अपराध की दुनिया में लालच की कोई सीमा नहीं होती और जब बात करोड़ों के सट्टा बाजार की हो, तो अपनों को भी धोखा देने में शातिर अपराधी पीछे नहीं हटते। छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले के मुख्यालय अंबिकापुर से एक ऐसा ही सनसनीखेज मामला प्रकाश में आया है, जिसने हर किसी को हैरान कर दिया है। क्रिकेट सट्टेबाजी यानी बेटिंग के काले कारोबार का संचालन करने वाले कुख्यात आरोपी दीप सिन्हा ने अपनी हरकतों से यह साबित कर दिया है कि वह अपराध की दुनिया में किस हद तक गिर सकता है। उसने अपने ही सुपरवाइजर को अपने शातिर जाल में फंसा लिया और उसके नाम पर बैंक खाते खुलवाकर अवैध रकम का ट्रांजैक्शन करने लगा।
क्रिकेट बेटिंग का नापाक जाल और दीप सिन्हा का साम्राज्य
पिछले कुछ महीनों से अंबिकापुर और आसपास के इलाकों में अवैध क्रिकेट सट्टेबाजी के खिलाफ पुलिस प्रशासन का शिकंजा लगातार कसता जा रहा है। इसी कड़ी में जब पुलिस ने अंतरराज्यीय और स्थानीय सट्टा किंगपिन की कुंडली खंगालनी शुरू की, तो एक के बाद एक चौंकाने वाले खुलासे सामने आए। मुख्य आरोपी दीप सिन्हा इस पूरे नेटवर्क का मास्टरमाइंड बताया जा रहा है, जो आईपीएल और अन्य अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट मैचों के दौरान ऑनलाइन और ऑफलाइन माध्यमों से लाखों-करोड़ों रुपए का दांव लगवाता था।
पुलिस जांच में यह बात खुलकर सामने आई है कि दीप सिन्हा ने पुलिस और आयकर विभाग की नजरों से बचने के लिए बेहद शातिर तरीका अपनाया था। वह सीधे तौर पर अपने नाम पर बैंक खाते इस्तेमाल करने से बचता था ताकि वित्तीय लेन-देन सीधा उसके खाते में न आए और वह आसानी से कानून की पकड़ से बाहर रह सके। इसके लिए उसने अपने ही करीबियों और मातहत काम करने वाले कर्मचारियों को निशाना बनाया।
सुपरवाइजर को बनाया मोहरा: कैसे खुला राज?
इस पूरे मामले का सबसे दिलचस्प और हैरान करने वाला पहलू यह है कि दीप सिन्हा ने अपने अंडर काम करने वाले सुपरवाइजर को ही अपनी काली कमाई का ठिकाना बना डाला। सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक, आरोपी ने सुपरवाइजर का विश्वास जीतकर विभिन्न बैंकों में उसके नाम से कई नए खाते खुलवाए। सुपरवाइजर को यह झांसा दिया गया था कि यह कंपनी या बिजनेस के लेन-देन के लिए जरूरी है, लेकिन असलियत कुछ और ही थी।
इन बैंक खातों का इस्तेमाल क्रिकेट बेटिंग के जरिए आने वाले और बाहर जाने वाले लाखों रुपयों के फेरबदल के लिए किया जाने लगा। जब पुलिस ने इन खातों की वित्तीय पड़ताल की, तो पता चला कि पिछले कुछ महीनों में इन खातों के जरिए भारी-भरकम राशि का आदान-प्रदान हुआ है। सुपरवाइजर को इस बात की भनक तक नहीं लगने दी गई कि वह अनजाने में एक बड़े आर्थिक अपराध का हिस्सा बन चुका है। जब पुलिस ने खातों के दस्तावेजों और तकनीकी साक्ष्यों की कड़ियां जोड़ीं, तो दीप सिन्हा का यह काला चिट्ठा पूरी तरह बेनकाब हो गया।
पुलिस की कार्रवाई और आगे की जांच
अंबिकापुर पुलिस इस मामले में बेहद आक्रामक रुख अपनाए हुए है। पुलिस अधिकारियों का कहना है कि इस नेटवर्क से जुड़े अन्य लोगों की भी पहचान की जा रही है। केवल सुपरवाइजर ही नहीं, बल्कि इस रैकेट में और कौन-कौन लोग शामिल हैं, जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से दीप सिन्हा की मदद कर रहे थे, उनकी तलाश तेज कर दी गई है।
- बैंक खातों की जब्ती: पुलिस ने उन सभी संदिग्ध बैंक खातों को सीज करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है जिनका इस्तेमाल बेटिंग के लिए हो रहा था।
- मनी ट्रेल की जांच: साइबर सेल की मदद से पैसों के स्रोत और उनके अंतिम ठिकाने (मनी ट्रेल) का पता लगाया जा रहा है।
- अन्य आरोपियों की धरपकड़: दीप सिन्हा के सिंडिकेट से जुड़े स्थानीय सहयोगियों के ठिकानों पर दबिश दी जा रही है।
आम जनता और युवाओं के लिए एक बड़ी चेतावनी
यह घटना एक बार फिर समाज के सामने यह सवाल खड़ा करती है कि कैसे सट्टेबाजी का यह दलदल युवाओं और आम नागरिकों को अपनी चपेट में ले रहा है। चंद रुपयों के लालच या धोखे में आकर लोग इस तरह के अवैध धंधों में फंस जाते हैं और बाद में उन्हें जेल की हवा खानी पड़ती है। पुलिस प्रशासन लगातार यह अपील कर रहा है कि नागरिक किसी भी अनजान व्यक्ति को अपने नाम पर बैंक खाता खुलवाने या अपने दस्तावेजों का इस्तेमाल करने की अनुमति न दें।
निष्कर्ष
अंबिकापुर में दीप सिन्हा के इस कारनामे ने साफ कर दिया है कि अपराधियों के लिए कोई भी रिश्ता पवित्र नहीं होता। वे अपने सबसे करीबी सहयोगियों को भी ढाल बनाने से गुरेज़ नहीं करते। फिलहाल, पुलिस इस मामले में और भी कई बड़े खुलासे करने की तैयारी में है। आने वाले दिनों में इस सट्टा नेटवर्क से जुड़े कुछ और बड़े नाम सामने आ सकते हैं, जिससे अंबिकापुर के अवैध कारोबारियों में हड़कंप मचा हुआ है।