पश्चिम एशिया के भू-राजनीतिक समीकरण एक बार फिर से गर्मा गए हैं। हिजबुल्लाह प्रमुख हसन नसरल्लाह की मौत को भले ही दो साल बीत चुके हैं, लेकिन ईरान की याददाश्त से यह दर्द और गुस्सा जरा भी कम नहीं हुआ है। मौजूदा साल 2026 में 27 सितंबर को नसरल्लाह की दूसरी बरसी के मौके पर तेहरान ने एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कड़ा रुख अख्तियार करते हुए दुनिया का ध्यान इस ओर खींचा है। ईरानी विदेश मंत्रालय की ओर से जारी एक आक्रामक और स्पष्ट बयान में साफ कर दिया गया है कि समय बीतने से इस मामले में न्याय की मांग कमजोर नहीं पड़ने वाली है।
बैरूत के उस खौफनाक दिन को भूला नहीं तेहरान
तारीख 27 सितंबर 2024—यह वही दिन था जब लेबनान की राजधानी बैरूत के घनी आबादी वाले दक्षिणी इलाके 'दहियेह' में इजरायल की ओर से एक भीषण और सुनियोजित हवाई हमला किया गया था। इस हमले ने केवल हिजबुल्लाह के दशकों पुराने नेतृत्व को ही खत्म नहीं किया, बल्कि पूरे पश्चिम एशिया में तहलका मचा दिया था। इस जानलेवा हमले में न केवल हसन नसरल्लाह की जान गई, बल्कि ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड्स कॉर्प्स (IRGC) के वरिष्ठ कमांडर ब्रिगेडियर जनरल अब्बास निलफोरूशन समेत कई अन्य प्रमुख शख्सियतें भी हताहत हुई थीं। इस घटना के अगले दिन हिजबुल्लाह ने आधिकारिक तौर पर अपने नेता की शहादत की पुष्टि की थी, जिसके बाद से ही क्षेत्र में तनाव लगातार चरम पर बना हुआ है।
तेहरान का यह ताजा बयान सिर्फ एक औपचारिकता नहीं है, बल्कि यह पश्चिम एशिया की राजनीति में ईरान की दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा है। ईरानी विदेश मंत्रालय ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से दो टूक शब्दों में कहा है कि इस गंभीर अपराध के लिए जिम्मेदार तत्वों पर बिना किसी देरी के मुकदमा चलाया जाना चाहिए और उन्हें कानून के दायरे में लाकर कड़ी सजा दी जानी चाहिए। ईरान का तर्क है कि न्याय मिलने में भले ही वक्त लग जाए, लेकिन जुर्म की तासीर समय के साथ धुंधली नहीं पड़ती।
लेबनान की संप्रभुता और क्षेत्रीय स्थिरता पर जोर
अपने आधिकारिक संदेश में ईरान ने लेबनान की स्वतंत्रता, क्षेत्रीय अखंडता और राष्ट्रीय एकता के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को पुरजोर तरीके से दोहराया है। तेहरान का मानना है कि एक मजबूत और स्थिर लेबनान, जो अपने नागरिकों और अपनी सीमाओं की रक्षा करने की पूरी ताकत रखता हो, पूरे पश्चिम एशिया में स्थायी शांति और सुरक्षा स्थापित करने के लिए एक अनिवार्य शर्त है।
विश्लेषकों का मानना है कि नसरल्लाह की हत्या को केवल एक व्यक्ति या एक नेता के अंत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। ईरान के राजनीतिक और सैन्य हलकों में नसरल्लाह को 'प्रतिरोध धुरी' (Axis of Resistance) का एक प्रमुख स्तंभ माना जाता रहा है। यही वजह है कि तेहरान उन्हें जनरल कासिम सुलेमानी, अबू महदी अल-मुहंदिस, इस्माइल हानिया, याह्या सिनवार और मोहम्मद अब्दुलकरीम अल-गमारी जैसे उन तमाम बड़े कमांडरों और नेताओं की फेहरिस्त में रखता है, जिन्होंने पश्चिमी और इजरायली नीतियों के खिलाफ संघर्ष करते हुए अपनी जान गंवाई।
व्यापक क्षेत्रीय टकराव और विस्थापन का संकट
नसरल्लाह के मारे जाने के तुरंत बाद लेबनान और उसके आस-पास के इलाकों में जिस तरह का मानवीय और सामरिक संकट पैदा हुआ था, उसके घाव आज भी पूरी तरह नहीं भरे हैं। उस समय अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, बड़े पैमाने पर लेबनानी नागरिकों को अपना घर-बार छोड़कर सुरक्षित स्थानों पर पलायन करना पड़ा था। इस संघर्ष के लेबनान की सीमाओं से बाहर निकलकर पूरे मध्य पूर्व में फैलने की आशंकाओं ने दुनिया भर की सरकारों की नींद उड़ा दी थी। चीन समेत कई प्रमुख वैश्विक ताकतों ने उस दौरान लेबनान की संप्रभुता का सम्मान करने और तत्काल तनाव कम करने की पुरजोर अपील की थी।
हालांकि, वक्त गुजरने के साथ भले ही सीधी जंग की तीव्रता में कुछ उतार-चढ़ाव आया हो, लेकिन कूटनीतिक मोर्चे पर तनातनी जस की तस बनी हुई है। ईरान का यह ताजा रुख यह साफ जाहिर करता है कि तेहरान इस पूरे घटनाक्रम को भुलाने के मूड में बिल्कुल नहीं है। इजरायल के साथ उसका वैचारिक और रणनीतिक टकराव आने वाले दिनों में और अधिक जटिल रूप ले सकता है, खासकर तब जब क्षेत्रीय व्यापारिक मार्गों, जैसे कि होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को लेकर अमेरिका और ईरान के बीच तनाव लगातार गहराता जा रहा है।
होर्मुज संकट और नए भू-राजनीतिक समीकरण
वर्तमान वर्ष 2026 के परिप्रेक्ष्य में देखें तो यह बयान ऐसे समय आया है जब ईरान और अमेरिका के बीच समुद्री सीमाओं और जासूसी ड्रोन पकड़े जाने जैसी घटनाओं को लेकर एक बार फिर महाविनाशक युद्ध के बादल मंडरा रहे हैं। ईरानी नेतृत्व ने पहले ही यह स्पष्ट कर दिया है कि वह किसी भी परिस्थिति का सामना करने के लिए पूरी तरह तैयार है, चाहे वह बातचीत का टेबल हो या फिर जंग का मैदान। कैस्पियन सागर के रास्ते व्यापार बढ़ाने की कोशिशें और होर्मुज में ईरान की सख्त शर्तें इस बात का सुबूत हैं कि तेहरान अपनी रणनीतिक स्वायत्तता से किसी भी कीमत पर समझौता करने को तैयार नहीं है।
नसरल्लाह की दूसरी बरसी पर ईरान की यह आक्रामक कूटनीति यह संकेत देती है कि पश्चिम एशिया में आने वाले दिन और अधिक उथल-पुथल भरे हो सकते हैं। लेबनान से लेकर तेहरान तक, प्रतिरोध के इस एजेंडे को अभी एक लंबा सफर तय करना है, और अंतरराष्ट्रीय अदालतें या वैश्विक मंच इस पर क्या रुख अपनाते हैं, यह देखना बेहद दिलचस्प होगा।