सियासी उठापटक से लेकर आने वाले विधानसभा चुनावों की बिछी बिसात की ओर इशारा कर रहे हैं।
राज्य में कुल 10 राज्यसभा सीटों के लिए चुनाव होने हैं। समाजवादी पार्टी ने पहले ही अपने दो उम्मीदवार- धनराज लखवानी और प्रोफेसर रामगोपाल यादव को चुनावी मैदान में उतार दिया है। गणित के हिसाब से इन दोनों उम्मीदवारों की जीत लगभग तय मानी जा रही है। ऐसे में कयास लगाए जा रहे थे कि क्या सपा तीसरी सीट के लिए भी अपना कोई उम्मीदवार उतारेगी या नहीं। अखिलेश यादव के इस ताज़ा बयान के बाद अब यह लगभग साफ होता नजर आ रहा है कि पार्टी तीसरी सीट के जोखिम भरे खेल से दूरी बना सकती है।
क्या कहती है विधानसभा की मौजूदा गणित?
उत्तर प्रदेश विधानसभा में मौजूदा प्रभावी संख्या बल पर गौर करें, तो एक राज्यसभा सीट जीतने के लिए कम से कम 37 प्रथम वरीयता के वोटों की आवश्यकता होती है। समाजवादी पार्टी के पास अपने विधायकों के साथ-साथ कांग्रेस के संभावित समर्थन को जोड़ने के बाद दो सीटों के लिए पर्याप्त से ज्यादा संख्या बल मौजूद है।
- सपा के अपने विधायकों और सहयोगियों का समर्थन दो सीटों (लगभग 74 वोट) के लिए सुरक्षित है।
- यदि पार्टी तीसरे उम्मीदवार को उतारती, तो कुल 111 वोटों की दरकार होती।
- दो सीटें जीतने के बाद बचे हुए सीमित वोटों के साथ तीसरी सीट के लिए करीब 12 अतिरिक्त विधायकों का समर्थन जुटाना पड़ता, जो मौजूदा माहौल में बेहद कठिन चुनौती था।
- पिछले चुनावों में हुई क्रॉस वोटिंग के कड़वे अनुभवों को देखते हुए सपा नेतृत्व इस बार कोई भी जोखिम मोल लेने के मूड में नहीं दिखाई दे रहा है।
भाजपा खेमे की स्थिति और जोड़-तोड़ की सियासत
दूसरी तरफ, सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के खेमे की स्थिति को देखें तो उनके पास संख्या बल का भारी बहुमत है। भाजपा के अपने 255 विधायक हैं। इसके अलावा एनडीए गठबंधन के अन्य दलों जैसे अपना दल (सोनेलाल) के 13, राष्ट्रीय लोक दल (रालोद) के 9, सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) के 6 और निषाद पार्टी के 5 विधायक उनके साथ हैं।
इसके अतिरिक्त, कुछ निर्दलीय और अन्य छोटे दलों के विधायकों का समर्थन भी यदि जोड़ लिया जाए, तो यह आंकड़ा लगभग 293 तक पहुंच जाता है। जबकि, भाजपा को अपने कोटे की संभावित सीटों को सुरक्षित रखने के लिए कड़े गणितीय प्रबंधन की जरूरत है। इसी मजबूत घेराबंदी को भांपते हुए अखिलेश यादव ने राज्यसभा की तीसरी सीट पर ऊर्जा और संसाधन खर्च करने के बजाय सीधे विधानसभा की सभी 403 सीटों पर अपनी पूरी ऊर्जा केंद्रित करने का रणनीतिक संदेश दिया है।
सुभासपा अध्यक्ष ओम प्रकाश राजभर का तीखा तंज
राजनीतिक बयानबाजी का दौर भला बिना तीखी प्रतिक्रियाओं के कैसे पूरा हो सकता है। अखिलेश यादव के इस '403 वाले फॉर्मूले' पर उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री और सुभासपा प्रमुख ओम प्रकाश राजभर ने फौरन पलटवार किया। राजभर ने सोशल मीडिया पर अपनी चिर-परिचित शैली में लिखा, 'मित्र अखिलेश जी, बस हो गया टांय टांय फिस्स! वैसे कभी-कभी ही सही, आप कुछ समझदारी का काम भी कर ही लेते हैं। जैसे आज किया। रही बात 403 की तो बस यही कहूंगा कि सपने देखना बुरी बात नहीं है।'
राजभर के इस बयान के बाद दोनों दलों के समर्थकों के बीच सोशल मीडिया पर बहस छिड़ गई है। हालांकि, राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राजभर भले ही इस बयान पर कटाक्ष कर रहे हों, लेकिन अंदरखाने विरोधी खेमे में इस बात की सुगबुगाहट जरूर है कि सपा प्रमुख ने बिना चुनाव लड़े ही एक बड़ा वैचारिक एजेंडा सेट कर दिया है।
संगठन को पूरी तरह चुनावी मोड में लाने की तैयारी
अखिलेश यादव के इस कदम को जमीनी स्तर पर संगठन को सक्रिय करने की बड़ी रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है। राज्यसभा के अंकों के गणित में फंसकर अपनी ऊर्जा बिखेरने के बजाय, सपा अब सीधे तौर पर जनता के बीच और बूथ स्तर की तैयारियों पर फोकस करना चाहती है। पार्टी के रणनीतिकारों का मानना है कि उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में लंबी अवधि की लड़ाई के लिए लोकसभा और विधानसभा के समीकरणों को साधना ज्यादा फायदेमंद साबित होता है।
आने वाले दिनों में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि क्या सपा सचमुच तीसरे उम्मीदवार के मैदान में उतरने की अटकलों पर पूरी तरह पूर्ण विराम लगाती है या फिर नामांकन के आखिरी वक्त पर कोई नया राजनीतिक सरप्राइज सामने आता है। फिलहाल, 'तीन से चार सौ तीन' का यह नया राजनीतिक नारा उत्तर प्रदेश के सियासी गलियारों में गूंज रहा है और हर दल अपने-अपने हिसाब से इसके नफा-नुकसान का आकलन करने में जुट गया है।