क्या आपने कभी सोचा है कि जो लोग दिन-रात आम जनता की सेवा में लगे रहते हैं, जो कानून व्यवस्था संभालने से लेकर स्वास्थ्य सेवाओं की रीढ़ हैं, वे खुद किस हाल में जीवन बिता रहे हैं? यह सवाल नागपुर से सामने आई एक झकझोर देने वाली सच्चाई को देखने के बाद हर संवेदनशील नागरिक के मन में उठना लाजिमी है। नागपुर शहर में विभिन्न सरकारी विभागों के कर्मचारियों के लिए बनी वसाहतें (कॉलोनियां) आज मौत का कुआं बन चुकी हैं। स्थिति इतनी डरावनी है कि कभी भी कोई बड़ा हादसा हो सकता है।
इस गंभीर और संवेदनशील मामले पर बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर बेंच ने बेहद सख्त रुख अपनाया है। मीडिया में छपी खबरों का स्वतः संज्ञान (Suo Motu) लेते हुए अदालत ने इसे जनहित याचिका (PIL) के रूप में स्वीकार कर लिया है। आइए जानते हैं कि आखिर क्या है पूरा मामला और क्यों इन सरकारी कॉलोनियों की हालत इतनी बदतर हो चुकी है।
अदालत ने लिया स्वतः संज्ञान, दो वकीलों की 'अदालत मित्र' के रूप में नियुक्ति
मामले की गंभीरता को देखते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट के न्यायाधीश अनिल किलोर और न्यायाधीश रजनीश व्यास की खंडपीठ ने इस मुद्दे पर स्वतः संज्ञान लिया। अदालत ने इस मामले की गहराई से जांच और कोर्ट को निष्पक्ष रिपोर्ट सौंपने के लिए दो वकीलों—अधिवक्ता आस्था शर्मा और अधिवक्ता धनश्री नागुलकर—को 'अदालत मित्र' (Amicus Curiae) के रूप में नियुक्त किया है।
अदालत का मानना है कि प्रशासनिक तंत्र की यह उदासीनता न केवल कर्मचारियों के मौलिक अधिकारों का हनन है, बल्कि यह सीधे तौर पर उनके और उनके परिवारों के जीवन के अधिकार (Article 21) पर एक बड़ा खतरा भी है।
मरम्मत के नाम पर सिर्फ खानापूर्ति, जान जोखिम में डालकर रह रहे परिवार
सामने आई रिपोर्ट के अनुसार, केंद्र और राज्य सरकार के विभिन्न विभागों—जैसे पुलिस, बीएसएनएल, रेलवे, वन विभाग, एसटी महामंडल और चिकित्सा विभाग—के कर्मचारियों के लिए दशकों पहले ये कॉलोनियां बसाई गई थीं। समय के साथ इनमें से ज्यादातर इमारतें अपनी उम्र पूरी कर चुकी हैं और जीर्ण-शीर्ण अवस्था में पहुंच चुकी हैं।
हैरानी की बात तो यह है कि इन जर्जर इमारतों को गिराकर नए निर्माण करने या सुरक्षित वैकल्पिक आवास देने के बजाय, प्रशासन केवल मामूली रंग-रोगन और सतही मरम्मत (Patchwork) करके काम चला रहा है। छत से टपकता पानी, दीवारों पर उग आए बड़े-बड़े पौधे और अंदर धंसते फर्श के बीच कर्मचारी अपने मासूम बच्चों और बुजुर्ग माता-पिता के साथ रहने को मजबूर हैं। वैकल्पिक आवास उपलब्ध न होने के कारण इन परिवारों के पास कोई दूसरा विकल्प भी नहीं बचा है।
शहर की इन प्रमुख सरकारी कॉलोनियों की हालत है सबसे खराब
नागपुर शहर के कई पॉश और महत्वपूर्ण इलाकों में बनी ये सरकारी वसाहतें आज रखरखाव के अभाव में खंडहर में तब्दील हो चुकी हैं। प्रभावित कॉलोनियों की सूची लंबी है:
- पुलिस विभाग: पुलिस लाइन टाकली, रघुजीनगर, लकड़गंज और पांचपावली।
- परिवहन व चिकित्सा: गणेशपेठ (एसटी महामंडल कॉलोनी) और अजनी (चिकित्सा कर्मचारी व डॉक्टर कॉलोनी)।
- शिक्षा व शोध: रविनगर और राजनगर (सरकारी कर्मचारी कॉलोनी), अमरावती रोड (राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज नागपुर विश्वविद्यालय कॉलोनी)।
- वन व अन्य विभाग: लालगोदाम व इंदोरा चौक (वन विभाग कॉलोनी), सिविल लाइंस (वन अधिकारी कॉलोनी, बीएसएनएल, एलआईसी और आरबीआई कॉलोनी)।
- अन्य महत्वपूर्ण कॉलोनियां: अजनी (सेंट्रल जेल कॉलोनी), सक्करदरा (डाक विभाग कॉलोनी), धंतोली (एलआईसी कॉलोनी) और रविनगर (सार्वजनिक निर्माणकार्य विभाग कॉलोनी)।
प्रशासन की लापरवाही और करोड़ों का सवाल
- सरकारी कर्मचारी और अधिकारी किसी भी देश या राज्य की प्रशासनिक रीढ़ होते हैं। सरकारें इनके सुरक्षित और स्वच्छ आवास के लिए बजट में करोड़ों रुपए आवंटित करती हैं। लेकिन जमीनी स्तर पर यह पैसा कहां जाता है, यह एक बड़ा सवाल है। उचित देखरेख के अभाव में ये परिसर्स बद से बदतर होते चले गए और विभाग आंखें मूंदकर बैठे रहे।
"जब सुरक्षा की जिम्मेदारी उठाने वाले पुलिसकर्मी और नागरिकों की जान बचाने वाले डॉक्टर खुद असुरक्षित छतों के नीचे जीने को मजबूर हों, तो आम जनता की सुरक्षा का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है।"
— एक स्थानीय कर्मचारी (नाम गुप्त रखने की शर्त पर)
अब आगे क्या?
- बॉम्बे हाईकोर्ट द्वारा इस मामले को जनहित याचिका के रूप में स्वीकार करने के बाद नागपुर प्रशासन और संबंधित विभागों में हड़कंप मच गया है। उम्मीद की जा रही है कि अदालत के कड़े रुख के बाद अब इन जर्जर इमारतों के पुनर्निर्माण (Redevelopment) या कर्मचारियों के लिए सुरक्षित वैकल्पिक व्यवस्था पर तेजी से काम होगा।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
Q1. बॉम्बे हाईकोर्ट ने किस मामले में स्वतः संज्ञान लिया है?
- Ans. बॉम्बे हाईकोर्ट ने नागपुर में स्थित विभिन्न सरकारी विभागों की जर्जर और बदहाल कॉलोनियों, जहां कर्मचारी जान जोखिम में डालकर रह रहे हैं, उसपर छपी खबर का स्वतः संज्ञान लिया है।
Q2. इस मामले में अदालत ने किन्हें नियुक्त किया है?
- Ans. अदालत ने इस जनहित याचिका में सहयोग के लिए अधिवक्ता आस्था शर्मा और अधिवक्ता धनश्री नागुलकर को 'अदालत मित्र' (Amicus Curiae) नियुक्त किया है।
Q3. किन-किन विभागों के कर्मचारियों की कॉलोनियां इस समस्या से जूझ रही हैं?
- Ans. पुलिस, एसटी महामंडल, वन विभाग, चिकित्सा विभाग, बीएसएनएल, रेलवे, डाक विभाग और विश्वविद्यालय सहित कई अन्य विभागों की कॉलोनियां इस गंभीर समस्या की चपेट में हैं।