वाराणसी के प्रतिष्ठित काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) परिसर में इन दिनों छात्र आक्रोश और संवाद की एक नई तस्वीर देखने को मिल रही है। छात्रहित, सुरक्षा और प्रशासनिक व्यवस्था में पारदर्शिता जैसी बुनियादी मांगों को लेकर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) की इकाई का अनिश्चितकालीन धरना-प्रदर्शन तीसरे दिन भी पूरी मजबूती के साथ जारी है। इस आंदोलन की सबसे खास बात यह रही कि खराब मौसम और झमाझम बारिश भी छात्रों के हौसले को डिगा नहीं पाई। आंदोलन के तीसरे दिन शुक्रवार को परिसर में एक अनूठे 'ओपन माइक' कार्यक्रम का आयोजन किया गया, जिसने इस पूरे विरोध प्रदर्शन को एक रचनात्मक और वैचारिक रूप दे दिया।
बारिश भी नहीं रोक पाई छात्रों के कदम
सितंबर 2026 के इन दिनों में मौसम का मिजाज भले ही बदल रहा हो और लगातार हो रही बारिश से जनजीवन प्रभावित हुआ हो, लेकिन बीएचयू के सेंट्रल ऑफिस के बाहर चल रहे इस धरने की ऊर्जा में कोई कमी नहीं आई। झमाझम बारिश के बीच भी सैकड़ों की संख्या में छात्र और छात्राएं अपनी मांगों पर अडिग नजर आए। इस दौरान पूरा माहौल छात्रों के नारों और कविताओं से गूंज उठा। खराब मौसम के बावजूद विद्यार्थियों की यह भारी उपस्थिति इस बात का स्पष्ट संदेश दे रही थी कि परिसर के भीतर सुलग रही समस्याएं अब किसी एक दिन या एक मुद्दे तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह एक व्यापक असंतोष का रूप ले चुकी हैं, जिस पर विश्वविद्यालय प्रशासन को तुरंत ध्यान देने की आवश्यकता है।
ओपन माइक पर गूंजी कविताएं और समस्याएं
धरना स्थल पर आयोजित 'ओपन माइक' सत्र इस आंदोलन का मुख्य आकर्षण रहा। इस अनूठे मंच के माध्यम से छात्रों को अपनी बात खुलकर रखने का पूरा अवसर मिला। विद्यार्थियों ने मंच पर पहुंचकर केवल भाषण ही नहीं दिए, बल्कि अपनी कविताओं, शायरी और व्यक्तिगत अनुभवों के जरिए विश्वविद्यालय प्रशासन की कार्यशैली पर सवाल उठाए। इस दौरान छात्राओं ने भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और परिसर में अपनी सुरक्षा, हॉस्टल की सुविधाओं और प्रशासनिक तंत्र में आने वाली दिक्कतों को खुलकर साझा किया। मंच से उठी हर एक आवाज में एक ही टीस थी—कि देश के इस शीर्ष शिक्षण संस्थान में उनकी बुनियादी जरूरतें और अधिकार सुरक्षित होने चाहिए।
छात्रों का कहना था कि वे अपनी ही यूनिवर्सिटी में अपनी समस्याओं को रखने के लिए मजबूर हैं, जो कि प्रशासनिक उदासीनता को दर्शाता है। ओपन माइक के दौरान कई भावुक क्षण भी आए जब छात्रों ने अकादमिक दबाव, प्रशासनिक लालफीताशाही और संवादहीनता के अपने कड़वे अनुभवों को सबके सामने रखा।
अभाविप नेतृत्व ने स्पष्ट किए आंदोलन के उद्देश्य
इस पूरे आंदोलन को दिशा दे रहे अभाविप के पदाधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि उनका यह विरोध किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ नहीं है, बल्कि यह पूरी व्यवस्था को सुधारने की एक ईमानदार कोशिश है।
अभाविप इकाई अध्यक्ष पल्लव सुमन ने मीडिया से बात करते हुए कहा, 'यह इस बात का प्रमाण है कि प्रतिकूल मौसम भी हमारे साथियों के हौसले को कम नहीं कर सकता। छात्र समुदाय आज जिन समस्याओं से जूझ रहा है, वे बेहद गंभीर हैं। विश्वविद्यालय प्रशासन को अहंकार छोड़कर इन मुद्दों पर संवेदनशीलता दिखानी होगी।'
वहीं, इकाई मंत्री अनुराग तिवारी ने कहा कि इस आंदोलन का उद्देश्य केवल और केवल छात्रहित, परिसर की सुरक्षा, प्रशासनिक पारदर्शिता और जवाबदेही तय करना है। उन्होंने जोर देकर कहा, 'हम टकराव की स्थिति नहीं चाहते, बल्कि संवाद के जरिए समाधान चाहते हैं। लेकिन अगर प्रशासन हमारी अनदेखी करेगा, तो यह संघर्ष और तेज होगा।'
प्रमुख मांगें जिन पर टिका है आंदोलन
- प्रशासनिक पारदर्शिता: यूनिवर्सिटी के कामकाज में पारदर्शिता लाई जाए ताकि छात्रों को हर फैसले की सही जानकारी मिल सके।
- परिसर की सुरक्षा: खासकर छात्राओं के लिए हॉस्टल और कैंपस के भीतर सुरक्षा के पुख्ता और कड़े इंतजाम किए जाएं।
- संवादहीनता का अंत: छात्र प्रतिनिधियों और प्रशासन के बीच नियमित संवाद स्थापित करने के लिए एक प्रभावी मेकैनिज्म बने।
- बुनियादी सुविधाएं: कैंपस के सभी विभागों और हॉस्टलों में छात्रों को मिलने वाली बुनियादी सुविधाओं में सुधार हो।
आगे की रणनीति और प्रशासन का रुख
तीसरे दिन भी चले इस अनिश्चितकालीन धरने के बाद छात्र अब और अधिक मुखर नजर आ रहे हैं। परिषद के पदाधिकारियों ने दो टूक शब्दों में कह दिया है कि जब तक विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से छात्रहित से जुड़ी मांगों पर कोई ठोस, पारदर्शी और समयबद्ध कार्रवाई नहीं की जाती, तब तक यह धरना समाप्त नहीं होगा।
फिलहाल, विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से इस मामले में कोई आधिकारिक बयान तो सामने नहीं आया है, लेकिन छात्रों के इस आक्रामक और रचनात्मक विरोध प्रदर्शन ने प्रशासनिक गलियारों में हलचल जरूर पैदा कर दी है। ओपन माइक के जरिए अपनी बात रखने वाले इन युवाओं ने साबित कर दिया है कि आज का छात्र अपनी समस्याओं को लेकर जागरूक भी है और लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात मनवाने का हुनर भी जानता है। अब देखना यह है कि बीएचयू प्रशासन कब इन सुलगती समस्याओं पर अपनी चुप्पी तोड़ता है और छात्रों के साथ किसी सार्थक संवाद की शुरुआत करता है।
