राजधानी दिल्ली एक बार फिर सिस्टम की लापरवाही और इंसानी लालच के मलबे के नीचे दबी हुई नजर आ रही है। दिल्ली यूनिवर्सिटी के साउथ कैंपस के बेहद करीब स्थित सत्य निकेतन इलाके में जो हुआ, वह महज़ एक प्राकृतिक आपदा या इत्तेफाक नहीं है, बल्कि यह लालच, अनदेखी और प्रशासनिक सुस्ती का एक ऐसा खतरनाक कॉकटेल है, जिसने कई हंसते-खेलते परिवारों को हमेशा के लिए उजाड़ दिया। 50 साल पुरानी एक जर्जर इमारत का ताश के पत्तों की तरह ढह जाना और उसमें 6 बेगुनाह जिंदगियों का खत्म हो जाना कई गंभीर सवाल खड़े करता हैबेसमेंट में चल रहा था जानलेवा काम, नजरअंदाज हुई खतरे की घंटियां
रविवार दोपहर का वक्त था, जब सत्य निकेतन की गलियों में अचानक चीख-पुकार मच गई। 40 से 50 साल पुरानी उस इमारत की नींव पहले से ही कमजोर हो चुकी थी, जिसे छात्रों को रहने के लिए पीजी (पेइंग गेस्ट) हॉस्टल के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा था। हादसे के वक्त इमारत के बेसमेंट में रिपेयरिंग और मरम्मत का काम चल रहा था। हैरानी की बात यह है कि बेसमेंट में पानी भरा हुआ था, इसके बावजूद वहां निर्माण कार्य धड़ल्ले से जारी था।
जब बेसमेंट में मजदूरों की हथौड़ियां और छीनी चल रही थीं, तब ऊपर के कमरों में कई छात्र मौजूद थे। उन्हें क्या पता था कि जिस छत के नीचे वे अपने सुनहरे भविष्य के सपने बुन रहे हैं, वह कुछ ही पलों में उनके लिए कब्रगाह बन जाएगी। इस भीषण हादसे में अब तक 6 लोगों की जान जा चुकी है, जबकि 10 से अधिक लोग गंभीर रूप से घायल होकर एम्स के ट्रॉमा सेंटर में जिंदगी और मौत के बीच जंग लड़ रहे हैं। मलबे के नीचे अभी भी कई और लोगों के दबे होने की आशंका है, जिन्हें निकालने के लिए रेस्क्यू ऑपरेशन चलाया गया।
लालच का पांच मंजिला मायाजाल और नियमों की धज्जियां
प्राथमिक जांच में जो खुलासे सामने आए हैं, वे बेहद डराने वाले हैं। नियमों के मुताबिक, जो इमारतें 40-50 साल पुरानी हो चुकी हैं, उनकी लोड-बेयरिंग क्षमता बहुत कम हो जाती है। लेकिन पैसों की हवस में अंधा हो चुके मकान मालिकों ने नियमों को ताक पर रख दिया।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस पुरानी और कमजोर इमारत को तीन की बजाय अवैध रूप से पांच मंजिला तक बना दिया गया था। सवाल यह उठता है कि क्या इस गैरकानूनी निर्माण की भनक स्थानीय प्रशासन या नगर निगम को नहीं थी? अगर नक्शा केवल तीन मंजिलों का था, तो पांच मंजिलें कैसे खड़ी हो गईं? क्या किसी ने इस अवैध निर्माण के खिलाफ आवाज उठाने की जहमत क्यों नहीं उठाई?
छात्रों का हब सत्य निकेतन: सुरक्षा के नाम पर शून्य
सत्य निकेतन इलाका दिल्ली यूनिवर्सिटी के साउथ कैंपस से सटा हुआ होने के कारण हमेशा छात्रों से आबाद रहता है। यहां हज़ारों की संख्या में देश के कोने-कोने से आए युवा पीजी, फ्लैट्स और हॉस्टल में रहकर पढ़ाई करते हैं। कम जगह में ज्यादा मुनाफा कमाने की चाहत में मकान मालिक इन छात्रों की जान को हमेशा जोखिम में डालते रहते हैं।
कमरे छोटे होते हैं, वेंटीलेशन का नामोनिशान नहीं होता और फायर सेफ्टी या स्ट्रक्चरल ऑडिट जैसी चीजें तो इन इलाकों में सिर्फ कागजों तक सीमित हैं। क्या छात्रों की जिंदगी की कोई कीमत नहीं है? ज्यादा किराए के लालच में इस तरह की इमारतों को पीजी में बदल देना और नियमों को ठेंगा दिखाना अब एक आम बात बन गई है, जिस पर लगाम लगाना बेहद जरूरी हो गया है.घर बनाने और बेसमेंट के नियम: कानून क्या कहता है?
इस हादसे ने एक बार फिर राजधानी में निर्माण कार्यों के नियमों को लेकर बड़ी बहस छेड़ दी है। विशेषज्ञों का कहना है कि दिल्ली में किसी भी पुरानी या नई इमारत के नीचे बेसमेंट बनाने के लिए सख्त कानूनी प्रक्रियाओं और नगर निगम (MCD) के संशोधित बिल्डिंग प्लान की मंजूरी की आवश्यकता होती है।
- क्या बिना अनुमति बेसमेंट बनाया जा सकता है? बिल्कुल नहीं। बेसमेंट खोदने से पहले स्ट्रक्चरल इंजीनियर से सटीकता की जांच करानी होती है।
- अवैध बेसमेंट पर क्या कार्रवाई होती है? नियमों के अनुसार इसे सील किया जा सकता है और भारी जुर्माना या आपराधिक मामला दर्ज हो सकता है।
- जिम्मेदारी किसकी है? इस मामले में पुलिस ने इमारत के मालिक हरिराम बंसल और अन्य के खिलाफ दक्षिण कैंपस थाने में एफआईआर दर्ज कर ली है, लेकिन क्या केवल एक मालिक पर कार्रवाई करने से ऐसे हादसों का सिलसिला रुक जाएगा?
दिल्ली में 75 लाख इमारतें और बारूद के ढेर पर बैठी जिंदगी
विशेषज्ञों के अनुसार, दिल्ली में लगभग 75 लाख से अधिक इमारतें हैं। विडंबना यह है कि इनमें से अधिकांश इमारतें सभी सुरक्षा नियमों को पूरा किए बिना बनाई गई हैं। अनधिकृत कॉलोनियों से लेकर पॉश इलाकों तक, नियमों की धज्जियां उड़ाकर बहुमंजिला इमारतें खड़ी कर दी गई हैं।
जब तक प्रशासन किसी बड़े हादसे के बाद जागता है, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। सत्य निकेतन का यह हादसा कोई इकलौता मामला नहीं है। इससे पहले भी करोल बाग, मुखर्जी नगर और पटेल नगर जैसे इलाकों में इस तरह की लापरवाही सामने आ चुकी है, लेकिन सिस्टम की नींद टूटने का नाम नहीं लेती।
अब आगे क्या? कब तय होगी जवाबदेही?
दिल्ली के लोग आज खौफ के साए में जीने को मजबूर हैं। वे जिस भी इमारत में किराए पर रह रहे हैं, उनके मन में यही डर है कि कहीं अगली बारी उनकी तो नहीं है। यदि सरकार और प्रशासन ने अब भी कड़े कदम नहीं उठाए, तो इस तरह के हादसे राजधानी की सड़कों पर यूं ही मातमपर्सी लाते रहेंगे।
जरूरत इस बात की है कि दिल्लीभर में जितनी भी पुरानी और जर्जर इमारतें हैं, उनका एक विस्तृत स्ट्रक्चरल ऑडिट कराया जाए। अवैध निर्माण और बेसमेंट की खुदाई पर तत्काल प्रभाव से रोक लगाई जाए और नियमों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ ऐसी मिसाल कायम की जाए कि भविष्य में कोई भी इंसान चंद रुपयों के लालच में मासूमों की जान से खेलने की हिम्मत न जुटा सके।
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