महाराष्ट्र का वर्धा जिला इस समय गंभीर प्राकृतिक चुनौती का सामना कर रहा है। मानसून सीजन के दौरान इस क्षेत्र में बादलों ने वह मेहरबानी नहीं दिखाई, जिसकी उम्मीद किसानों और आम नागरिकों को थी। नतीजतन, इस साल वर्धा में सामान्य से 36.92 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गई है। बारिश के इस भारी आंकड़े के नीचे गिरने से पूरे इलाके में जलसंकट की आशंका के बादल मंडराने लगे हैं। खेतों में लहलहाती फसलें पानी के अभाव में समय से पहले ही मुरझाने की कगार पर पहुंच चुकी हैं, जिससे अन्नदाताओं की रातों की नींद उड़ गई है।
सामान्य से कोसों दूर रही मानसूनी बारिश
मौसम विभाग और स्थानीय प्रशासन से प्राप्त आंकड़ों के मुताबिक, वर्धा जिले में जून से सितंबर के बीच अमूमन 874.05 मिलीमीटर औसत बारिश होती है। लेकिन इस बार मानसून की बेरुखी ने सारे समीकरण बिगाड़ दिए। इस सीजन में अब तक बमुश्किल 558.03 मिलीमीटर बारिश ही रिकॉर्ड हो पाई है। यानी साफ है कि औसत की तुलना में लगभग 37 फीसदी पानी कम बरसा है। अक्टूबर के महीने में भी बारिश के हालिया मिजाज को देखकर स्थिति बहुत ज्यादा स्पष्ट या राहत देने वाली नहीं कही जा सकती।
जिले की भौगोलिक स्थिति की बात करें तो यहां कुल 11 बड़े और मध्यम आकार के जलाशय मौजूद हैं। इन सभी की कुल जलसंग्रहण क्षमता 611.044 दलघमी (दस लाख घन मीटर) है। लेकिन कम बारिश होने के कारण ये जलाशय अपनी पूरी क्षमता तक भर नहीं पाए हैं। वर्तमान स्थिति यह है कि इन सभी जलाशयों को मिलाकर कुल 421.668 दलघमी उपयोगी जलसाठा ही उपलब्ध बचा है, जो आने वाले महीनों की जरूरतों को देखते हुए काफी चिंताजनक माना जा रहा है।
फसलों को बचाने के लिए आगे आया प्रशासन
बारिश के दिनों में लंबे अंतराल (Dry Spells) और अपर्याप्त पानी के कारण खेतों में खड़ी फसलें बुरी तरह प्रभावित होने लगी थीं। खेतों में नमी सूखने से किसान काफी तनाव में थे। किसानों के इसी दर्द और उनकी लगातार उठ रही मांग को गंभीरता से लेते हुए, जिला प्रशासन ने सिंचाई विभाग के साथ मिलकर एक अहम कदम उठाया है। जिले के चार प्रमुख बड़े एवं मध्यम जलाशयों से पानी छोड़ने का फैसला लिया गया, ताकि संकट के इस दौर में किसानों को कुछ राहत पहुंचाई जा सके।
1. निम्न वर्धा प्रकल्प (आर्वी तहसील)
आर्वी तहसील में स्थित महत्वपूर्ण 'निम्न वर्धा प्रकल्प' से नहरों के माध्यम से गत 4 अक्टूबर से सिंचाई के लिए पानी छोड़ा जाना शुरू कर दिया गया है। जल संसाधन विभाग की योजना के मुताबिक, इस पहले चरण में लगभग 7 दलघमी पानी छोड़े जाने का लक्ष्य तय किया गया है। इस पानी के मिलने से लगभग 14,000 हेक्टेयर कृषि क्षेत्र को सीधा सिंचाई का लाभ पहुंचेगा, जिससे मुरझाती फसलों को जीवनदान मिलने की उम्मीद बंध गई है।
2. बोर प्रकल्प (सेलू तहसील)
सेलू तहसील के अंतर्गत आने वाले 'बोर प्रकल्प' से भी 2 अक्टूबर से नहरों के जरिए पानी की आपूर्ति शुरू कर दी गई है। आने वाले कुछ और दिनों तक यहां से पानी छोड़े जाने की योजना है। इस चरण में लगभग 1 दलघमी पानी छोड़ा जा रहा है, जिससे करीब 13,000 हेक्टेयर क्षेत्र की फसलों को फायदा होगा और किसानों को बड़ी राहत मिलेगी।
3. वर्धा-कार नदी प्रकल्प (कारंजा तहसील)
कारंजा तहसील के वर्धा-कार नदी प्रकल्प से भी 2 अक्टूबर से सिंचाई कार्यों के लिए पानी छोड़ा जा रहा है। आगामी कुछ दिनों तक यह प्रक्रिया निरंतर जारी रहेगी। इस चरण के तहत लगभग 3.5 दलघमी पानी उपलब्ध कराया जा रहा है, जिससे इस सिंचाई क्षेत्र के दायरे में आने वाले किसानों की चिंताएं कुछ हद तक कम हुई हैं।
'धाम प्रकल्प' से बुझेगी वर्धा शहर और 14 गांवों की प्यास
सिंचाई के साथ-साथ इंसानों और मवेशियों की प्यास बुझाना भी इस समय प्रशासन के सामने एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। धाम नदी के येलाकाली और पवनार स्थित जलपात्र से पानी उठाकर वर्धा शहर को नगर पालिका प्रशासन द्वारा पानी सप्लाई किया जाता है। इसके अलावा, पिपरी मेघे समेत 14 गांवों को महाराष्ट्र जीवन प्राधिकरण पेयजल उपलब्ध कराता है।
वर्धा जिला मुख्यालय, आसपास के 14 गांवों और धाम नदी के किनारे बसे लगभग 10 गांवों की गंभीर पेयजल जरूरतों को ध्यान में रखते हुए, महाकाली स्थित 'धाम प्रकल्प' से 3 अक्टूबर से विशेष रूप से पेयजल के लिए पानी छोड़ा गया है। हालांकि, प्रशासन ने साफ निर्देश दिए हैं कि महाकाली स्थित धाम परियोजना से छोड़े जाने वाले इस पानी का उपयोग केवल और केवल पेयजल (Drinking Purpose) के लिए ही किया जाना चाहिए, ताकि आने वाले दिनों में पीने के पानी का गंभीर संकट पैदा न हो।
भविष्य की चुनौतियां और एहतियाती कदम
विशेषज्ञों का मानना है कि वर्धा में जलस्तर का इस तरह नीचे जाना आने वाले गर्मियों के दिनों के लिए एक बड़ी चेतावनी है। हालांकि अभी जलाशयों से पानी छोड़कर तात्कालिक तौर पर फसलों और पीने के पानी की व्यवस्था कर दी गई है, लेकिन पानी के विवेकपूर्ण और संयमित उपयोग की सख्त जरूरत है। किसानों और स्थानीय नागरिकों से अपील की जा रही है कि वे पानी की एक-एक बूंद का हिसाब रखें और बर्बादी से बचें। जिला प्रशासन भी स्थिति पर लगातार पैनी नजर बनाए हुए है ताकि जरूरत पड़ने पर आगामी रणनीति तय की जा सके।