काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) परिसर का माहौल शनिवार को उस समय खासा गर्मा गया जब ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (आइसा) की ओर से एक विशेष छात्र चौपाल का आयोजन किया गया। इस अनूठे संवाद कार्यक्रम में देश के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों से जुड़े मुद्दों से लेकर स्थानीय स्तर पर छात्रों की परेशानियों तक खुलकर बात रखी गई। जेएनयू की वैचारिक बहसों से लेकर आईआईटी-बीएचयू के संवेदनशील प्रकरण तक, छात्रों ने हर उस मुद्दे पर अपनी बेबाक राय रखी जो आज के दौर में उच्च शिक्षा संस्थानों की दशा और दिशा को प्रभावित कर रहा है।
परिसर में संवाद और बहसों का दौर
शनिवार को आयोजित इस चौपाल में शिरकत करने के लिए देश की राजधानी से लेकर उत्तर प्रदेश के विभिन्न कोनों तक के छात्र नेता पहुंचे थे। कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण रहीं आइसा की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा बोरा और प्रदेश अध्यक्ष मनीष कुमार। दोनों छात्र नेताओं ने पारंपरिक मंचों से इतर विद्यार्थियों के बीच जमीन पर बैठकर सीधे संवाद का रास्ता चुना। इस दौरान छात्रों के मन में उमड़ रहे अनगिनत सवाल और विश्वविद्यालय प्रशासन की कार्यप्रणाली को लेकर कई तरह की शिकायतें खुलकर सामने आईं।
पदाधिकारियों के अनुसार, इस प्रकार की चौपालों का मुख्य उद्देश्य देश भर के विश्वविद्यालयों में पढ़ रहे युवाओं की नब्ज टटोलना है। उनकी रोजमर्रा की समस्याओं, अकादमिक चुनौतियों और लोकतांत्रिक अधिकारों को लेकर एक साझा मंच तैयार करना इस अभियान की प्राथमिकता है। यह श्रृंखला उत्तर प्रदेश के प्रयागराज से शुरू हुई थी, जहां पहली चौपाल लगाई गई थी, और बीएचयू में आयोजित यह कार्यक्रम इस कड़ी का दूसरा पड़ाव था।
कार्यक्रम की अनुमति न मिलने पर फूटा गुस्सा
चौपाल के दौरान सबसे मुखर होकर उठाया गया मुद्दा बीएचयू परिसर के भीतर छात्र संगठनों के कार्यक्रमों को अनुमति न मिलने का था। आइसा के प्रदेश अध्यक्ष मनीष कुमार ने प्रशासन पर तीखा हमला बोलते हुए आरोप लगाया कि विश्वविद्यालय प्रशासन जानबूझकर वैचारिक आयोजनों और छात्र बैठकों पर रोक लगाता है। उन्होंने कहा कि जब भी संगठन की ओर से किसी वैचारिक गोष्ठी या बैठक की अनुमति मांगी जाती है, तो प्रशासन टालमटोल रवैया अपनाता है या सीधे तौर पर मना कर देता है।
मनीष कुमार ने दावा किया कि विश्वविद्यालय के अधिकारी अक्सर ऊपर से दबाव होने का हवाला देकर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेते हैं। इस बात पर चौपाल में मौजूद आम विद्यार्थियों ने भी कड़ा रोष व्यक्त किया। छात्रों का कहना था कि एक केंद्रीय विश्वविद्यालय केवल किताबी ज्ञान हासिल करने की जगह नहीं है, बल्कि यह स्वतंत्र विचारों के आदान-प्रदान, बहस और वैचारिक मंथन का एक जीवंत केंद्र होना चाहिए। विद्यार्थियों ने मांग की कि परिसर में छात्र संगठनों के आयोजनों के लिए एक पारदर्शी और समान नियम-प्रणाली होनी चाहिए, जिससे हर विचारधारा के युवाओं को अपनी बात रखने का लोकतांत्रिक अधिकार मिल सके।
आईआईटी-बीएचयू प्रकरण और महिला सुरक्षा पर गंभीर मंथन
चौपाल का माहौल उस समय और अधिक गंभीर हो गया जब चर्चा का रुख आईआईटी-बीएचयू में हुए बहुचर्चित छात्रा दुष्कर्म प्रकरण की ओर मुड़ा। इस संवेदनशील मुद्दे पर छात्रों ने प्रशासन की सुरक्षा व्यवस्था और जवाबदेही पर सीधे सवाल उठाए। वक्ताओं और विद्यार्थियों ने एक स्वर में कहा कि उच्च शिक्षण संस्थानों के परिसरों में पढ़ने वाली छात्राओं की सुरक्षा सर्वोपरि होनी चाहिए।
- परिसर के भीतर और आसपास सुरक्षा के कड़े इंतजाम क्यों नहीं किए जाते?
- प्रशासन ऐसी घटनाओं के बाद अपनी जिम्मेदारी तय करने में क्यों हिचकिचाता है?
- छात्राओं को निर्भीक माहौल देने के लिए सुरक्षा तंत्र कितना सक्षम है?
इन तमाम सवालों के जरिए छात्रों ने सिस्टम की खामियों को उजागर किया। उनका कहना था कि जब तक परिसरों में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर पुख्ता और पारदर्शी कदम नहीं उठाए जाएंगे, तब तक शैक्षणिक माहौल में सुधार की बात करना बेमानी है।
छात्रों के सीधे संवाद पर जोर
कार्यक्रम के अंत में राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा बोरा ने छात्रों को संबोधित करते हुए कहा कि लोकतंत्र में असहमति और संवाद का अधिकार सबसे बड़ा हथियार है। उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि वे अपनी छोटी-बड़ी समस्याओं के खिलाफ सामूहिक रूप से आवाज उठाएं। चौपाल के दौरान बड़ी संख्या में छात्र-छात्राओं ने अपने लिखित और मौखिक सुझाव संगठन के पदाधिकारियों के सामने रखे।
आइसा नेताओं ने स्पष्ट किया कि आने वाले दिनों में इस तरह के संवाद अभियानों को और अधिक व्यापक स्तर पर चलाया जाएगा, ताकि देश के युवा अपनी वास्तविक समस्याओं को मुख्यधारा की चर्चाओं का हिस्सा बना सकें। बीएचयू की इस चौपाल ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि आज का युवा अपनी शिक्षा, सुरक्षा और अधिकारों को लेकर पूरी तरह सजग है और वह प्रशासन से जवाब मांगने से पीछे नहीं हटने वाला।