दक्षिण-पश्चिम मानसून के इस सीजन के 100 दिन पूरे हो चुके हैं। इन तीन महीनों से ज्यादा के सफर में देश के अधिकांश हिस्सों में बादलों का मिजाज काफी उतार-चढ़ाव भरा रहा है। मौसम विभाग और कृषि क्षेत्र के आंकड़ों पर नजर डालें तो इस बार मानसून ने देशवासियों को उम्मीद से कम ही राहत दी है। पूरे 100 दिनों के लंबे दौर में महज 26 दिन ऐसे रहे जब बारिश का आंकड़ा सामान्य से अधिक दर्ज किया गया। यानी एक बड़े हिस्से में लोग अच्छी बारिश के लिए तरसते नजर आए।
जुलाई को छोड़ बाकी महीनों में गहराया सूखापन
इस साल के मानसून सीजन का विश्लेषण किया जाए तो साफ पता चलता है कि केवल जुलाई का महीना ही ऐसा था जब बादलों ने खुलकर मेहरबानी दिखाई। जुलाई को छोड़कर जून, अगस्त और सितंबर के शुरुआती हफ्तों में बारिश का पैटर्न काफी कमजोर रहा। जून के महीने में जहां मानसून की शुरुआत सुस्त रही, वहीं अगस्त के महीने में कई बड़े राज्यों में बारिश का बड़ा सूखा देखने को मिला। किसानों के चेहरों पर जो मुस्कान जुलाई की झमाझम बारिश से आई थी, वह अगले ही महीने मायूसियों में बदल गई।
मौसम विशेषज्ञों का कहना है कि मानसून की सक्रियता में इस तरह के बड़े गैप (अंतराल) आना कृषि व्यवस्था के लिए चिंता का विषय है। लगातार बारिश न होने से फसलों को बचाने के लिए किसानों को सिंचाई के वैकल्पिक साधनों पर भारी-भरकम खर्च करना पड़ा है, जिससे उनकी लागत बढ़ गई है।
सिर्फ 26 दिन क्यों हुई सामान्य से अधिक बारिश?
मानसून तंत्र के कमजोर पड़ने और लगातार सक्रिय मौसमी प्रणालियों (Weather Systems) के बंगाल की खाड़ी या अरब सागर में ठीक से न बन पाने के कारण बारिश के दिनों में भारी कमी आई। 100 दिनों के कुल सफर में केवल 26 दिन ऐसे आए जब बादलों ने देश के बड़े भौगोलिक हिस्से को तरबतर किया। बाकी के दिनों में या तो हल्की छिटपुट बौछारें पड़ीं या फिर आसमान पूरी तरह साफ और शुष्क बना रहा।
कृषि और जल संसाधनों पर प्रभाव
कम बारिश के इन 100 दिनों का सीधा असर देश के जल स्त्रोतों और जलाशयों (Reservoirs) पर भी पड़ा है। कई बड़े बांधों में पानी का स्तर पिछले साल की तुलना में कम दर्ज किया गया है। आने वाले सर्दियों और गर्मियों के महीनों में पेयजल संकट न खड़ा हो, इसके लिए जल प्रबंधन से जुड़े विभागों को अभी से सतर्क होना पड़ रहा है।
- धान और खरीफ की फसलें: जिन इलाकों में सिंचाई के साधन नहीं हैं, वहां धान की रोपाई पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है।
- भूजल स्तर: मानसून की अनिश्चितता के कारण भूजल स्तर में अपेक्षित सुधार नहीं हो पाया है।
- महंगाई का जोखिम: कृषि उत्पादन प्रभावित होने से आने वाले दिनों में सब्जियों और अनाजों की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है।
आगे कैसा रहेगा मौसम का मिजाज?
चूंकि मानसून अब अपने अंतिम चरणों की ओर बढ़ रहा है, ऐसे में विदाई से पहले कुछेक राज्यों में हल्की से मध्यम बौछारें पड़ने की संभावना जरूर जताई जा रही है, लेकिन इससे समग्र आंकड़ों में बहुत बड़ा बदलाव आने की उम्मीद कम ही है। मौसम विभाग लगातार इस पूरे घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए है ताकि सर्दियों के सीजन के लिए सही आकलन किया जा सके।
आम जनता और किसानों के लिए यह मानसून सीजन एक बड़ा सबक छोड़ गया है कि जलवायु परिवर्तन और बदलते वैश्विक मौसमी चक्रों के बीच जल संरक्षण और सिंचाई के आधुनिक तरीकों को अपनाना अब समय की सबसे बड़ी जरूरत बन चुका है।