अंतरराष्ट्रीय मंचों पर जब भी आतंकवाद के खिलाफ एकजुट होने की बात आती है, तो भारत हमेशा से मुखर रहा है। इसी कड़ी में बिश्केक में आयोजित 26वें शंघाई सहयोग संगठन (SCO) के शिखर सम्मेलन में भारत ने एक बार फिर पड़ोसी देशों और वैश्विक समुदाय को आईना दिखाया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एससीओ की पूर्ण बैठक (Plenary Meeting) को संबोधित करते हुए आतंकवाद के मुद्दे पर दोहरे मानदंड अपनाने वाले देशों को आड़े हाथों लिया।
आतंकवाद और सीमा पार हिंसा पर दो टूक
सितंबर 2026 के इस महत्वपूर्ण वैश्विक आयोजन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने संबोधन के दौरान साफ शब्दों में कहा कि आतंकवाद मानवता के लिए सबसे बड़ा अभिशाप है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि जो देश आतंकवाद का समर्थन करते हैं या इसे अपनी विदेश नीति का हिस्सा बनाते हैं, वे क्षेत्रीय शांति और स्थिरता के सबसे बड़े दुश्मन हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि प्रधानमंत्री का यह बयान सीधे तौर पर पाकिस्तान और उन ताकतों के लिए था जो आतंकवाद को पनाह देती हैं। वैश्विक मंच पर बिना किसी लाग-लपेट के दोहरे मानकों (Double Standards) की आलोचना करना भारत की मजबूत कूटनीतिक इच्छाशक्ति को दर्शाता है।
क्षेत्रीय सुरक्षा और आपसी सहयोग का एजेंडा
एससीओ शिखर सम्मेलन के दौरान केवल आतंकवाद ही नहीं, बल्कि क्षेत्रीय व्यापार, आर्थिक सहयोग और कनेक्टिविटी जैसे मुद्दों पर भी विस्तार से चर्चा हुई। वर्तमान भू-राजनीतिक परिदृश्य को देखते हुए यह बैठक कई मायनों में बेहद अहम साबित हो रही है।
- आतंकवाद के खिलाफ जीरो टॉलरेंस: भारत ने स्पष्ट किया कि आतंकवाद और बातचीत एक साथ नहीं चल सकते।
- आर्थिक साझेदारी: मध्य एशिया के देशों के साथ व्यापारिक रिश्तों को मजबूत करने पर जोर।
- आपसी विश्वास: क्षेत्रीय स्थिरता के लिए पारदर्शी और जिम्मेदार नीतियों की वकालत।
वैश्विक कूटनीति में भारत का बढ़ता प्रभाव
आज की तारीख में भारत की कूटनीति केवल अपने हितों तक सीमित नहीं है, बल्कि वह वैश्विक दक्षिण (Global South) की आवाज बन चुकी है। बिश्केक में आयोजित इस उच्च स्तरीय बैठक में पीएम मोदी की उपस्थिति और उनके स्पष्ट विचार इस बात की गवाही देते हैं कि भारत वैश्विक मंचों पर अपनी शर्तों और सिद्धांतों पर बात रखने से पीछे नहीं हटता।
शंघाई सहयोग संगठन जैसे बड़े मंच पर आतंकवाद के खात्मे के लिए सामूहिक प्रतिबद्धता की मांग करना यह बताता है कि आने वाले समय में कूटनीतिक दबाव उन देशों पर और अधिक बढ़ेगा जो इस नासूर को पालने-पोसने का काम करते हैं।
आगे की राह और चुनौतियां
भले ही एससीओ के सदस्य देशों के बीच आर्थिक और सांस्कृतिक सहयोग बढ़ाने की बात लगातार की जाती रही हो, लेकिन जब तक आतंकवाद जैसे गंभीर मुद्दों पर सभी देश एक पेज पर नहीं आते, तब तक क्षेत्रीय विकास की परिकल्पना अधूरी है। भारत ने एक बार फिर इस सच्चाई को दुनिया के सामने लाकर यह साबित कर दिया है कि सुरक्षा और विकास एक-दूसरे के पर्याय हैं।
इस सम्मेलन के बाद वैश्विक राजनीति में आतंकवाद के खिलाफ नए समीकरण बनने की उम्मीद जताई जा रही है, और भारत की इस दो टूक चेतावनी के दूरगामी परिणाम देखने को मिल सकते हैं।
