अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के पटल पर इन दिनों रूस और यूक्रेन के बीच चल रहे संघर्ष को समाप्त करने के लिए भारत की मध्यस्थता और कूटनीतिक पहलों की चर्चा जोरों पर है। भारत लगातार यह रुख अपनाए हुए है कि युद्ध के मैदान से किसी भी समस्या का स्थायी समाधान नहीं निकाला जा सकता। इसी कड़ी में देश के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने एक बार फिर स्पष्ट किया है कि यदि कीवी और मॉस्को के बीच किसी सीमित यानी आंशिक मुद्दे पर भी सहमति बन जाती है, तो इसे मौजूदा परिस्थितियों में एक बहुत बड़ा सकारात्मक बदलाव माना जाएगा।
रणनीतिक मंच से दिया गया कूटनीतिक संदेश
नई दिल्ली में आयोजित पांचवें कौटिल्य इकोनॉमिक कॉन्क्लेव के समापन सत्र को संबोधित करते हुए विदेश मंत्री ने वैश्विक उथल-पुथल और कूटनीतिक पहलों पर विस्तार से बात की। उन्होंने रेखांकित किया कि वैश्विक दक्षिण (Global South) की उम्मीदें आज भारत पर टिकी हुई हैं और दुनिया के तमाम देश भारत से यह अपेक्षा रखते हैं कि वह अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उनकी आवाज़ बने। इस दौरान उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि भारत की कूटनीति किसी एक पक्ष के पक्ष में झुकने के बजाय दोनों पक्षों के बीच संवाद के द्वार खुला रखने पर जोर देती है।
विदेश मंत्री ने याद दिलाया कि संघर्ष की शुरुआत के शुरुआती दौर में ही दोनों पक्षों के बीच बातचीत की टेबल पर आने के प्रयास हुए थे, लेकिन बाद के समय में ऐसे कई शांति सम्मेलन आयोजित किए गए जहां से रूस की अनुपस्थिति ने उन प्रयासों की सार्थकता पर सवालिया निशान लगा दिया। भारत का शुरू से यह मानना रहा है कि यूक्रेन संकट के समाधान के लिए आयोजित होने वाली किसी भी ऐसी बड़ी बैठक का कोई औचित्य नहीं बनता जिसमें रूस को शामिल न किया गया हो।
समुद्री जहाजों पर हमलों के बाद शुरू हुई थी नई वार्ता
यह कूटनीतिक संवाद इस वर्ष जुलाई के महीने में उस वक्त नए सिरे से सक्रिय हुआ जब ब्लैक सी (काला सागर) क्षेत्र में दोनों पक्षों की ओर से व्यावसायिक जहाजों को निशाना बनाया जाने लगा। इन हमलों में कुछ भारतीय नाविकों की जान चली गई थी और कई अन्य घायल हो गए थे। भारत ने इस घटना पर कड़ा रुख अपनाते हुए रूस और यूक्रेन दोनों देशों के सामने अपनी कड़ी आपत्ति दर्ज कराई थी और संबंधित देशों के राजदूतों को तलब किया था।
इस पूरे घटनाक्रम पर प्रकाश डालते हुए विदेश मंत्री ने बताया कि शुरुआत में यह बातचीत पूरी तरह से समुद्री जहाजों और नाविकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के उद्देश्य से शुरू की गई थी। हालांकि, बातचीत आगे बढ़ने के साथ ही इसमें ब्लैक सी से अनाज के निर्यात को बहाल करने और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति जैसे गंभीर मुद्दे भी जुड़ गए। धीरे-धीरे यह संवाद केवल समुद्री सुरक्षा तक सीमित न रहकर एक व्यापक कूटनीतिक दायरे में तब्दील हो गया, जिसमें खाद्य सुरक्षा और उर्वरक आपूर्ति जैसे विषय भी शामिल हो गए।
शीर्ष नेतृत्व के स्तर पर हुए महत्वपूर्ण संवाद
पिछले कुछ महीनों के दौरान भारत के शीर्ष नेतृत्व ने इस दिशा में बेहद सक्रिय भूमिका निभाई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगस्त में बिश्केक में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ हुई बैठक से शुरू हुआ यह सिलसिला आगे भी जारी रहा। इसके बाद विदेश मंत्री एस जयशंकर ने खुद कीव का दौरा कर यूक्रेनी राष्ट्रपति वोलोडिमिर ज़ेलेंस्की से मुलाकात की। इसके तुरंत बाद, नई दिल्ली में आयोजित ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के इतर प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति पुतिन के बीच एक बार फिर अहम चर्चा हुई।
इन तमाम प्रयासों के बावजूद, विदेश मंत्री ने जमीनी हकीकत को स्वीकार करते हुए कहा कि मौजूदा स्थिति बेहद जटिल है और यह दावा करना कि कल ही कोई बड़ा समझौता हो जाएगा, जल्दबाजी होगी। इसके बावजूद, उनका यह स्पष्ट मानना है कि यह प्रयास करने योग्य है क्योंकि अनाज, उर्वरक और ईंधन से जुड़ी चिंताओं का समाधान करना न केवल भारत बल्कि पूरे ग्लोबल साउथ के हित में है।
वैश्विक संस्थाओं में सुधार और भविष्य की चुनौतियां
भाषण के दौरान एस जयशंकर ने संयुक्त राष्ट्र (UN) की कार्यप्रणाली पर भी तीखा प्रहार किया। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि संयुक्त राष्ट्र वर्तमान में गतिरोध (gridlock) का शिकार हो चुका है और इसमें सुधार करने की आवश्यकता है, न कि इसके समानांतर कोई नई व्यवस्था तैयार करने की। उन्होंने अफसोस जताया कि कुछ चुनिंदा देश संयुक्त राष्ट्र में आवश्यक सुधारों का लगातार विरोध कर रहे हैं।
वैश्विक अर्थव्यवस्था और अनिश्चितताओं के इस दौर को 'परिवर्तन का युग' (age of flux) करार देते हुए उन्होंने कहा कि दुनिया भर में जारी संघर्षों और टैरिफ की अस्थिरता ने माहौल को चुनौतीपूर्ण बना दिया है। हालांकि, उन्हें पूरा भरोसा है कि भारत कोविड महामारी की तरह ही इन दोहरे संघर्षों और ऊर्जा-खाद्य सुरक्षा जैसी वैश्विक चुनौतियों से भी सफलतापूर्वक पार पा लेगा।
भारत की प्राथमिकताएं और रणनीतिक साझेदारी
अमेरिका के साथ संबंधों पर बात करते हुए उन्होंने अमेरिका को भारत का प्रमुख रणनीतिक साझीदार बताया। उन्होंने कहा कि अमेरिका के साथ भारत का सबसे बड़ा आर्थिक खाता, सबसे बड़ा व्यापारिक संबंध और एक अत्यंत महत्वपूर्ण रक्षा सहयोग जुड़ा हुआ है।
विशेषज्ञों का मानना है कि रूस और यूक्रेन के बीच चल रहे इस भीषण टकराव के बीच भारत की यह संतुलित कूटनीति वैश्विक शांति के प्रयासों में एक उत्प्रेरक का काम कर सकती है। यदि कूटनीतिक वार्ताओं के जरिए दोनों देश किसी सीमित समझौते पर भी राजी होते हैं, तो यह वैश्विक अर्थव्यवस्था, विशेषकर विकासशील देशों के लिए एक बड़ी राहत साबित होगी।