वैश्विक बाजार में भू-राजनीतिक उथल-पुथल का असर एक बार फिर आम आदमी की जेब पर पड़ने के पूरे आसार नजर आ रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल यानी क्रूड ऑइल (Crude Oil) की कीमतों में बेकाबू तेजी देखने को मिल रही है। ताजा आंकड़ों के मुताबिक, ब्रेंट क्रूड (Brent Crude) की कीमत 108 डॉलर प्रति बैरल के मनोवैज्ञानिक आंकड़े को पार कर गई है। पिछले कुछ महीनों में यह पहला मौका है जब तेल के दाम इस उच्च स्तर पर पहुंचे हैं।
इस अचानक आई तेजी के पीछे कई बड़े और गंभीर कारण छिपे हैं। दुनिया के दो शक्तिशाली देशों के बीच सुलग रही जंग की आग और पश्चिम एशिया में गहराते सुरक्षा संकट ने ऊर्जा बाजार को झकझोर कर रख दिया है। आइए विस्तार से जानते हैं कि आखिर क्यों अचानक क्रूड ऑइल के दाम आसमान छूने लगे हैं और इसका वैश्विक अर्थव्यवस्था के साथ-साथ भारत पर क्या प्रभाव पड़ेगा।
अमेरिका और ईरान के बीच चरम पर पहुंचा तनाव
कच्चे तेल की कीमतों में आई इस ऐतिहासिक उछाल के केंद्र में अमेरिका और ईरान के बीच चल रहा गंभीर टकराव है। दोनों देशों के बीच लंबे समय से चली आ रही तनातनी अब एक नए और खतरनाक मोड़ पर पहुंच चुकी है। हाल ही में एक बड़ी घटनाक्रम के तहत, ईरान ने अमेरिकी सैन्य कार्रवाइयों के जवाब में जॉर्डन में स्थित अमेरिकी ठिकानों और युद्धपोतों को निशाना बनाकर मिसाइलें दागी हैं।
इस सैन्य कार्रवाई के बाद मध्य पूर्व में युद्ध के बादल और ज्यादा घने हो गए हैं। कूटनीतिक हलकों में इस बात की आशंका जताई जा रही है कि यह संघर्ष आने वाले दिनों में और अधिक विकराल रूप ले सकता है। अमेरिकी राजनीतिक गलियारों से आ रहे बयानों के अनुसार, इस गतिरोध के जल्दी थमने के कोई आसार नजर नहीं आ रहे हैं, जिससे वैश्विक ऊर्जा बाजार में अनिश्चितता का माहौल और गहरा गया है।
सऊदी अरब में तेल उत्पादन में आई भारी गिरावट
इस संकट को और हवा मिल रही है दुनिया के सबसे बड़े तेल निर्यातक देशों में शुमार सऊदी अरब से। हाल ही में सऊदी अरब के तेल उत्पादन में भारी गिरावट दर्ज की गई है, जो इस साल के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया है। इसके पीछे क्षेत्रीय सुरक्षा और हूती विद्रोहियों की धमकियों का बड़ा हाथ है।
हूती विद्रोहियों ने खुले तौर पर चेतावनी दी है कि वे सऊदी अरब के पश्चिमी बंदरगाहों और समुद्री मार्गों से गुजरने वाले हर ऑयल टैंकर को निशाना बनाएंगे। समुद्री सुरक्षा के मोर्चे पर पैदा हुए इस गंभीर खतरे के कारण तेल की सप्लाई चेन बुरी तरह प्रभावित हुई है। इसके अलावा, दुनिया के सबसे बड़े ऊर्जा आयातक चीन ने भी अंतरराष्ट्रीय बाजार में एक बार फिर से अपनी खरीद बढ़ा दी है, जिससे मांग और आपूर्ति का संतुलन बिगड़ गया है और कीमतें तेजी से ऊपर भाग रही हैं।
भारत की अर्थव्यवस्था पर क्या होगा इसका असर?
अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड ऑइल की इन बढ़ती कीमतों का सीधा असर भारत जैसे विकासशील देशों पर पड़ना तय है। भारत अपनी कुल ऊर्जा और ईंधन की जरूरतों का लगभग 85 प्रतिशत हिस्सा आयात (Import) करता है। ऐसे में वैश्विक स्तर पर कच्चा तेल महंगा होने का मतलब है कि देश का कुल आयात बिल (Import Bill) भारी मात्रा में बढ़ जाएगा।
अगर आने वाले हफ्तों में क्रूड ऑइल इसी ऊंचे पायदान पर बना रहता है, तो इसका असर घरेलू बाजार में भी देखने को मिल सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि स्थिति में सुधार नहीं हुआ, तो देश की तेल विपणन कंपनियां (Oil Marketing Companies) पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों में संशोधन करने के लिए मजबूर हो सकती हैं। ईंधन महंगा होने से परिवहन लागत बढ़ेगी, जिसका सीधा असर रोजमर्रा की खाने-पीने की चीजों और अन्य उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतों पर पड़ेगा।
आम आदमी की जेब पर बढ़ सकता है बोझ
महंगे कच्चे तेल का प्रभाव केवल पेट्रोल और डीजल तक ही सीमित नहीं रहता है। इसका असर सीएनजी (CNG), पीएनजी (PNG) और औद्योगिक उपयोग में आने वाली गैसों पर भी पड़ता है। यदि आयातित गैस की कीमतें बढ़ती हैं, तो घरेलू गैस उपभोक्ताओं को भी अधिक भुगतान करना पड़ सकता है।
- महंगाई का जोखिम: परिवहन और लॉजिस्टिक्स महंगे होने से हर प्रकार की वस्तुएं महंगी हो जाती हैं।
- व्यापार घाटा: आयात बिल बढ़ने से देश के विदेशी मुद्रा भंडार और राजकोषीय घाटे पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है।
- औद्योगिक उत्पादन: ऊर्जा की लागत बढ़ने से उद्योगों का उत्पादन खर्च बढ़ जाता है, जिससे आर्थिक वृद्धि की रफ्तार सुस्त हो सकती है।
आगे क्या हो सकता है?
फिलहाल पूरी दुनिया की नजरें पश्चिम एशिया के घटनाक्रम और कूटनीतिक बैठकों पर टिकी हुई हैं। जब तक अमेरिका और ईरान के बीच का सैन्य तनाव कम नहीं होता और समुद्री मार्गों पर तेल के जहाजों की आवाजाही सुरक्षित नहीं होती, तब तक ऊर्जा बाजारों में स्थिरता लौटने की उम्मीद बेहद कम है। भारत सरकार और नीति निर्माता भी इस स्थिति पर पैनी नजर बनाए हुए हैं ताकि देश की ऊर्जा सुरक्षा को किसी भी बड़े झटके से बचाया जा सके।
आने वाले दिन वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण होने वाले हैं। यदि कच्चे तेल के दाम इसी तरह बढ़ते रहे, तो सरकारों और केंद्रीय बैंकों को महंगाई पर काबू पाने के लिए कड़े आर्थिक कदम उठाने पड़ सकते हैं।