मध्य प्रदेश के रीवा जिले से एक बड़ी और संवेदनशील खबर सामने आ रही है। रीवा के बहुचर्चित संजय गांधी अस्पताल में प्रसूता कल्पना मिश्रा और उनके नवजात शिशु की असमय मौत के मामले में शासन स्तर पर एक बहुत बड़ा प्रशासनिक कदम उठाया गया है। इस पूरे घटनाक्रम के बाद से लगातार बढ़ते दबाव और परिजनों के कड़े विरोध के चलते मेडिकल कॉलेज के डीन डॉ. सुनील अग्रवाल पर आखिरकार गाज गिर ही गई। सरकार ने प्रशासनिक फेरबदल करते हुए डीन सुनील अग्रवाल को उनके पद से हटा दिया है और उन्हें रीवा से स्थानांतरित कर सतना मेडिकल कॉलेज भेज दिया गया है।
चार दिनों से चल रहा था परिजनों का धरना और आमरण अनशन
यह पूरा मामला तब तूल पकड़ा जब इलाज के दौरान लापरवाही के आरोप लगाते हुए मृतका के परिजनों ने अस्पताल परिसर में ही न्याय की मांग को लेकर मोर्चा खोल दिया। मृतका कल्पना मिश्रा के पिता अपनी बेटी और पोते की मौत से पूरी तरह टूट चुके थे, लेकिन उन्होंने न्याय के लिए हार नहीं मानी। वे पिछले चार दिनों से अस्पताल के बाहर धरने पर बैठे हुए थे। स्थिति तब और गंभीर हो गई जब उन्होंने न्याय न मिलने पर आमरण अनशन का रास्ता चुन लिया।
परिजनों की मांगें बेहद स्पष्ट थीं। उनका कहना था कि केवल औपचारिकता के तौर पर प्रशासनिक फेरबदल या विभागीय जांच से काम नहीं चलेगा। पीड़ित परिवार लगातार यह मांग कर रहा था कि अस्पताल प्रशासन के सर्वोच्च पद पर बैठे डीन को तुरंत हटाया जाए और इसके साथ ही घटना के लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार डॉक्टरों के खिलाफ सख्त आपराधिक धाराओं में एफआईआर दर्ज की जाए। परिवार का तर्क था कि अगर दोषियों के खिलाफ कानूनी शिकंजा नहीं कसा गया, तो भविष्य में ऐसी लापरवाहियों का सिलसिला थमेगा नहीं।
पहले भी हो चुकी हैं कई बड़ी प्रशासनिक गाज
कल्पना मिश्रा और उनके नवजात की मौत के बाद से ही स्वास्थ्य विभाग और अस्पताल प्रबंधन की कार्यप्रणाली सवालों के घेरे में आ गई थी। इस मामले की गंभीरता को देखते हुए सरकार और स्वास्थ्य मंत्रालय ने शुरुआती स्तर पर ही कुछ सख्त कदम उठाने शुरू कर दिए थे।
- डॉक्टरों का निलंबन: घटना के तुरंत बाद ड्यूटी पर तैनात दो लापरवाह डॉक्टरों, डॉ. सोनल अग्रवाल और डॉ. निधि पाण्डेय को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया था।
- अधीक्षक पर कार्रवाई: इसके बाद अस्पताल की व्यवस्थाओं की निगरानी में नाकाम रहने पर अस्पताल अधीक्षक राहुल मिश्रा को भी उनके पद से हटा दिया गया था।
- डीन का ट्रांसफर: अब इस कड़ी में सबसे बड़ा कदम उठाते हुए मेडिकल कॉलेज के डीन डॉ. सुनील अग्रवाल को भी उनके पद से चलता कर दिया गया है और उन्हें सतना मेडिकल कॉलेज ट्रांसफर कर दिया गया है।
क्या सिर्फ ट्रांसफर से मिलेगा परिवार को न्याय?
प्रशासनिक स्तर पर एक के बाद एक हो रही इन बड़ी कार्रवाइयों से यह तो साफ है कि सरकार इस मामले की गंभीरता को भली-भांति समझ रही है। हालांकि, सवाल यह उठता है कि क्या केवल प्रशासनिक तबादले से पीड़ित परिवार का गुस्सा शांत होगा? परिजनों का रुख अभी भी कड़ा बना हुआ है। उनका कहना है कि जब तक लापरवाह डॉक्टरों और जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ पुलिस में एफआईआर दर्ज कर विधिवत कानूनी कार्रवाई शुरू नहीं की जाती, तब तक उनकी लड़ाई जारी रहेगी।
चिकित्सा जगत में इस घटना ने एक बार फिर से सरकारी अस्पतालों की कार्यप्रणाली, डॉक्टरों के रवैये और मरीजों की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। रीवा के इस प्रतिष्ठित अस्पताल में हुई इसtragic घटना ने आम जनता को झकझोर कर रख दिया है।
आगे क्या हो सकता है?
डीन के तबादले के बाद अब सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि जिला प्रशासन और पुलिस विभाग इस मामले में आगे क्या रुख अपनाता है। क्या पीड़ित पिता के अनशन और चीख-पुकार के बाद पुलिस आखिरकार आरोपियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करेगी? या फिर मामला सिर्फ उच्च स्तरीय जांच समितियों की फाइलों में ही दबी रह जाएगी? आने वाले दिनों में इस मामले पर राजनीति और प्रशासनिक हलकों में भूचाल आना तय माना जा रहा है।
फिलहाल, सतना मेडिकल कॉलेज भेजे गए पूर्व डीन सुनील अग्रवाल के स्थान पर रीवा में नए प्रशासनिक प्रभार को लेकर भी सुगबुगाहट तेज हो गई है। लेकिन इन सबके बीच, एक मां और उसके नवजात बच्चे की मौत ने स्वास्थ्य व्यवस्था की संवेदनहीनता को एक बार फिर से उजागर कर दिया है, जिसका जवाब देने के लिए शायद ही किसी के पास कोई संतोषजनक शब्द हो।