बेरोजगारी के इस दौर में जब देश का युवा अपने पैरों पर खड़े होने के लिए खुद का व्यवसाय शुरू करने की राह चुनता है, तो सरकारी योजनाएं उसकी सबसे बड़ी उम्मीद बनती हैं। महाराष्ट्र के भंडारा जिले में भी कुछ ऐसा ही सपना लेकर हजारों युवा आगे आए हैं। राज्य सरकार की महत्वाकांक्षी 'मुख्यमंत्री रोजगार निर्मिति योजना' (CMEGP) के तहत इस बार 1000 युवाओं को स्वरोजगार के लिए ऋण देने का बड़ा लक्ष्य रखा गया है। लेकिन कागजों पर दिखने वाले इस सुनहरे सपने के रास्ते में जमीनी हकीकत बहुत ही निराशाजनक नजर आ रही है।
वर्ष 2026-27 के लिए निर्धारित इस भारी-भरकम लक्ष्य को पूरा करने की जिम्मेदारी जिला उद्योग केंद्र के कंधों पर है। मगर योजना के शुरूआती दौर में ही बैंकों का रवैया इस योजना के लिए सबसे बड़ा रोड़ा बन गया है। आलम यह है कि महीनों बीत जाने के बाद भी हजारों आवेदनों में से गिने-चुने युवाओं के खातों तक ही लोन की राशि पहुंच पाई है।
केवल 65 ऋण मंजूर, 468 आवेदन अटके
वित्तीय वर्ष 2026-27 के शुरुआती महीनों के आंकड़े बेहद चौंकाने वाले हैं। जिला उद्योग केंद्र की ओर से युवाओं के कुल 468 आवेदन जांच के बाद बैंकों के पास भेजे गए थे। इन उम्मीदों से भरे आवेदनों में से बैंकों ने अब तक केवल 65 मामलों में ही ऋण को मंजूरी दी है। यानी सफलता का यह ग्राफ बेहद नीचे है, जिससे उन युवाओं की उम्मीदें धूमिल होती दिख रही हैं जो अपने बिजनेस आइडिया को जमीन पर उतारने के लिए बैंक की हरी झंडी का इंतजार कर रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यही रफ्तार रही, तो इस बार भी 1000 के बड़े लक्ष्य को छू पाना जिला प्रशासन और बैंकों के लिए टेढ़ी खीर साबित होगा। पिछले वित्त वर्ष यानी 2025-26 के आंकड़ों पर नजर डालें तो स्थिति और भी स्पष्ट हो जाती है। उस वर्ष 600 युवाओं को ऋण देने का लक्ष्य था, जिसके एवض में बैंकों को 1706 आवेदन भेजे गए थे। हालांकि तमाम मशक्कत के बाद 505 मामलों में ही लोन मंजूर हो पाया था और 84 प्रतिशत लक्ष्य हासिल किया गया था। लेकिन इस बार बैंकों की सख्ती ने प्रक्रिया को और अधिक धीमा कर दिया है।
क्यों आड़े आ रहे हैं बैंक? क्या है मुख्य वजह?
सवाल यह उठता है कि आखिर बैंक इस योजना के तहत आने वाले आवेदनों को पास करने में इतनी कंजूसी क्यों बरत रहे हैं? इसके पीछे बैंकों का कड़ा और जटिल प्रक्रियात्मक रवैया मुख्य कारण बताया जा रहा है। बैंक प्रबंधन किसी भी तरह के वित्तीय जोखिम से बचने के लिए पूरी तरह आश्वस्त होना चाहता है कि ऋण लेने वाला आवेदक भविष्य में लोन का पुनर्भुगतान (Repayment) करने में सक्षम है या नहीं।
इस सुरक्षात्मक रुख के चलते कागजी कार्रवाई, प्रोजेक्ट रिपोर्ट की बारीकी से जांच और सिबिल स्कोर जैसी औपचारिकताओं में आवेदकों को महीनों उलझा कर रखा जाता है। नतीजतन, युवा हताश होकर चक्कर काटने को मजबूर हो जाते हैं। पिछले कुछ सालों के रिकॉर्ड देखें तो स्थिति हर साल लगभग ऐसी ही रही है:
- वर्ष 2022-23: मात्र 222 प्रकरण स्वीकृत हुए
- वर्ष 2023-24: 451 प्रकरणों को मंजूरी मिली
- वर्ष 2024-25: केवल 295 लोन ही पास हो सके
इन पुराने आंकड़ों से साफ जाहिर है कि कभी भी शत-प्रतिशत लक्ष्य हासिल नहीं हुआ है, और इस बार 1000 का आंकड़ा पार करना एक बड़ी चुनौती बन गया है।
किन व्यवसायों की तरफ सबसे ज्यादा झुकाव?
भले ही ऋण मिलने में अड़चनें आ रही हों, लेकिन युवाओं और ग्रामीण इलाकों के लोगों का उत्साह कम नहीं हुआ है। पिछले साल मंजूर किए गए प्रकरणों के आंकड़ों का विश्लेषण करें तो एक दिलचस्प तस्वीर सामने आती है। सबसे अधिक मांग हार्वेस्टर मशीनों के लिए आई थी, जिससे यह साबित होता है कि इस योजना का लाभ उठाने में किसानों और कृषि से जुड़े उद्यमियों की संख्या सबसे ज्यादा (लगभग 123) रही।
इसके अलावा अन्य क्षेत्रों में भी युवाओं ने अपनी किस्मत आजमाई है:
- ई-व्हीकल व्यवसाय: 31 आवेदन
- टेलरिंग (सिलाई): 22 आवेदन
- सेंट्रिंग वर्क: 21 आवेदन
- कारपेंटरी (बढ़ईगिरी): 20 आवेदन
- मंडप डेकोरेशन: 18 आवेदन
- रेस्तरां व्यवसाय: 16 आवेदन
- नेट कैफे और ब्यूटी पार्लर: प्रत्येक 11-11 आवेदन
- जेरॉक्स और बेकरी उद्योग: क्रमशः 8 और 3 आवेदन
यह आंकड़े बताते हैं कि युवा केवल पारंपरिक नौकरियों के पीछे भागने के बजाय आधुनिक और सेवा क्षेत्र के व्यवसायों में भी हाथ आजमाना चाहते हैं, बशर्ते उन्हें समय पर आर्थिक संबल मिल जाए।
योजना के नियम और सब्सिडी का पूरा गणित
मुख्यमंत्री रोजगार निर्मिति योजना के तहत सरकार युवाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए कई तरह की सहूलियतें देती है। इस योजना के दायरे में विनिर्माण (Manufacturing), कृषि और सेवा (Service) क्षेत्र से जुड़ी परियोजनाएं आती हैं।
योजना के नियमों के मुताबिक:
- विनिर्माण क्षेत्र: इस क्षेत्र के उद्योगों के लिए अधिकतम परियोजना लागत 50 लाख रुपए तय की गई है।
- सेवा व कृषि क्षेत्र: इन उद्योगों के लिए अधिकतम लागत 20 लाख रुपए निर्धारित है।
- शैक्षणिक योग्यता: 20 लाख रुपए से अधिक लागत वाली परियोजनाओं के लिए आवेदक का कम से कम सातवीं पास होना जरूरी है। वहीं, 25 लाख रुपए से अधिक की बड़ी परियोजनाओं के लिए दसवीं पास होना अनिवार्य किया गया है।
इस योजना की सबसे बड़ी खूबी इसका आकर्षक वित्तीय मॉडल है, जो युवाओं पर आर्थिक बोझ को काफी हद तक कम कर देता है:
- राज्य सरकार का अनुदान (Subsidy): परियोजना की कुल लागत का 15 प्रतिशत से लेकर 35 प्रतिशत तक का हिस्सा सरकार आर्थिक अनुदान के रूप में देती है, जिसे चुकाना नहीं पड़ता।
- लाभार्थी का अंशदान: आवेदक को अपनी ओर से कुल लागत का केवल 5 से 10 प्रतिशत हिस्सा ही लगाना होता है।
- बैंक ऋण: बाकी बचा हुआ अधिकांश हिस्सा (यानी 60 से 80 प्रतिशत तक) बैंकों द्वारा रियादती दरों पर ऋण के रूप में प्रदान किया जाता है।
अब आगे क्या?
योजना कागजों पर जितनी शानदार और लुभावनी है, धरातल पर उसकी सफलता उतनी ही अधिक पेचीदगियों से घिरी हुई है। जब तक जिला प्रशासन और बैंक आपसी तालमेल को बेहतर नहीं करते और ऋण वितरण प्रक्रिया को सरल नहीं बनाते, तब तक भंडारा के युवाओं का खुद का मालिक बनने का यह सपना अधूरा ही रहेगा। स्थानीय युवाओं और सामाजिक संगठनों ने अब मांग उठानी शुरू कर दी है कि प्रशासन बैंकों पर दबाव बनाए ताकि लंबित पड़े आवेदनों का त्वरित निस्तारण किया जा सके और ज्यादा से ज्यादा युवाओं को समय पर लोन मिल सके।