भारतीय संस्कृति में अन्नदाता और खेती-किसानी का स्थान हमेशा से सर्वोपरि रहा है। आधुनिकता की दौड़ में जहां एक ओर दुनिया तेजी से बदल रही है, वहीं ग्रामीण अंचल की गहरी जड़ें आज भी हमारी प्राचीन परंपराओं को संजोए हुए हैं। मध्य प्रदेश के सारंगपुर विधानसभा क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले ग्राम पांदा में कुछ ऐसा ही अनूठा नजारा देखने को मिला, जहां धार्मिक आस्था, कृषि संस्कृति और पर्यावरण संरक्षण का एक अद्भुत संगम देखने को मिला। अवसर था श्री घरणीघर भगवान जन्मोत्सव एवं श्री बलराम कृषि महोत्सव का, जिसमें क्षेत्र के तमाम गणमान्य नागरिकों के साथ बड़ी संख्या में किसानों और ग्रामीणों ने हिस्सा लिया।
भगवान बलराम और कृषि संस्कृति का गहरा नाता
सनातन परंपरा में भगवान श्री बलराम को हल, कृषि और श्रम का देवता माना जाता है। वह धरती से जुड़े उस संघर्ष और समर्पण के प्रतीक हैं, जिसके बल पर पूरी मानवता का पेट भरता है। पांदा गांव में आयोजित इस महोत्सव का मुख्य उद्देश्य नई पीढ़ी को हमारी समृद्ध कृषि संस्कृति से परिचित कराना और अन्नदाता के श्रम का सम्मान करना था। कार्यक्रम के दौरान वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि खेत, जल, मिट्टी और प्रकृति के संरक्षण के बिना एक मजबूत और समृद्ध कृषि व्यवस्था की कल्पना भी नहीं की जा सकती है।
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में पहुंचे मध्य प्रदेश शासन के कौशल विकास एवं रोजगार राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) गौतम टेटवाल ने अपने संबोधन में कहा कि भगवान बलराम के जीवन और आदर्शों से हमें यह प्रेरणा मिलती है कि श्रम और धरती का सम्मान ही असली पूजा है। उन्होंने कहा कि हमारे पूर्वजों ने हमें जो कृषि संस्कृति सौंपी है, उसे बचाए रखना और आने वाली पीढ़ियों तक उसकी महत्ता पहुंचाना हम सबका दायित्व है।
भव्य चल समारोह और भक्तिमय माहौल
महोत्सव की शुरुआत एक भव्य चल समारोह के साथ हुई, जिसने पूरे गांव को उत्सव के रंग में रंग दिया। इस चल समारोह में मंत्री गौतम टेटवाल स्वयं शामिल हुए और उन्होंने विधि-विधान से भगवान श्री बलराम जी की पूजा-अर्चना की। उन्होंने क्षेत्र की सुख-समृद्धि, उत्तम बारिश और किसानों की बंपर फसल की कामना की।
चल समारोह के पश्चात मंत्री टेटवाल ग्राम पांदा के ऐतिहासिक श्री घरणीघर राधाकृष्ण मंदिर पहुंचे, जहां उन्होंने भगवान के दर्शन कर आशीर्वाद प्राप्त किया। मंदिर परिसर में गूंजते धार्मिक जयकारों और स्थानीय नागरिकों के उत्साह ने पूरे वातावरण को पूरी तरह से भक्तिमय बना दिया। ग्रामीणों का यह जोश इस बात का प्रमाण था कि ग्रामीण इलाकों में ऐसे सांस्कृतिक और धार्मिक आयोजन आपसी भाईचारे और सांस्कृतिक एकता को मजबूत करने का काम करते हैं।
'एक पेड़ माँ के नाम' अभियान के तहत पौधारोपण
इस महोत्सव की सबसे बड़ी खूबी यह रही कि इसमें केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक ही सीमित नहीं रहा गया, बल्कि इसे पर्यावरण और प्रकृति संरक्षण जैसे गंभीर मुद्दों से भी जोड़ा गया। शासकीय उत्तर माध्यमिक विद्यालय परिसर में ‘एक पेड़ माँ के नाम’ अभियान के तहत एक विशेष पौधारोपण कार्यक्रम का आयोजन किया गया।
मंत्री गौतम टेटवाल ने विद्यालय परिसर में पौधे रोपकर पर्यावरण संरक्षण का संदेश दिया। इस दौरान उन्होंने उपस्थित जनसमूह को संबोधित करते हुए कहा, "पेड़ केवल हरी भरी वनस्पतियां नहीं हैं, बल्कि ये हमारे जीवन के आधार हैं। इनसे हमारी जलवायु संतुलित रहती है, मिट्टी की उर्वरता बनी रहती है और आने वाली पीढ़ियों के लिए शुद्ध हवा व जल सुनिश्चित होता है। पौधा लगाना केवल एक औपचारिकता नहीं है, बल्कि यह भविष्य के प्रति हमारी प्रतिबद्धता है। हर व्यक्ति को कम से कम एक पौधा लगाकर उसकी अपने बच्चे की तरह देखभाल करने का संकल्प लेना चाहिए।"
सामूहिक सहभागिता और ग्रामीण उत्थान का संकल्प
किसी भी आयोजन की सफलता उसमें जनभागीदारी पर निर्भर करती है और पांदा गांव का यह महोत्सव इसका जीवंत उदाहरण बना। ग्रामीण क्षेत्रों में जल संकट और भूमि के क्षरण से निपटने के लिए जनभागीदारी को समय की सबसे बड़ी आवश्यकता बताया गया। वक्ताओं ने कहा कि आधुनिक खेती के दौर में रासायनिक खादों के अंधाधुंध प्रयोग से मिट्टी की सेहत बिगड़ रही है, जिसे बचाने के लिए जैविक खेती और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण की ओर फिर से लौटने की जरूरत है।
इस भव्य आयोजन में क्षेत्र के कई दिग्गज और सामाजिक कार्यकर्ता भी उपस्थित रहे। कार्यक्रम में पूर्व विधायक गुलाब सिंह सुस्तानी, प्रदेश किसान मोर्चा उपाध्यक्ष राजेंद्र सिंह, जनपद अध्यक्ष देवनारायण नागर, जनपद उपाध्यक्ष कैलाश नागर सहित तमाम गणमान्य नागरिक और आसपास के गांवों से आए किसान मौजूद रहे। सभी ने एक स्वर में कृषि और पर्यावरण को बचाने का संकल्प लिया।
युवाओं को कृषि से जोड़ने की पहल
आज के दौर में जब युवा लगातार खेती-किसानी से दूर होकर शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं, ऐसे में बलराम कृषि महोत्सव जैसी पहल एक सकारात्मक दिशा में उठाया गया कदम साबित हो रही है। इस आयोजन के माध्यम से युवाओं को यह समझाने का प्रयास किया गया कि कृषि केवल आजीविका का साधन नहीं है, बल्कि यह एक जीवन शैली है जो हमें प्रकृति के सबसे करीब रखती है। किसानों की कड़ी मेहनत, उनके संघर्ष और धरती माता के प्रति उनके समर्पण भाव को नई पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए ऐसे आयोजनों का होना बेहद जरूरी है।
अंत में, यह महोत्सव केवल एक दिन का उत्सव बनकर नहीं रह गया, बल्कि इसने पांदा गांव और आसपास के पूरे क्षेत्र के लोगों के मन में पर्यावरण रक्षा, जल संरक्षण और किसान सम्मान की एक नई अलख जगा दी है। इस तरह के आयोजन यह साबित करते हैं कि जब संस्कृति और प्रकृति दोनों को एक साथ जोड़कर आगे बढ़ा जाता है, तभी समाज का वास्तविक और टिकाऊ विकास संभव होता है।