लाल सागर का बढ़ता तनाव और वैश्विक कूटनीति
मध्य-पूर्व की भू-राजनीति में एक बार फिर बड़ा फेरबदल देखने को मिल रहा है। वैश्विक व्यापार के लिए धमनी कहे जाने वाले लाल सागर में हूती विद्रोहियों के लगातार हमलों ने दुनिया भर की सरकारों की नींद उड़ा रखी है। इसी बीच, कूटनीतिक मोर्चे पर एक दिलचस्प और महत्वपूर्ण घटनाक्रम सामने आया है। सऊदी अरब की सीधी अपील के बाद अब ड्रैगन यानी चीन ने ईरान पर कड़ा दबाव बनाना शुरू कर दिया है ताकि इन हमलों पर लगाम लगाई जा सके।
साल 2026 के इस दौर में अंतरराष्ट्रीय व्यापार और समुद्री सुरक्षा सबसे बड़ा मुद्दा बन गई है। पश्चिमी देशों की तमाम कोशिशों के बावजूद जब हूती विद्रोहियों के तेवर नरम नहीं पड़े, तो खाड़ी देशों ने अपने स्तर पर नए कूटनीतिक विकल्प तलाशने शुरू किए। सऊदी अरब के इस कदम ने साबित कर दिया है कि क्षेत्रीय स्थिरता के लिए बीजिंग और तेहरान के बीच की बातचीत अब कितनी अहम हो चुकी है।
सऊदी अरब की अपील और बीजिंग का दखल
विश्लेषकों का मानना है कि सऊदी अरब और ईरान के बीच हाल के वर्षों में भले ही कूटनीतिक संबंध बहाल हुए हों, लेकिन यमन के मोर्चे पर स्थिति अभी भी जटिल बनी हुई है। हूती विद्रोहियों को मिलने वाले वैचारिक और रणनीतिक समर्थन के तार सीधे तौर पर तेहरान से जुड़े माने जाते हैं। जब लाल सागर और अदन की खाड़ी में कमर्शियल जहाजों पर मिसाइल और ड्रोन हमले बढ़ने लगे, तो इसका सीधा असर सऊदी अरब की आर्थिक प्राथमिकताओं और 'विजन 2030' पर पड़ने लगा।
रियाद ने इस संकट से निपटने के लिए पारंपरिक पश्चिमी सहयोगियों के साथ-साथ चीन से भी सीधा संपर्क साधा। चीन के ईरान के साथ गहरे आर्थिक और रणनीतिक संबंध हैं, जिसका फायदा उठाते हुए रियाद ने बीजिंग से हस्तक्षेप करने का अनुरोध किया। बीजिंग के लिए यह एक बड़ी परीक्षा है, क्योंकि एक तरफ उसके अपने व्यापारिक हित लाल सागर के रास्ते सुरक्षित आवाजाही पर निर्भर हैं, तो दूसरी तरफ ईरान के साथ उसका ऊर्जा व्यापार भी बहुत महत्वपूर्ण है।
चीन के पास क्यों है ईरान को साधने की क्षमता?
अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकारों का कहना है कि चीन आज की तारीख में ग्लोबल साउथ का एक ऐसा अगुआ बनना चाहता है जो मध्य-पूर्व में शांति स्थापित करने की क्षमता रखता हो। पिछले साल बीजिंग की मध्यस्थता में ही सऊदी अरब और ईरान के बीच ऐतिहासिक समझौता हुआ था। इसी वजह से रियाद को उम्मीद है कि चीन अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर तेहरान को यह समझा सकता है कि क्षेत्र में अस्थिरता किसी के भी हित में नहीं है।
- ऊर्जा सुरक्षा: चीन अपनी कुल ऊर्जा जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से आयात करता है। लाल सागर में रुकावट का सीधा असर चीन की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।
- वैश्विक छवि: बीजिंग खुद को एक जिम्मेदार वैश्विक महाशक्ति के रूप में पेश करना चाहता है जो अमेरिकी प्रभुत्व के बिना भी संकटों का समाधान कर सके।
- आर्थिक गलियारे: समुद्री रास्तों के असुरक्षित होने से चीन की महत्वकांक्षी परियोजनाओं को भी तगड़ा झटका लग रहा है।
ईरान और हूती विद्रोहियों का रुख
दूसरी तरफ, तेहरान पर यह दबाव कितना असरदार साबित होगा, यह आने वाला वक्त ही बताएगा। ईरान आधिकारिक तौर पर हमेशा से यही कहता आया है कि हूती विद्रोही अपने फैसले खुद लेते हैं और वे गाजा के समर्थन में अपनी कार्रवाई कर रहे हैं। हालांकि, खुफिया रिपोर्टों और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर यह जगजाहिर है कि हूती बलों को हथियार, तकनीक और रसद संबंधी सहायता कहाँ से मिलती है।
चीन की तरफ से मिले संदेश के बाद ईरानी कूटनीति के गलियारों में हलचल तेज हो गई है। तेहरान यह अच्छी तरह समझता है कि चीन के साथ उसके आर्थिक संबंध कितने नाजुक दौर में हैं। अमेरिकी प्रतिबंधों के बीच चीनी बाजार ही ईरानी तेल का सबसे बड़ा खरीदार है। ऐसे में बीजिंग की नाराजगी मोल लेना ईरान के लिए आर्थिक रूप से भारी पड़ सकता है।
वैश्विक व्यापार पर पड़ रहा है भारी असर
लाल सागर के इस संकट ने पूरी दुनिया की सप्लाई चेन को बुरी तरह प्रभावित किया है। जहाजों को अफ्रीका के केप ऑफ गुड होप का लंबा चक्कर काटकर यूरोप और एशिया के बीच आना-जाना पड़ रहा है। इससे माल ढुलाई की लागत (Freight Cost) में बेतहाशा वृद्धि हुई है और मुद्रास्फीति ने दुनिया भर के बाजारों को जकड़ लिया है।
भारत और अन्य एशियाई देशों के लिए भी यह चिंता का विषय है क्योंकि यूरोपीय बाजार में उनके निर्यात की लागत बढ़ गई है। यही कारण है कि केवल सऊदी अरब ही नहीं, बल्कि कई अन्य एशियाई और यूरोपीय देश भी चाहते हैं कि कूटनीतिक माध्यमों से इस रास्ते को जल्द से जल्द पूरी तरह सुरक्षित किया जाए।
निष्कर्ष और भविष्य की उम्मीदें
यह पूरा घटनाक्रम इस बात का गवाह है कि अब आधुनिक दुनिया में सुरक्षा के समीकरण बदल रहे हैं। पश्चिमी देशों की सैन्य कार्रवाई के बजाय अब क्षेत्रीय ताकतों और महाशक्तियों के बीच बैक-चैनल कूटनीति (Back-channel diplomacy) को ज्यादा तरजीह दी जा रही है।
यदि चीन का यह कूटनीतिक दबाव काम आता है और ईरान हूती विद्रोहियों को नियंत्रित करने के लिए राजी होता है, तो यह मध्य-पूर्व की राजनीति में बीजिंग की एक बड़ी कूटनीतिक जीत होगी। साथ ही, लाल सागर के रास्ते अंतर्राष्ट्रीय व्यापार फिर से पटरी पर लौट सकेगा, जिससे वैश्विक अर्थव्यवस्था को बड़ी राहत मिलेगी। आने वाले कुछ सप्ताह इस लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण होने वाले हैं कि बीजिंग और तेहरान के बीच इन बैठकों के क्या परिणाम सामने आते हैं।