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छठ पूजा का सिनेमाई सफर: साल 1961 की इस फिल्म ने पहली बार बड़े पर्दे पर दिखाया था लोक आस्था का महापर्व

छठ पूजा का सिनेमाई सफर: साल 1961 की इस फिल्म ने पहली बार बड़े पर्दे पर दिखाया था लोक आस्था का महापर्व

लोक आस्था और सूर्य उपासना के महापर्व छठ की गूंज आज सिर्फ देश ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में सुनाई देती है। नहाय-खาย से शुरू होने वाले इस चार दिवसीय अनुष्ठान के दौरान गूंजने वाले पारंपरिक गीत हर किसी को मंत्रमुग्ध कर देते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि जिस छठ पूजा को आज हम सिनेमाघरों, टेलीविजन और सोशल मीडिया पर भव्यता के साथ देखते हैं, उसे पहली बार बड़े पर्दे पर कब और किसने उतारा था? आज के इस डिजिटल दौर में जब हर एक रीति-रिवाज पर खुलकर बात होती है, तब यह जानना बेहद दिलचस्प है कि भारतीय सिनेमा के शुरुआती दौर में इस लोक पर्व को कैसे जगह मिली थी।

साल 1961: जब सिनेमाघरों में गूंजी थी छठ की पहली धुन

बात साल 1961 की है। भारतीय सिनेमा में तब क्षेत्रीय भाषाओं और संस्कृति को मुख्यधारा से जोड़ने के प्रयास तेजी से हो रहे थे। इसी कड़ी में एक फिल्म रिलीज हुई थी जिसका नाम था 'भैया'। यह फिल्म भारतीय सिनेमा के इतिहास में एक मील का पत्थर साबित हुई, क्योंकि इसी ने सबसे पहले पर्दे पर उस सांस्कृतिक दृश्य को उतारा जिसे बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश के करोड़ों लोग अपनी पलकों पर बिठाते हैं। फिल्म 'भैया' में पहली बार छठ पूजा के दृश्यों को बेहद जीवंत और मार्मिक तरीके से फिल्माया गया था, जिसने सिनेमाप्रेमियों का दिल जीत लिया था।

उस दौर में जब तकनीकी संसाधन आज की तरह अत्याधुनिक नहीं थे, तब इस फिल्म के निर्माताओं ने लोक संस्कृति की खुशबू को सिल्वर स्क्रीन पर उतारने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। फिल्म के जरिए देश के बाकी हिस्सों के लोगों को भी यह पता चला कि छठी मइया की आराधना का यह पर्व कितना पवित्र, अनुशासित और भव्य होता है।

दिग्गज गायकों की आवाज़ ने गीतों को बनाया अमर

किसी भी फिल्म की सफलता में उसके संगीत की बड़ी भूमिका होती है, और 'भैया' (1961) के मामले में तो यह बात शत-प्रतिशत सच साबित होती है। इस फिल्म के गानों को सजाने के लिए उस दौर के सबसे बड़े और प्रतिष्ठित पार्श्व गायकों को चुना गया था। स्वर कोकिला लता मंगेशकर और संगीत के सरताज मोहम्मद रफी जैसी महान हस्तियों ने इस फिल्म के लिए अपनी आवाज़ दी थी।

जब लता मंगेशकर और मोहम्मद रफी की सुरीली आवाज़ में छठ और लोक संस्कृति से जुड़े गीत पर्दे पर गूंजे, तो सिनेमाघरों में बैठे दर्शक भावुक हो गए। संगीतकारों ने पारंपरिक धुनों और शास्त्रीय संगीत का ऐसा अद्भुत मिश्रण तैयार किया था कि सुनने वाले आज भी उन धुनों की तारीफ करते नहीं थकते। इन गीतों ने न केवल फिल्म को सुपरहिट बनाया, बल्कि छठ पर्व के संगीत को एक अलग ही ऊंचाई पर पहुंचा दिया।

लोक संस्कृति और सिनेमा का अनूठा संगम

सिनेमा समाज का आईना होता है, और साल 1961 की फिल्म 'भैया' ने इस कहावत को बिल्कुल सही साबित किया। उस समय जब हिंदी और अन्य क्षेत्रीय फिल्मों में शहरी संस्कृतियों का बोलबाला हुआ करता था, तब इस फिल्म ने ग्रामीण भारत की जड़ों, उसकी परंपराओं और आस्था को मुख्यधारा के सिनेमा के पटल पर लाकर खड़ा कर दिया।

  • पहली बार फिल्मांकन: छठ पूजा की विधियों और उदीयमान-अस्तगामी सूर्य को अर्घ्य देने के दृश्यों का पहला सिनेमाई प्रदर्शन।
  • दिग्गज कलाकारों का योगदान: देश के शीर्ष गायकों द्वारा लोक गीतों को शास्त्रीय और आधुनिक संगीत के दायरे में पिरोना।
  • सांस्कृतिक विस्तार: इस फिल्म के जरिए देश के अन्य राज्यों के लोगों को भी छठ पर्व के महत्व और उसकी दिव्यता के बारे में पता चला।

आज के दौर में कैसे बदला है छठ का सिनेमाई स्वरूप

समय के साथ तकनीक बदली है, और उसके साथ ही छठ पर्व को देखने और दिखाने का नजरिया भी बदला है। आज के समय में हर साल छठ के मौके पर नए-नए गाने रिलीज होते हैं, जिन्हें करोड़ों व्यूज मिलते हैं। भोजपुरी सिनेमा से लेकर बॉलीवुड तक, हर कोई इस लोक पर्व की महिमा को अपने तरीके से भुना रहा है और अपनी कला के माध्यम से छठी मइया को नमन कर रहा है।

लेकिन इन सबके बीच, साल 1961 में आई फिल्म 'भैया' का योगदान हमेशा स्वर्णिम अक्षरों में लिखा जाएगा। इस फिल्म ने वह नींव रखी थी जिस पर आज आधुनिक लोक संगीत और संस्कृति आधारित सिनेमा की भव्य इमारत खड़ी है।

निष्कर्ष

आज जब हम साल 2026 में खड़े होकर छठ पूजा के वैश्विक स्वरूप को देखते हैं, तो हमें उन दूरदर्शी फिल्ममेकर्स और कलाकारों को याद करना जरूरी हो जाता है जिन्होंने साठ के दशक में ही इस संस्कृति की ताकत को पहचान लिया था। फिल्म 'भैया' सिर्फ एक फिल्म नहीं थी, बल्कि यह हमारी उस सांस्कृतिक विरासत का दस्तावेज थी जिसे आने वाली पीढ़ियों के लिए सहेज कर रखना बेहद जरूरी है। लता जी और रफी साहब की आवाज में गूंजे वे गीत आज भी हमारी स्मृतियों में ताजा हैं और हमें हमारी मिट्टी से जोड़े रखते हैं।

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रोली सिंह

रोली सिंह

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रोली सिंह पिछले 2 सालों से पत्रकारिता और न्यूज़ रिपोर्टिंग से जुड़ी हैं। वह लोकल न्यूज़ और लोगों से जुड़े मुद्दों को पढ़ने वालों तक पहुंचाने का काम...

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