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कान्हा से जगतगुरु बनने तक: मुख्यमंत्री मोहन यादव ने खोले श्रीकृष्ण के संघर्ष के राज

कान्हा से जगतगुरु बनने तक: मुख्यमंत्री मोहन यादव ने खोले श्रीकृष्ण के संघर्ष के राज

जन्म लेते ही जिनके प्राणों पर संकट मंडराने लगा हो, जिनका बचपन तमाम विपरीत परिस्थितियों और संघर्षों के बीच बीता हो, उस कान्हा से लेकर पूरी कायनात को श्रीमद्भगवत गीता का शाश्वत ज्ञान देने वाले 'वंदे जगतगुरु' की उपाधि तक का सफर कतई आसान नहीं था। यह उद्गार किसी और के नहीं, बल्कि मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के हैं, जिन्होंने हाल ही में राजधानी भोपाल के रविन्द्र भवन में आयोजित भव्य रासलीला समारोह के दौरान भगवान श्रीकृष्ण के जीवन के अनछुए पहलुओं पर प्रकाश डाला। उन्होंने स्पष्ट किया कि जीवन की घनघोर निराशा और तमाम बाधाओं के बावजूद योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कभी भी चुनौतियों के आगे घुटने नहीं टेके, बल्कि हर परिस्थिति का डटकर मुकाबला करते हुए अपने संपूर्ण जीवन को लोक कल्याण के निमित्त समर्पित कर दिया।

अनासक्ति और विराट दर्शन की मूर्ति थे श्रीकृष्ण

मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने भगवान श्रीकृष्ण के व्यक्तित्व के सबसे बड़े गुण यानी अनासक्ति (मोह न रखना) पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा कि इतिहास इस बात गवाह है कि कृष्ण के जीवन में जिससे भी उनका सामना हुआ, वे एक बार वहां से लौटने के बाद दोबारा किसी के मोह-पाश में नहीं बंधे। उनका संपूर्ण जीवन संपूर्ण ब्रह्मांड और मानवता के कल्याण के लिए था। यही कारण है कि उनके मुखारविंद से निकला गीता का एक-एक श्लोक आज भी पूरी दुनिया के लिए मार्गदर्शक बना हुआ है। भगवान श्रीकृष्ण चौसठ (64) कलाओं, चौदह (14) विद्याओं और अठारह (18) पुराणों के ज्ञातारूप में सर्वोपरि माने गए हैं।

समारोह के दौरान मुख्यमंत्री ने अत्यंत भावुक और श्रद्धा से भरे माहौल में राधा-कृष्ण की सजीव झांकी के पास पहुंचकर कलाकारों की आरती उतारी और उनका आशीर्वाद लिया। दूर-दराज से अपनी कला का प्रदर्शन करने पहुंचे ब्रज और अन्य क्षेत्रों के कलाकारों की उन्होंने जमकर सराहना की। इस अवसर पर उन्होंने उपस्थित जनसमूह को आगामी हलषष्ठी और श्री कृष्ण जन्माष्टमी की आत्मीय शुभकामनाएं भी दीं।

मध्य प्रदेश में श्रीकृष्ण के चरणों से जुड़े तीर्थों का विकास

धार्मिक और ऐतिहासिक तथ्यों का हवाला देते हुए मुख्यमंत्री ने गर्व के साथ कहा कि मध्य प्रदेश का भगवान श्रीकृष्ण के साथ बहुत गहरा और अटूट नाता रहा है। भगवान कृष्ण ने इसी पावन धरती पर आकर शिक्षा-दीक्षा प्राप्त की थी और कान्हा से मर्यादा पुरुषोत्तम व जगतगुरु श्रीकृष्ण की यात्रा यहीं से परवान चढ़ी। राज्य सरकार अब उन सभी स्थानों को चिन्हित करने में जुटी है, जहां-जहां कभी भगवान श्रीकृष्ण के चरण पड़े थे। इन तमाम पवित्र स्थलों को सरकार भव्य 'श्रीकृष्ण तीर्थ' के रूप में विकसित कर रही है, ताकि आने वाली पीढ़ियां अपनी सांस्कृतिक जड़ों से मजबूती से जुड़ी रह सकें।

रविन्द्र भवन में सजी दिव्य रासलीला और ब्रज की संस्कृति

संस्कृति विभाग के तत्वावधान में रविन्द्र भवन के मुक्ताकाश मंच पर सात दिवसीय 'रासलीला समारोह' का आयोजन इन दिनों शहर का मुख्य आकर्षण बना हुआ है। इस भव्य आयोजन का मूल उद्देश्य प्राचीन लोककला और संस्कृति की परंपरा को जीवित रखना तथा नई पीढ़ी को अपनी गौरवशाली विरासत से परिचित कराना है। समारोह के पांचवें दिन मथुरा से आए प्रख्यात निर्देशक माधव आचार्य के निर्देशन में ब्रज के पारंपरिक कलाकारों ने मंच पर ऐसा समां बांधा कि दर्शक सुधि-बुधि खो बैठे।

गोवर्धन लीला: प्रकृति और अहंकार के बीच का शाश्वत संदेश

समारोह के पांचवें दिन का मुख्य आकर्षण 'श्रीगोवर्धन लीला' और रास प्रसंगों का सजीव मंचन रहा। ब्रज बोली में कलाकारों द्वारा प्रस्तुत संवाद इतने जीवंत थे कि दर्शक सीधे द्वापर युग में पहुंच गए। गोवर्धन लीला को प्रकृति, लोकजीवन और ईश्वर-भक्ति के अद्भुत समन्वय के रूप में प्रस्तुत किया गया। प्रसंग के अनुसार, जब ब्रजवासी देवराज इंद्र की पूजा की तैयारी कर रहे थे, तब बालकृष्ण ने उन्हें समझाया कि मनुष्य का सबसे बड़ा आधार कोई देवता नहीं, बल्कि उसका गोवर्धन पर्वत, गौवंश और यह हरी-भरी प्रकृति है, जिसके प्रति हर इंसान को कृतज्ञ होना चाहिए।

  • अहकार का मर्दन: ब्रजवासियों द्वारा इंद्र पूजा छोड़कर गोवर्धन पूजा करने से कुपित होकर इंद्र ने मूसलाधार वर्षा शुरू कर दी, जिससे पूरे ब्रज पर संकट आ गया।
  • गिरिराज धारण: संकट की उस घड़ी में भगवान कृष्ण ने अपनी कनिष्ठिका उंगली पर गोवर्धन पर्वत को उठाकर पूरे ब्रजवासियों की रक्षा की।
  • गंभीर संदेश: यह लीला अहंकार पर विनम्रता की जीत, भय पर अटूट विश्वास और पर्यावरण के प्रति अगाध प्रेम का संदेश देती है।

रासलीला: जीवात्मा और परमात्मा के मिलन की पराकाष्ठा

गोवर्धन लीला के उपरांत बांसुरी की मनमोहक तान के साथ जब रास की भूमिका तैयार हुई, तो पूरा वातावरण आध्यात्मिक ऊर्जा से सराबोर हो गया। श्रीमद्भागवत के 'रास पंचाध्यायी' प्रसंग का मार्मिक मंचन करते हुए कलाकारों ने दिखाया कि कैसे भगवान कृष्ण की मुरली की धुन सुनकर गोपियां अपने सारे सांसारिक बंधनों और मर्यादाओं को त्यागकर उनकी ओर खींची चली आती हैं। यह केवल कोई साधारण लौकिक प्रेम नहीं, बल्कि जीवात्मा का परमात्मा के साथ पूर्ण समर्पण और मिलन का प्रतीक है, जहां भक्त और भगवान की सीमाएं मिट जाती हैं।

भक्ति के सुरों में सराबोर हुई भोपाल की शाम

रासलीला के इस आध्यात्मिक माहौल को संगीत के सुरों ने और भी अधिक दिव्य बना दिया। जबलपुर से आईं प्रख्यात गायिका रूपाली कुसुमकर और उनके साथियों ने अपनी सुरीली आवाज से ऐसा समां बांधा कि हर कोई भक्ति के समंदर में गोता लगाने लगा।

कार्यक्रम के दौरान एक के बाद एक कई लोकप्रिय भजनों की प्रस्तुतियां दी गईं:

  • ‘श्रीकृष्ण गोविंद हरे मुरारी’
  • ‘एक राधा एक मीरा’
  • ‘तेरे बगैर सांवरिया’
  • ‘श्याम तेरी बंसी’
  • ‘मुकुट सिर मोर का’
  • ‘ओम नमः शिवाय’ और ‘राम सिया राम’

इन मनमोहक प्रस्तुतियों ने न केवल कृष्ण-प्रेम बल्कि भगवान शिव और श्री राम की भक्ति के विविध रंगों को भी एक ही मंच पर पिरो दिया। गायन में गगनदीप और सोनाली कुसुमकर ने बेहतरीन साथ दिया। इसके अलावा सुनील सोनी (की-बोर्ड), शुभम (ऑक्टोपैड), शानू (ड्रम), फिलिप (गिटार) और आनंद (ढोलक) की बेहतरीन संगत ने इस संगीत संध्या को शहरवासियों के लिए हमेशा-हमेशा के लिए यादगार बना दिया। इस आयोजन ने एक बार फिर साबित कर दिया कि लोक कलाएं आज भी हमारी संस्कृति की सबसे मजबूत धौरोहर हैं।

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रोशनी गुप्ता

रोशनी गुप्ता

Writer (स्थानीय खबरें)

रोशनी गुप्ता जमीनी पत्रकारिता के मजबूत स्तंभ हैं। वे स्थानीय स्तर की उन खबरों को सामने लाते हैं, जो अक्सर बड़े प्लेटफॉर्म पर नजर अंदाज हो जाती हैं।...

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