जब कब्र में सो रहे व्यक्ति के नाम जारी हो गया लर्निंग लाइसेंस
दस्तावेजों की दुनिया में कई बार ऐसे कारनामे सामने आ जाते हैं, जिन पर यकीन करना मुमकिन नहीं होता। उत्तर प्रदेश से सड़क परिवहन और लाइसेंस प्रणाली से जुड़ा एक ऐसा ही हैरान कर देने वाला मामला प्रकाश में आया है, जिसे सुनकर आम आदमी ही नहीं, बल्कि कानून के रखवाले भी अछंभे में हैं। सोचिए, एक ऐसा व्यक्ति जो इस दुनिया को अलविदा कह चुका है, उसके नाम पर लर्निंग ड्राइविंग लाइसेंस जारी कर दिया जाता है। इस गंभीर प्रशासनिक लापरवाही और संभावित फर्जीवाड़े को अब इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने बेहद गंभीरता से लिया है।
न्यायालय ने इस पूरे प्रकरण पर कड़ी नाराजगी जताते हुए केंद्र सरकार और उत्तर प्रदेश सरकार दोनों से ही जवाब तलब किया है। यह मामला सिर्फ एक प्रशासनिक चूक का नहीं है, बल्कि यह देश की डिजिटल और बायोमेट्रिक व्यवस्था की सुरक्षा पर भी एक बहुत बड़ा सवालिया निशान खड़ा करता है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच का कड़ा रुख
इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच के समक्ष जब यह मामला पहुंचा, तो अदालत भी हैरान रह गई। कोर्ट के जजों ने इसे व्यवस्था की एक गंभीर विफलता माना है। अदालत ने इस बात पर गहरी चिंता व्यक्त की है कि यदि मृत व्यक्तियों के दस्तावेजों का इस प्रकार दुरुपयोग हो सकता है, तो सड़क सुरक्षा और कानून व्यवस्था का क्या हाल होगा।
अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया है कि केंद्र और राज्य सरकार के संबंधित विभागों को यह बताना होगा कि आखिर यह भारी चूक कैसे हुई। क्या सिस्टम में तकनीकी खामी थी या फिर इसके पीछे किसी आपराधिक गिरोह का हाथ है, जो मृत लोगों के दस्तावेजों के सहारे फर्जीवाड़ा कर रहा है।
आधार कार्ड और डिजिटल वेरिफिकेशन पर खड़े हुए बड़े सवाल
आज के दौर में हर सरकारी काम के लिए आधार कार्ड को अनिवार्य कर दिया गया है। सरकारें यह दावा करती हैं कि आधार और बायोमेट्रिक आधारित सिस्टम के बाद फर्जीवाड़े की गुंजाइश लगभग खत्म हो चुकी है। लेकिन मृत व्यक्ति के नाम पर लर्निंग लाइसेंस बन जाना इन सभी दावों की पोल खोलता नजर आ रहा है।
इस फर्जीवाड़े से जुड़े मुख्य बिंदु:
- मृत्यु के बाद आवेदन: व्यक्ति की मृत्यु हो चुकी थी, लेकिन उसके दस्तावेजों का इस्तेमाल करके ऑनलाइन सिस्टम में लर्निंग लाइसेंस के लिए आवेदन किया गया।
- सत्यापन प्रक्रिया की खामी: परिवहन विभाग के ऑनलाइन पोर्टल और क्षेत्रीय कार्यालय स्तर पर होने वाले वेरिफिकेशन में इस बात का पता क्यों नहीं चल पाया कि आवेदक जीवित नहीं है?
- आधार लिंकिंग की विफलता: यदि आधार डेटाबेस से चीजें जुड़ी हुई हैं, तो क्या मृत्यु पंजीकरण (Death Registration) और लाइसेंस जारी करने वाले विभागों के बीच कोई तालमेल नहीं है?
कैसे पकड़ में आया यह पूरा मामला?
सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, यह मामला तब उजागर हुआ जब परिवार के किसी सदस्य ने दस्तावेजों की जांच की या फिर सिस्टम में डेटा मिलान के दौरान विसंगतियां पाई गईं। जब मामले की गहराई से पड़ताल की गई, तो पता चला कि जिस व्यक्ति के नाम पर लाइसेंस जारी हुआ है, वह कई महीने या साल पहले ही इस दुनिया से जा चुका था।
इसके बाद यह मामला प्रशासनिक गलियारों से होता हुआ सीधे अदालत की दहलीज तक जा पहुंचा। याचिकाकर्ता ने कोर्ट को बताया कि इस तरह की लापरवाही न केवल कानून का मज़ाक उड़ाती है, बल्कि सड़क पर बेकसूर लोगों की जान के लिए भी बड़ा खतरा बन सकती है, क्योंकि ऐसे लाइसेंसों पर बिना किसी स्किल टेस्ट के लोग गाड़ियां चलाने लगते हैं।
सरकार और परिवहन विभाग की बढ़ी मुश्किलें
हाईकोर्ट के इस सख्त आदेश के बाद अब उत्तर प्रदेश के परिवहन विभाग और केंद्र सरकार के संबंधित मंत्रालयों में हड़कंप मच गया है। अधिकारियों को अब अदालत में इसका जवाब देना होगा कि इस तरह की घटना की पुनरावृत्ति को रोकने के लिए उनके पास क्या ठोस तंत्र मौजूद है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस मामले की जांच यदि सीबीआई या किसी उच्च स्तरीय एजेंसी से कराई जाए, तो कई और चौंकाने वाले खुलासे हो सकते हैं। हो सकता है कि यह सिर्फ एक इकलौता मामला न हो, बल्कि इसके पीछे एक बड़ा सिंडिकेट काम कर रहा हो जो मृत लोगों के नाम पर दस्तावेज तैयार करके उनका अवैध इस्तेमाल करता हो।
आम जनता की सुरक्षा पर मंडराता खतरा
सड़क पर वाहन चलाना एक जिम्मेदारी भरा काम है। इसके लिए लर्निंग लाइसेंस से लेकर पक्के ड्राइविंग लाइसेंस तक की एक लंबी और पारदर्शी प्रक्रिया तय की गई है। लेकिन अगर इस प्रक्रिया में इस तरह की सेंधमारी होने लगे, तो सड़कों पर अयोग्य और फर्जी लोग बेखौफ वाहन लेकर दौड़ेंगे। इससे सड़क दुर्घटनाओं में इजाफा होना लाजिमी है।
आम जनता के बीच भी इस बात को लेकर भारी रोष और चिंता है कि जब मृत व्यक्तियों के आधार और दस्तावेजों का ऐसा दुरुपयोग हो सकता है, तो जीवित लोगों की डेटा सुरक्षा कितनी सुरक्षित होगी।
आगे क्या हो सकता है?
आगामी सुनवाई में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि सरकारें अदालत के सामने क्या सफाई पेश करती हैं। कोर्ट के इस रुख से साफ है कि इस मामले में किसी भी दोषी को बख्शा नहीं जाएगा। साथ ही, यह उम्मीद भी की जा रही है कि अदालत ड्राइविंग लाइसेंस बनवाने की पूरी प्रक्रिया को और अधिक पारदर्शी और सुरक्षित बनाने के लिए कुछ कड़े निर्देश जारी कर सकती है।
यह घटना पूरे देश के परिवहन विभागों के लिए एक बड़ी चेतावनी है कि वे अपने डिजिटल सिस्टम को और अधिक फूल-प्रूफ (Foolproof) बनाएं, ताकि कोई भी असामाजिक तत्व सरकारी तंत्र की आंखों में धूल झोंककर इस तरह के अवैध कारनामों को अंजाम न दे सके।