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जौहर यूनिवर्सिटी में 16 घंटे चली ED की रेड, 494 करोड़ के हिसाब पर फंसा पेंच

जौहर यूनिवर्सिटी में 16 घंटे चली ED की रेड, 494 करोड़ के हिसाब पर फंसा पेंच

उत्तर प्रदेश की राजनीति और शिक्षा जगत से जुड़ी एक बड़ी खबर इस वक्त सामने आ रही है। समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता आजम खान के ड्रीम प्रोजेक्ट माने जाने वाले मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी पर प्रवर्तन निदेशालय (ED) की कार्रवाई का शिकंजा लगातार कसता जा रहा है। यूनिवर्सिटी परिसर में हाल ही में चली मैराथन 16 घंटे की छापेमारी के बाद कई चौंकाने वाले खुलासे हुए हैं, जिससे यूनिवर्सिटी प्रबंधन और उसके सहयोगियों की मुश्किलें काफी बढ़ सकती हैं।

16 घंटे की मैराथन छापेमारी और सवालों के घेरे में निर्माण खर्च

प्राप्त जानकारी के अनुसार, रामपुर स्थित जौहर यूनिवर्सिटी में प्रवर्तन निदेशालय की टीमों ने बुधवार की सुबह ठीक 7 बजे दस्तक दी थी। यह ताबड़तोड़ कार्रवाई रात के करीब 10 बजे यानी लगातार 16 घंटे तक चली। इस दौरान ईडी के अधिकारियों ने यूनिवर्सिटी कैंपस और मौलाना मोहम्मद अली जौहर ट्रस्ट के कार्यालय को पूरी तरह अपने घेरे में ले लिया और वहां रखे एक-एक वित्तीय दस्तावेज को बारीकी से खंगाला।

जांच के दौरान सबसे बड़ा पेंच यूनिवर्सिटी के निर्माण खर्च को लेकर फंसा है। ईडी के सूत्रों के मुताबिक, यूनिवर्सिटी प्रबंधन कैंपस के निर्माण पर खर्च हुए करीब 494 करोड़ रुपये के अनुमानित खर्च का कोई भी ठोस और संतोषजनक ब्योरा पेश करने में पूरी तरह असमर्थ रहा। अधिकारियों का कहना है कि जब इस भारी-भरकम रकम के दस्तावेजों की मांग की गई, तो प्रबंधन के पास कोई स्पष्ट जवाब नहीं था और वे चुप्पी साधे रहे।

सरकारी बजट और जमीन खरीद के कागजात भी गायब

सिर्फ निजी निर्माण ही नहीं, बल्कि जांच का दायरा सरकारी धन के उपयोग तक भी फैला हुआ है। प्रारंभिक पड़ताल में यह बात सामने आई है कि निर्माण कार्य में इस्तेमाल किए गए लगभग 88 करोड़ रुपये के सरकारी बजट, जमीन की खरीद-फरोख्त और अन्य बुनियादी ढांचे (इन्फ्रास्ट्रक्चर) पर खर्च हुई विशाल राशि से जुड़े मूल कागजात भी ट्रस्ट के पास उपलब्ध नहीं मिल सके।

इतनी बड़ी मात्रा में धन के लेन-देन और उसके कोई आधिकारिक दस्तावेज न मिलने से वित्तीय अनियमितताओं की आशंकाएं और अधिक गहरी हो गई हैं। ईडी की इस कार्रवाई ने यह साफ कर दिया है कि आने वाले दिनों में जांच की आंच और तेज होने वाली है।

11 दानदाता फर्में और संदिग्ध चंदे का खेल

इस पूरी कार्रवाई का सबसे अहम और पेचीदा पहलू वह चंदा (डनेशन) है जो यूनिवर्सिटी और ट्रस्ट को मिला था। ईडी ने मौके से कई महत्वपूर्ण वित्तीय रिकॉर्ड जब्त किए हैं, जिनमें उन 11 निजी फर्मों की सूची भी शामिल है जिन्होंने जौहर ट्रस्ट के बैंक खातों में भारी-भरकम रकम ट्रांसफर की थी।

जांच एजेंसी के लिए सबसे हैरानी की बात यह है कि ट्रस्ट को करोड़ों रुपये का चंदा देने वाली ये फर्में और लोग अपनी आय के वैध स्रोत (Source of Income) का कोई भी ठोस प्रमाण पेश नहीं कर पा रहे हैं। आखिर इतना पैसा कहां से आया और इसके पीछे किसका हाथ था, यह सवाल अब जांच के केंद्र में है।

एक साथ कई ठिकानों पर दी गई थी दबिश

ईडी की यह कार्रवाई सिर्फ रामपुर तक ही सीमित नहीं थी, बल्कि इसका दायरा कई अन्य शहरों तक फैला हुआ था। रामपुर में 6 ठिकानों के अलावा सहारनपुर में सीए दीपक के कार्यालय और आवास के साथ-साथ दिल्ली में आजम खान के तमाम करीबी सहयोगियों के ठिकानों पर भी एक साथ छापेमारी की गई थी। इस कोऑर्डिनेटेड एक्शन से यह जाहिर होता है कि जांच एजेंसी के पास पहले से ही इन वित्तीय लेन-देन को लेकर पुख्ता डिजिटल और कागजी सबूत मौजूद थे।

अब आगे क्या? खातों के सीज होने और PMLA की तैयारी

कानूनी जानकारों और सूत्रों की मानें तो यदि जौहर ट्रस्ट और उससे जुड़ी ये 11 फर्में इस भारी-भरकम धनराशि का वैध हिसाब देने में नाकाम रहती हैं, तो इसे सीधे तौर पर 'काले धन' (Black Money) का सफेद करने का मामला माना जाएगा।

परिस्थितियों को देखते हुए प्रवर्तन निदेशालय जल्द ही 'प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट' (PMLA) के प्रावधानों के तहत ट्रस्ट और इसके पदाधिकारियों के खिलाफ एक नया आपराधिक मामला दर्ज कर सकता है। इसके अलावा, मनी ट्रेल (Money Trail) की पुष्टि न होने की स्थिति में यूनिवर्सिटी और ट्रस्ट से जुड़े तमाम बैंक खातों को सीज (Freez) करने की कानूनी प्रक्रिया भी शुरू की जा सकती है।

निष्कर्ष

जौहर यूनिवर्सिटी पर हुई यह कार्रवाई एक बार फिर से राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में चर्चा का विषय बन गई है। शिक्षा के नाम पर स्थापित इस बड़े संस्थान पर वित्तीय अनियमितताओं के गंभीर आरोप और 494 करोड़ रुपये के हिसाब का न मिलना यूनिवर्सिटी के भविष्य के लिए एक बड़ा संकट खड़ा कर सकता है। अब देखना यह होगा कि यूनिवर्सिटी प्रबंधन और इसके दानदाता इस कानूनी शिकंजे से बाहर निकलने के लिए आगे क्या सफाई देते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

Q1: जौहर यूनिवर्सिटी में ईडी ने छापेमारी क्यों की?

उत्तर: ईडी ने यह छापेमारी यूनिवर्सिटी के निर्माण कार्य पर खर्च हुए करीब 494 करोड़ रुपये और 88 करोड़ रुपये के सरकारी बजट के वित्तीय दस्तावेजों की जांच के लिए की है, जिनका हिसाब प्रबंधन नहीं दे सका।

Q2: जांच के दायरे में कौन सी फर्में और लोग शामिल हैं?

उत्तर: जौहर ट्रस्ट को करोड़ों रुपये का चंदा देने वाली 11 निजी फर्में, सहारनपुर के एक सीए और आजम खान के कुछ करीबी सहयोगी इस पूरी जांच के मुख्य घेरे में हैं।

Q3: यदि हिसाब नहीं मिला तो क्या कार्रवाई हो सकती है?

उत्तर: संतोषजनक जवाब न मिलने पर ईडी पीएमएलए (PMLA) के तहत नया मामला दर्ज कर सकती है और यूनिवर्सिटी व ट्रस्ट के बैंक खातों को सीज करने की कार्रवाई शुरू कर सकती है।

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अनुराधा दुबे

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अनुराधा दुबे एक समर्पित और अनुभवी कंटेंट राइटर हैं, जो भारत से जुड़ी राजनीतिक, सामाजिक और नीतिगत खबरों को गहराई से समझकर पाठकों तक पहुंचाती हैं। उन...

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