भारतीय प्रशासनिक सेवा के कुछ पूर्व अधिकारियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के एक चुनिंदा समूह द्वारा मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ शुरू किया गया अभियान शुरुआती चरण में ही नाकाम साबित हुआ। इस समूह ने निर्वाचन आयोग के शीर्ष पद पर बैठे अधिकारी को हटाने के उद्देश्य से एक अनोखा 'पीपुल्स महाभियोग' नोटिस जारी करने और उनके खिलाफ औपचारिक चार्जशीट दाखिल करने की योजना बनाई थी। हालांकि, यह कदम कागजों से आगे जमीन पर उतरने से पहले ही दम तोड़ गया।
क्या थी पूरी योजना और कौन-कौन था शामिल?
प्राप्त जानकारी के अनुसार, इस पूरे अभियान के पीछे करीब 15 विशिष्ट लोगों का एक समूह था। इस ग्रुप में देश के कई जाने-माने नाम शामिल थे, जिनमें पूर्व केंद्रीय गृह सचिव जी.के. पिल्लई, दिल्ली के पूर्व उपराज्यपाल नजीब जंग और प्रमुख राजनीतिक कार्यकर्ता योगेंद्र यादव जैसी शख्सियतें प्रमुख रूप से मौजूद थीं। इस समूह की मंशा थी कि वे चुनाव आयोग के दफ्तर तक मार्च करेंगे और मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ कथित अनियमितताओं और संवैधानिक मर्यादाओं के उल्लंघन के आरोपों की एक चार्जशीट सौंपेंगे।
इन दिग्गजों का यह मानना था कि वे जनता की आवाज बनकर निर्वाचन आयोग के कामकाज पर सवाल खड़े करेंगे और एक कड़ा संदेश देंगे। लेकिन लोकतांत्रिक व्यवस्था के दायरे में प्रशासनिक और सुरक्षा तंत्र ने इस अप्रत्याशित कदम को शुरुआती स्तर पर ही रोक दिया।
क्यों और कैसे फेल हुआ निर्वाचन आयोग तक पहुंचने का प्लान?
निर्धारित योजना के तहत जब यह 15 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल अपनी मांगों और दस्तावेजों के साथ मुख्य चुनाव आयुक्त के कार्यालय की ओर बढ़ा, तो उन्हें सुरक्षा व्यवस्था और प्रशासनिक नियमों के कारण कड़े प्रतिरोध का सामना करना पड़ा। स्थिति यह बन गई कि इस हाई-प्रोफाइल समूह को चुनाव आयोग के कार्यालय के अंदर तक प्रवेश करने की अनुमति ही नहीं दी गई।
सुरक्षा बलों और संबंधित अधिकारियों ने नियमों का हवाला देते हुए उन्हें मुख्य द्वार पर ही रोक दिया। बिना किसी पूर्व आधिकारिक अनुमति या निर्धारित प्रोटोकॉल के इतने बड़े प्रशासनिक पद पर बैठे व्यक्ति के खिलाफ इस तरह का 'पीपुल्स नोटिस' लेकर पहुंचने के कारण अधिकारियों ने उन्हें अंदर जाने की इजाजत नहीं दी। नतीजतन, पूर्व आईएएस अधिकारियों और एक्टिविस्ट्स का यह पूरा काफिला बिना अपनी अर्जी सौंपे ही लौट जाने को मजबूर हुआ।
मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ क्यों उठ रहे हैं सवाल?
हाल के समय में देश के राजनीतिक गलियारों में निर्वाचन आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त की कार्यप्रणाली को लेकर विभिन्न राजनीतिक दलों और नागरिक संगठनों के बीच तीखी बहस छिड़ी हुई है। विपक्ष लगातार चुनाव आयोग के फैसलों और चुनावी प्रक्रियाओं पर सवालिया निशान लगाता रहा है। इसी कड़ी में पूर्व नौकरशाहों का यह समूह भी मैदान में उतरा था।
इन आलोचकों का आरोप है कि चुनाव आयोग को पूरी तरह से निष्पक्ष और स्वतंत्र रूप से कार्य करना चाहिए, लेकिन हालिया कुछ फैसलों ने संस्था की साख को प्रभावित किया है। हालांकि, निर्वाचन आयोग और सरकार के समर्थकों का हमेशा से यह तर्क रहा है कि इस तरह के अभियान केवल राजनीतिक प्रेरणा से प्रेरित होते हैं और इनका उद्देश्य स्वतंत्र संवैधानिक संस्थाओं के कामकाज में अनावश्यक हस्तक्षेप करना होता है।
संवैधानिक संस्थाओं की गरिमा और विरोध के तरीके
भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में संविधान ने नागरिकों, कार्यकर्ताओं और पूर्व अधिकारियों को अपनी बात रखने के कई अधिकार दिए हैं, लेकिन किसी संवैधानिक पद पर बैठे शीर्ष अधिकारी को हटाने के लिए एक तय कानूनी और संसदीय प्रक्रिया होती है। महाभियोग जैसी प्रक्रिया केवल संसद के माध्यम से ही संभव है, न कि सड़कों पर या व्यक्तिगत स्तर पर 'पीपुल्स महाभियोग' जैसे अनौपचारिक तरीकों से।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह के कदमों से भले ही मीडिया में सुर्खियां बटोरी जा सकें, लेकिन इनका जमीनी या कानूनी तौर पर कोई ठोस असर नहीं होता है। पूर्व नौकरशाहों द्वारा इस प्रकार का प्रयास किया जाना अपने आप में एक बड़ी चर्चा का विषय जरूर बन गया है, लेकिन प्रशासनिक और कानूनी मोर्चे पर यह पूरी तरह से असफल रहा।
आगे क्या हो सकता है रुख?
चूंकि इस प्रतिनिधिमंडल को चुनाव आयोग के कार्यालय में प्रवेश नहीं मिला और उनका यह पहला प्रयास विफल हो गया, यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या यह समूह अपनी रणनीति में बदलाव करता है या फिर किसी अन्य कानूनी माध्यम का सहारा लेता है। देश में आगामी चुनावी माहौल और राजनीतिक सरगर्मी को देखते हुए यह तय है कि निर्वाचन आयोग की भूमिका और उसके फैसलों पर आगे भी बहस जारी रहेगी।
फिलहाल, ज्ञानेश कुमार के खिलाफ पूर्व आईएएस अधिकारियों का यह मोर्चा पहले ही ही पड़ाव पर बिखर गया, जिससे यह साफ हो गया कि संवैधानिक पदों पर बैठे प्रमुखों के खिलाफ इस तरह के असंगठित अभियानों को जमीन पर उतारना आसान नहीं है।