अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के पटल पर भारत ने एक बार फिर अपनी मजबूत और अडिग स्थिति का लोहा मनवाया है। हाल ही में जारी हुए ब्रिक्स (BRICS) देशों के साझा घोषणापत्र में भारत के खिलाफ हुए कायराना पहलगाम आतंकी हमले की अत्यंत कड़े शब्दों में निंदा की गई है। इस घटनाक्रम को भारत की विदेश नीति के लिहाज से एक बहुत बड़ी कूटनीतिक जीत के तौर पर देखा जा रहा है। दशकों से सीमा पार आतंकवाद को लेकर भारत जो वैश्विक मंचों पर अपनी बात रखता आया है, अब उस पर दुनिया के प्रमुख देशों की मुहर लगती हुई साफ दिखाई दे रही है।
ब्रिक्स घोषणापत्र में क्या है खास?
ब्रिक्स समूह के इस ताज़ा घोषणापत्र में आतंकवाद के खिलाफ शून्य सहिष्णुता (Zero Tolerance) की नीति को दोहराया गया है। सदस्य देशों ने एक स्वर में यह स्वीकार किया है कि आतंकवाद मानवता के लिए सबसे बड़ा खतरा है और इसके किसी भी रूप या कृत्य को उचित नहीं ठहराया जा सकता।
विशेष रूप से पहलगाम में हुए आतंकी हमले का जिक्र आने और उसकी स्पष्ट रूप से भर्त्सना किए जाने से यह साबित हो गया है कि आतंकवाद के मुद्दे पर अब वैश्विक समुदाय दोहरे मानदंडों को त्यागने लगा है। इस प्रस्ताव ने स्पष्ट कर दिया है कि दुनिया के बड़े देश अब आतंकवाद के प्रायोजकों को बचाने की स्थिति में नहीं हैं।भारत की दशकों पुरानी दलील को मिला वैश्विक समर्थन
नब्बे के दशक से लेकर आज तक, भारत लगातार विश्व मंचों पर यह कहता आया है कि आतंकवाद और बातचीत एक साथ नहीं चल सकते। भारत ने हमेशा इस बात पर जोर दिया है कि आतंकवाद किसी एक देश की समस्या नहीं बल्कि पूरी मानव सभ्यता के लिए नासूर है।
- आतंकवाद के खिलाफ एकजुटता: ब्रिक्स जैसे प्रभावशाली मंच पर इस तरह की सहमति बनना यह दर्शाता है कि आतंकवाद के खात्मे के लिए वैश्विक धुरी अब भारत के रुख के इर्द-गिर्द घूम रही है।
- कूटनीतिक अलगाव: सीमा पार से संचालित होने वाली आतंकी गतिविधियों को लेकर अब पड़ोसी मुल्क का कूटनीतिक अलगाव तय माना जा रहा है।
- वैश्विक मंचों का उपयोग: भारत ने अपनी कूटनीतिक परिपक्वता का परिचय देते हुए बहुपक्षीय मंचों का उपयोग अपने राष्ट्रीय हितों और सुरक्षा के पक्ष में सफलतापूर्वक किया है।
पाकिस्तान का पूरी तरह से बेनकाब होना
इस घोषणापत्र के सामने आने के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान का प्रोपेगेंडा पूरी तरह से ध्वस्त हो गया है। लंबे समय से आतंकवाद को अपनी विदेश नीति का हथियार बनाने वाला देश अब इस साझा बयान के बाद अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति के कटघरे में आ खड़ा हुआ है।
विशेषज्ञों का मानना है कि जब ब्रिक्स जैसे बड़े समूह—जिसमें दुनिया की उभरती हुई और मजबूत अर्थव्यवस्थाएं शामिल हैं—वे आतंकवाद के इस विशिष्ट प्रकरण पर खुलकर बोलते हैं, तो इसका संदेश बहुत दूर तक जाता है। इससे फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (FATF) जैसे संगठनों के जरिए भी ऐसे देशों पर नकेल कसने में मदद मिलती है जो आतंकियों को पनाह देते हैं।
सुरक्षा और कूटनीति के मोर्चे पर भारत का बढ़ता कद
पिछले कुछ वर्षों में भारत की आर्थिक और सामरिक ताकत में भारी इजाफा हुआ है। आज भारत ग्लोबल साउथ (Global South) की आवाज बनकर उभरा है। यही वजह है कि जब भारत किसी मंच पर अपनी आंतरिक सुरक्षा और आतंकवाद का मुद्दा उठाता है, तो उसे नजरअंदाज करना किसी भी देश के लिए संभव नहीं होता।
पहलगाम हमले के बाद सरकार ने जिस संयम, दृढ़ता और कूटनीतिक आक्रामकता के साथ वैश्विक समुदाय को लामबंद किया है, उसने यह दिखा दिया है कि नया भारत अपनी सुरक्षा से समझौता नहीं करता और आतंकवाद को उसके ही घर में घुसकर जवाब देने की ताकत के साथ-साथ कूटनीतिक रूप से हराने का माद्दा भी रखता है।
आगे की राह और वैश्विक प्रभाव
यह घोषणापत्र केवल शब्दों का दस्तावेज नहीं है, बल्कि यह आने वाले समय की भू-राजनीतिक (Geopolitical) दिशा तय करने वाला एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। आतंकवाद के खिलाफ इस वैश्विक एकजुटता से भारत के उन प्रयासों को और मजबूती मिलेगी जिनके तहत वह अंतरराष्ट्रीय संधियों के जरिए आतंकवादियों और उनके मददगारों पर प्रतिबंध लगवाने की मांग करता रहा है।
देश की आम जनता और सुरक्षा विश्लेषकों ने इस कूटनीतिक सफलता का स्वागत किया है। यह इस बात का प्रमाण है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत की विदेश नीति अब रक्षात्मक (Defensive) नहीं, बल्कि आक्रामक और परिणाम-उन्मुख (Result-oriented) हो चुकी है, जिसके दूरगामी परिणाम पूरी दुनिया में देखने को मिल रहे हैं।