राजधानी भोपाल की सड़कों पर आज सियासत का पारा अपने चरम पर नजर आया। मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर (SIR) की प्रक्रिया के विरोध में कांग्रेस पार्टी ने आक्रामक रुख अख्तियार कर लिया है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी के नेतृत्व में हजारों की संख्या में पार्टी कार्यकर्ता और नेता मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी (CEO) कार्यालय का घेराव करने के लिए सड़कों पर उतर आए। इस दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच तीखी झड़प देखने को मिली, जिसने कुछ ही देर में उग्र रूप ले लिया।
बैरिकेड्स पर चढ़े कार्यकर्ता, पुलिस ने किया वाटर कैनन का इस्तेमाल
प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए प्रशासन ने पहले से ही सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए थे और कई स्थानों पर लोहे के मजबूत बैरिकेड्स लगाए गए थे। हालांकि, जोश से लबरेज कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने इन सुरक्षा घेरों को तोड़ने की कोशिश की। कई कार्यकर्ता तो सीधे बैरिकेड्स पर ही जा चढ़े और सरकार तथा चुनाव आयोग के खिलाफ जोरदार नारेबाजी करने लगे।
स्थिति को बेकाबू होता देख पुलिस ने बल प्रयोग करने का निर्णय लिया। उग्र भीड़ को तितर-बितर करने और आगे बढ़ने से रोकने के लिए पुलिस ने वाटर कैनन (पानी की बौछार) का इस्तेमाल किया। ठंडे पानी की तेज बौछारों के बावजूद कार्यकर्ताओं का हौसला कम नहीं हुआ और वे लगातार विरोध प्रदर्शन जारी रखे रहे।
जीतू पटवारी और उमंग सिंघार का अनोखा विरोध प्रदर्शन
इस बार कांग्रेस ने विरोध जताने के लिए एक बेहद अनूठा और राजनीतिक रूप से सांकेतिक तरीका चुना। प्रदर्शन स्थल पर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का मुखौटा पहना हुआ एक कार्यकर्ता आकर्षण का केंद्र बना रहा, जिसे जंजीरों में जकड़ा हुआ दिखाया गया था। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी और विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार खुद उस कार्यकर्ता को जंजीरों से पकड़े हुए नजर आए। इस अनोखे प्रदर्शन के जरिए कांग्रेस ने चुनाव आयोग की स्वायत्तता और एसआईआर प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े किए।
बस के सामने बैठे कार्यकर्ता, मौके पर बनी रही खींचतान
हंगामा बढ़ने के बाद पुलिस ने स्थिति पर नियंत्रण पाने के लिए प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी समेत कई प्रमुख नेताओं और कार्यकर्ताओं को हिरासत में लेना शुरू किया। पुलिस उन्हें जबरन बस में बैठाकर मौके से ले जाने का प्रयास कर रही थी। जैसे ही यह बात अन्य कार्यकर्ताओं को पता चली, उन्होंने इसका कड़ा विरोध किया और बड़ी संख्या में लोग पुलिस बस के सामने आकर बैठ गए।
कार्यकर्ताओं के इस कड़े विरोध के आगे पुलिस को झुकना पड़ा और इसी खींचतान के बीच जीतू पटवारी बस से नीचे उतर आए। वे एक बार फिर सीधे तौर पर प्रदर्शन में शामिल हो गए। इस हाई-वोल्टेज ड्रामे के दौरान काफी देर तक पुलिस और कांग्रेस कार्यकर्ताओं के बीच छीनाझपटी और खींचतान का माहौल बना रहा।
मीडिया रिपोर्ट के खुलासे के बाद गरमाई सियासत
मध्य प्रदेश में कांग्रेस का यह उग्र प्रदर्शन अचानक नहीं उपजा है, बल्कि इसके पीछे राष्ट्रीय स्तर पर सामने आई एक मीडिया रिपोर्ट का बड़ा हाथ है। बीते 23 सितंबर को एक प्रतिष्ठित मीडिया हाउस की ओर से एक सनसनीखेज जांच रिपोर्ट प्रकाशित की गई थी। इस रिपोर्ट के सार्वजनिक होने के बाद से ही देश भर में चुनावी प्रक्रिया और एसआईआर को लेकर राजनीतिक सरगर्मी काफी तेज हो गई है।
रिपोर्ट में दावा किया गया था कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों के दौरान चुनावी सूचियों और एसआईआर से जुड़े फैसलों पर कड़ा ऐतराज जताया था। इन दोनों आयुक्तों ने कथित तौर पर कम से कम 14 बार अपनी लिखित आपत्तियां दर्ज कराई थीं। रिपोर्ट के मुताबिक, इन आपत्तियों में नए मतदाताओं के पंजीकरण, मतदाता सूची से नाम हटाने, पुराने नाम बहाल करने और बेहद संवेदनशील चुनावी डेटा के प्रबंधन से जुड़े गंभीर तकनीकी और प्रशासनिक मुद्दे शामिल थे।
चुनाव आयोग ने दी अपनी सफाई
विपक्ष के हमलों और मीडिया रिपोर्ट के तूल पकड़ने के बाद भारतीय निर्वाचन आयोग (ECI) ने भी चुप्पी तोड़ी और अपनी स्थिति स्पष्ट की। आयोग की ओर से एक आधिकारिक बयान जारी कर यह सफाई दी गई कि एसआईआर और उससे जुड़े सभी महत्वपूर्ण फैसले मुख्य चुनाव आयुक्त और दोनों चुनाव आयुक्तों की आपसी सहमति से ही लिए गए थे। आयोग का कहना है कि पूरी निर्णय प्रक्रिया पारदर्शी और नियमों के दायरे में रहकर पूरी की गई है।
तमाम स्पष्टीकरणों के बावजूद विपक्षी दल इस मुद्दे पर पीछे हटने को तैयार नहीं हैं। कांग्रेस का स्पष्ट मानना है कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण की यह पूरी प्रक्रिया पारदर्शिता के मानदंडों पर खरी नहीं उतरती है और इससे आम मतदाताओं के लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन होने का खतरा पैदा हो गया है।
मैदान पर राजनीतिक सरगर्मी तेज
भोपाल में मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी कार्यालय के बाहर हुए इस शक्ति प्रदर्शन ने साफ कर दिया है कि आने वाले दिनों में यह मुद्दा और अधिक तूल पकड़ने वाला है। एक तरफ जहां कांग्रेस पार्टी इसे जनता के अधिकारों की लड़ाई बता रही है, वहीं सत्तापक्ष और प्रशासन इस तरह के उग्र प्रदर्शनों से निपटने के लिए अपनी रणनीति तैयार कर रहे हैं। फिलहाल, भोपाल की सड़कों पर हुए इस हंगामे के बाद प्रशासनिक हलकों में भी सुरक्षा व्यवस्था को लेकर समीक्षा बैठकों का दौर शुरू हो गया है।