महाराष्ट्र के सुदूर और नक्सल प्रभावित माने जाने वाले गडचिरोली जिले से एक बड़ी खबर सामने आ रही है। हालांकि यहां मूसलाधार बारिश और बाढ़ का प्रकोप अब थोड़ा थमता नजर आ रहा है, लेकिन प्रकृति का यह कहर अपने पीछे ऐसी मुसीबतें छोड़ गया है जो स्थानीय नागरिकों की सांसें अटकाए हुए हैं। जिले के भामरागड़ इलाके में बाढ़ का पानी भले ही नीचे उतर गया हो, लेकिन लोगों की परेशानियां कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। स्थिति यह है कि चौथे दिन भी भामरागड़ का मुख्य संपर्क जिला मुख्यालय और अन्य हिस्सों से पूरी तरह कटा हुआ है।
पर्लकोटा नदी का पुराना पुल अब भी जलमग्न
इस पूरे संकट के केंद्र में पर्लकोटा नदी पर बना पुराना पुल है। पिछले कुछ दिनों से लगातार हुई भारी बारिश के कारण इस नदी का जलस्तर खतरे के निशान को पार कर गया था। हालांकि अब बारिश रुकने के बाद नदी का उग्र रूप शांत हो रहा है और पानी का स्तर भी काफी नीचे आ चुका है, लेकिन पर्लकोटा नदी का पुराना पुल अभी भी पानी में डूबा हुआ है। इस पुराने पुल के डूबने की वजह से यातायात पूरी तरह से ठप पड़ा है और सुरक्षा कारणों से प्रशासन ने आवाजाही पर सख्त रोक लगा रखी है।
पुल के ऊपर से पानी पूरी तरह नहीं हटने के कारण वाहनों की आवाजाही शुरू नहीं हो पाई है। नतीजतन, भामरागड़ तहसील का संपर्क देश और दुनिया के बाकी हिस्सों से पिछले 96 घंटों से भी ज्यादा समय से कटा हुआ है। इस स्थिति ने आम जनजीवन को अस्त-व्यस्त कर दिया है और प्रशासनिक अमले की मुश्किलें भी बढ़ा दी हैं।
चौथे दिन भी थमी रही जिंदगी की रफ्तार
किसी भी क्षेत्र के विकास और वहां के नागरिकों की रोजमर्रा की जिंदगी के लिए परिवहन सबसे अहम कड़ी होती है। लेकिन गडचिरोली के भामरागड़ में पिछले चार दिनों से यह कड़ी पूरी तरह टूटी हुई है। आइए जानते हैं कि इस संपर्क कट जाने से ग्राउंड जीरो पर हालात कैसे बने हुए हैं:
- जरूरी सामानों की आपूर्ति बाधित: संपर्क कटने की वजह से भामरागड़ बाजार में खाद्य सामग्री, सब्जियां और अन्य जरूरी वस्तुओं की आवक रुक गई है। स्थानीय दुकानदारों और निवासियों को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। चिकित्सकीय सेवाएं प्रभावित: आपातकालीन स्थिति में मरीजों को जिला अस्पताल तक पहुँचाना इस समय सबसे बड़ी चुनौती बन गया है। एम्बुलेंस और अन्य वाहन पुल पार करने में असमर्थ हैं। दैनिक कामकाज और नौकरियां ठप: सरकारी कर्मचारी, शिक्षक और व्यापारी जो रोजाना इस रास्ते से आवाजाही करते थे, वे पूरी तरह फंस चुके हैं।
प्रशासन और राहत कार्यों की स्थिति
स्थानीय प्रशासन और आपदा प्रबंधन की टीमें स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए हैं। जैसे ही पर्लकोटा नदी का जलस्तर और अधिक नीचे उतरेगा और पुल से पानी हटेगा, वैसे ही मार्ग को यातायात के लिए सुरक्षित घोषित करने की प्रक्रिया शुरू की जाएगी। हालांकि, इस बीच नागरिकों को धैर्य रखने और अत्यधिक सावधानी बरतने की सलाह दी गई है।
प्रशासन की ओर से यह भी कहा जा रहा है कि जिन इलाकों में पानी पूरी तरह उतर चुका है, वहां स्वास्थ्य विभाग की टीमें भेजी जा रही हैं ताकि बाढ़ के बाद फैलने वाली बीमारियों (जैसे डायरिया, मलेरिया और अन्य जल जनित रोग) से समय रहते निपटा जा सके। राहत शिविरों में रह रहे लोगों को सुरक्षित उनके घरों तक वापस भेजने की रणनीति भी तैयार की जा रही है, लेकिन मुख्य सड़क मार्ग बंद होने के कारण इसमें कुछ वक्त और लग सकता है।
स्थानीय लोगों का दर्द और स्थायी समाधान की मांग
भामरागड़ के निवासियों का कहना है कि हर साल मानसून के दौरान पर्लकोटा नदी का उफान उनके लिए किसी अभिशाप से कम नहीं होता। थोड़ी सी भी ज्यादा बारिश होने पर यह पुराना पुल डूब जाता है और पूरा इलाका बाकी दुनिया से कट जाता है। स्थानीय नागरिकों और विभिन्न सामाजिक संगठनों ने कई बार सरकार से इस पुराने पुल के स्थान पर एक ऊंचे और आधुनिक फ्लाईओवर या नए पुल के निर्माण की मांग की है, ताकि हर साल आने वाली इस आपदा से हमेशा के लिए निजात मिल सके।
बरसात के इन दिनों में जब तक पर्लकोटा नदी का पुराना पुल पूरी तरह से पानी से बाहर नहीं आ जाता और सुरक्षा जांच पूरी नहीं हो जाती, तब तक भामरागड़ के लोगों का यह इंतजार और अनिश्चितता का दौर जारी रहने की आशंका है। फिलहाल, सभी की निगाहें आसमान की तरफ और नदी के घटते जलस्तर पर टिकी हुई हैं।