वाराणसी की पावन और साहित्यिक भूमि पर शनिवार को एक ऐसा नज़ारा देखने को मिला, जिसने हर किसी का मन मोह लिया। मौका था काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के ऐतिहासिक मधुबन पार्क में आयोजित 'अक्षरम्-काव्य प्रतियोगिता' का। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (अभाविप) की बीएचयू इकाई द्वारा आयोजित इस भव्य कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के विभिन्न संकायों से आए लगभग 150 छात्र-छात्राओं ने पूरे उत्साह के साथ हिस्सा लिया। इस आयोजन ने एक बार फिर साबित कर दिया कि आज की युवा पीढ़ी केवल किताबी ज्ञान तक सीमित नहीं है, बल्कि देश, समाज और संस्कृति के प्रति उसकी गहरी समझ और संवेदना भी उतनी ही प्रबल है।
काव्य के मंच पर उतरा सामाजिक सरोकार और राष्ट्रबोध
मधुबन पार्क के इस अनूठे साहित्यिक कुंभ में जब युवाओं ने अपनी कलम से निकले शब्दों को जुबां पर लाया, तो पूरा परिसर कविताओं की सरगम से गूंज उठा। किसी ने सामाजिक समस्याओं की गहराई और उसकी पीड़ा को अपनी रचना का केंद्र बनाया, तो किसी ने राष्ट्र के प्रति अटूट प्रेम और सांस्कृतिक चेतना को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया। समसामयिक विषयों पर आधारित कविताओं ने न सिर्फ श्रोताओं को सोचने पर मजबूर किया, बल्कि युवा मन की कल्पनाशीलता और संवेदनशीलता का भी बखूबी अहसास कराया।
प्रतिभागियों द्वारा प्रस्तुत की गई मौलिक रचनाओं में एक अजीब सी ऊर्जा और ताजगी थी। सस्वर काव्य-पाठ के दौरान विद्यार्थियों के हाव-भाव और उनकी प्रस्तुति-कौशल ने यह साबित कर दिया कि बीएचयू की आबोहवा में साहित्य और कला की जड़ें कितनी गहरी हैं। हर कविता अपने आप में अनूठी थी और श्रोता मंत्रमुग्ध होकर युवा कवियों को सुन रहे थे।
निर्णायक मंडल के लिए रही कड़ी चुनौती
करीब 150 रचनाकारों के बीच मुकाबला इतना कड़ा था कि निर्णायक मंडल के लिए सर्वश्रेष्ठ प्रविष्टियों का चयन करना किसी चुनौती से कम नहीं था। मूल्यांकन के लिए बेहद सख्त और पेशेवर मानक तय किए गए थे। रचनात्मकता, विषय-वस्तु की गहराई, भाषा-शैली, भावों की अभिव्यक्ति और मंच पर प्रस्तुति-कौशल जैसे विभिन्न पैमानों पर हर रचना को परखा गया।
इन तमाम मानकों पर खरा उतरने वाले श्रेष्ठ युवा कवियों को आयोजन के अंत में विशेष रूप से पुरस्कृत और सम्मानित किया गया। पुरस्कार पाने वाले विद्यार्थियों के चेहरों पर जो चमक और संतोष था, वह उनकी मेहनत और प्रतिभा की गवाही दे रहा था।
कविता समाज की चेतना को देती है स्वर: अभय प्रताप सिंह
कार्यक्रम के समापन समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में पहुंचे अभाविप के राष्ट्रीय मंत्री अभय प्रताप सिंह ने विद्यार्थियों की ओजस्वी और भावपूर्ण प्रस्तुतियों की जमकर सराहना की। उन्होंने अपने संबोधन में कहा,
"कविता महज कुछ शब्दों और भावनाओं की अभिव्यक्ति भर नहीं है, बल्कि यह समाज की चेतना, उसकी संवेदना और सांस्कृतिक स्मृति को जीवंत स्वर देने वाली एक बेहद सशक्त विधा है।"
उन्होंने युवाओं का आह्वान करते हुए कहा कि वे नियमित रूप से साहित्य का अध्ययन करें ताकि उनकी सृजनात्मक प्रतिभा में और अधिक निखार आ सके और वे समाज को एक नई दिशा दे सकें।
साहस, अस्मिता और राष्ट्रीय गरिमा पर बेबाक विचार
कार्यक्रम के दौरान वैचारिक सत्र भी खासा चर्चा का विषय रहा। अभाविप बीएचयू इकाई की छात्रा कार्यकर्ता मेघा मुखर्जी ने अपने संबोधन में भारतीय इतिहास की वीरांगनाओं और जौहर की महान परंपरा का स्मरण करते हुए इसे सीधे तौर पर साहस, स्वाभिमान और अस्मिता से जोड़ा। उन्होंने कहा कि देश की महिलाओं ने हर कठिन परिस्थिति में अपने स्वाभिमान की रक्षा के लिए अनुकरणीय साहस का परिचय दिया है।
इसके साथ ही, उन्होंने देश के वैचारिक परिदृश्य पर बात करते हुए जेएनयू में कथित रूप से गूंजने वाले राष्ट्र-विरोधी नारों पर कड़ा ऐतराज जताया। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अभाविप हमेशा से राष्ट्र की गरिमा, अखंडता और संप्रभुता के मुद्दों पर पूरी तरह मुखर रहा है और आगे भी रहेगा।
'शब्दों से सृष्टि, भावों से भारती'
कार्यक्रम की सफलता पर बात करते हुए इकाई अध्यक्ष पल्लव सुमन ने कहा कि इस तरह के आयोजन विश्वविद्यालय परिसर में छिपे हुए अनगढ़ रचनाकारों को एक ऐसा बेहतरीन मंच प्रदान करते हैं, जहाँ वे अपनी साहित्यिक प्रतिभा को दुनिया के सामने रख सकते हैं। वहीं, इकाई मंत्री अनुराग तिवारी ने कार्यक्रम के अंत में सभी अतिथियों, निर्णायक मंडल और प्रतिभागियों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए धन्यवाद ज्ञापित किया।
कुल मिलाकर, बीएचयू में संपन्न हुआ यह आयोजन 'शब्दों से सृष्टि, भावों से भारती, काव्य से संस्कृति' के मूल भाव को पूरी तरह सार्थक करने में सफल रहा। इस ठंडक भरे सप्ताहांत में हुई कविताओं की गर्माहट ने एक बार फिर बनारस के साहित्यिक मिजाज को और अधिक समृद्ध कर दिया है।