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वाराणसी में सड़क हादसे के घायलों को राहत देने वाली योजना के आंकड़े गायब

वाराणसी में सड़क हादसे के घायलों को राहत देने वाली योजना के आंकड़े गायब

क्या आपने कभी सोचा है कि सड़क पर खून से लथपथ तड़पते किसी इंसान को बचाने के लिए शासन-प्रशासन द्वारा बनाई गई योजनाएं कागजों से निकलकर असलियत में कहां तक पहुंचती हैं? अगर आप वाराणसी में रहते हैं, तो यह सवाल आपके लिए और भी ज्यादा डराने वाला हो सकता है। पूर्वांचल के सबसे बड़े चिकित्सा केंद्र माने जाने वाले वाराणसी में सड़क हादसों के पीड़ितों को फौरी राहत और मुआवजा देने के दावों की पोल अब खुद सरकारी फाइलों के गायब होने से खुल रही है।

सड़क हादसों का बढ़ता ग्राफ और सिस्टम की सुस्ती

काशी की तंग गलियों से लेकर रिंग रोड और नेशनल हाईवे तक, आए दिन तेज रफ्तार वाहन किसी न किसी की जिंदगी लील लेते हैं। आंकड़े गवाही देते हैं कि त्योहारों के इस सीजन में या सामान्य दिनों में भी सड़क दुर्घटनाओं का ग्राफ लगातार ऊपर की ओर ही गया है। ऐसे में सरकार की ओर से यह बड़ा दावा किया जाता है कि दुर्घटना के शिकार लोगों या उनके परिवारों को आर्थिक सहायता, कैशलेस इलाज और अन्य कल्याणकारी योजनाओं का लाभ तुरंत मिलेगा।

लेकिन ज़मीनी हकीकत इन दावों के बिल्कुल विपरीत नजर आती है। जब हाल ही में इस बात की पड़ताल की गई कि पिछले कुछ महीनों में कितने सड़क हादसों के पीड़ितों को राहत पहुंचाई गई है, तो जिम्मेदार विभागों के पास इसका कोई पुख्ता जवाब नहीं था। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि मुख्य योजनाओं से जुड़े आंकड़े या तो गायब हैं या फिर उन्हें मैनेज करने वाले अधिकारी संतोषजनक जवाब देने से बचते नजर आ रहे हैं।

कहां गायब हो जाते हैं राहत राशि के आंकड़े?

हर साल सड़क सुरक्षा माह, जागरूकता अभियान और तमाम बैठकों पर लाखों-करोड़ों रुपये पानी की तरह बहाए जाते हैं। जिला प्रशासन से लेकर परिवहन विभाग और स्वास्थ्य विभाग तक, सभी महकमे अपनी पीठ थपथपाते नहीं थकते कि उन्होंने हादसों में कमी लाने और पीड़ितों की मदद करने के लिए अद्भुत काम किया है।

  • पारदर्शिता की कमी: आरटीआई (RTI) या सामान्य पूछताछ में भी जब घायलों को मिलने वाली सहायता का लेखा-जोखा मांगा जाता है, तो फाइलों के इधर-उधर होने का बहाना बना दिया जाता है।
  • समन्वय का अभाव: पुलिस विभाग, अस्पताल और परिवहन विभाग के बीच डेटा शेयरिंग का कोई मजबूत रियल-टाइम मेकैनिज्म नजर नहीं आता।
  • पीड़ितों की लाचारी: अधिकांश गरीब परिवार कानूनी और प्रशासनिक पेचीदगियों के चलते मुआवजा पाने की दौड़ में थककर बैठ जाते हैं, और सिस्टम इसी चुप्पी का फायदा उठाता है।

अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर उठ रहे बड़े सवाल

वाराणसी जैसे हाई-प्रोफाइल और वीवीआईपी शहर में यदि प्रशासनिक योजनाओं के आंकड़े गायब हो रहे हैं, तो यह सीधे तौर पर प्रशासनिक लापरवाही की ओर इशारा करता है। स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ताओं और सड़क सुरक्षा के क्षेत्र में काम करने वाले विशेषज्ञों का कहना है कि जब तक घायलों की सही मॉनिटरिंग और डेटाबेस तैयार नहीं होगा, तब तक किसी भी योजना का धरातल पर उतरना नामुमकिन है।

"सड़क हादसे के बाद का पहला एक घंटा 'गोल्डन ऑवर' कहलाता है। इस दौरान अगर मरीज को सही इलाज और अस्पताल में आर्थिक सुरक्षा का भरोसा मिल जाए, तो कई जानें बचाई जा सकती हैं। लेकिन आंकड़ों की बाजीगरी में असली पीड़ित पीछे छूट जाते हैं।" - एक स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ता

आम जनता के लिए क्या है सबक?

इस पूरे घटनाक्रम से यह साफ हो जाता है कि केवल बड़ी घोषणाओं और विज्ञापनों से सड़क हादसों के पीड़ितों का जीवन आसान नहीं होने वाला है। जरूरत इस बात की है कि सरकार और स्थानीय प्रशासन पूरी पारदर्शिता बरते। यदि आप या आपका कोई जानने वाला सड़क दुर्घटना का शिकार होता है, तो पुलिस एफआईआर और अस्पताल के दस्तावेजों को बेहद संभाल कर रखें, क्योंकि सरकारी सिस्टम की सुस्ती के बीच यही कागजात आपके अधिकार की लड़ाई लड़ेंगे।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

Q1: सड़क हादसे के बाद घायलों को तुरंत क्या मदद मिलनी चाहिए?

नियमों के मुताबिक, दुर्घटना के तुरंत बाद घायल को नजदीकी अस्पताल पहुंचाना और 'गोल्डन ऑवर' में उसे प्राथमिक और कैशलेस चिकित्सा उपलब्ध कराना प्रशासन की प्राथमिकता होनी चाहिए।

Q2: वाराणसी में राहत योजनाओं के आंकड़े क्यों नहीं मिल पा रहे हैं?

विभिन्न विभागों (परिवहन, पुलिस और स्वास्थ्य) के बीच आपसी समन्वय की कमी और डेटा डिजिटाइजेशन में लापरवाही के कारण सटीक आंकड़े सामने नहीं आ पा रहे हैं।

Q3: सड़क दुर्घटना पीड़ित मुआवजे के लिए कहां संपर्क कर सकते हैं?

पीड़ित या उनके परिजन जिला परिवहन कार्यालय, मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण (MACT) या जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (DLSA) से संपर्क कर सकते हैं।

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रिपोर्टर: Kavya Tripathi

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